भारत को मिले नए बाजार

भारत को मिले नए बाजार

पंजाब केसरी के डायरेक्टर आदित्य नारायण चोपड़ा

अमेरिका द्वारा भारी-भरकम टैरिफ लगाए जाने के बाद विशेषज्ञों ने बहुत सी चिंताएं जताई थीं। तब से ही भारत ने नए बाजारों की तलाश शुरू कर दी थी। अमेरिकी टैरिफ से भारतीय वस्तुओं का निर्यात दबाव में है लेकिन भारत ने आपदा में भी अवसर तलाश लिया है। एक अच्छी खबर यह है कि भले ही अमेरिका को निर्यात में गिरावट आई है, वहीं एशियाई, पश्चिम एशियाई, जर्मनी और कुछ यूरोपीय संघ के देशों ने भारत के लिए सम्भावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल सितम्बर में अमेरिका को रत्न एवं आभूषण निर्यात में 76 प्रतिशत तक की गिरावट आई जबकि कुल रत्न एवं आभूषण निर्यात में केवल 1.5 प्रतिशत की मामूली गिरावट दर्ज की गई। आंकड़ों के अनुसार संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात में 79 प्रतिशत, हांगकांग को 11 प्रतिशत और बैल्जियम को 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस तरह भारत ने रत्न एवं आभूषण, झींगा, ऑटो कम्पोनेट और इलेक्ट्रिक मशीनरी जैसे कई उत्पाद एशियाई और यूरोपीय बाजारों में भेजने में सफलता हासिल की।
ऑटो कंपोनेंट्स में भी ऐसा ही रुझान देखने को मिला, जिनका अमेरिका को निर्यात सितंबर में 12 प्रतिशत गिरा, लेकिन जर्मनी, यूएई और थाईलैंड को निर्यात से कुल ऑटो कंपोनेंट निर्यात में 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। समुद्री उत्पादों में सितंबर में 25 प्रतिशत और अक्टूबर में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिसका मुख्य कारण चीन (लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि), जापान (37 प्रतिशत), थाईलैंड (लगभग 70 प्रतिशत) और यूरोपीय संघ को निर्यात में वृद्धि थी। इससे यह धारणा पुष्ट होती है कि एशियाई क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों सहित दुनिया के अन्य हिस्सों के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों का लाभ उठाकर, वाशिंगटन डीसी के साथ व्यापार समझौता जल्द ही फलदायी न होने पर इस झटके को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, कम-मार्जिन वाले, श्रम-प्रधान उत्पाद खंड जैसे सूती वस्त्र, खेल के सामान, कालीन और चमड़े के जूते, जिन्हें चीन और दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, अपने शिपमेंट में विविधता लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो दर्शाता है कि अमेरिकी टैरिफ का दीर्घकालिक प्रभाव असमान हो सकता है, जिससे देश भर में संचालित छोटी इकाइयों पर अधिक असर पड़ सकता है। कम मार्जिन वाले उत्पाद आमतौर पर कार्यशील पूंजी के तनाव और विदेशों में इकाइयां स्थापित करने में असमर्थता के कारण व्यापार-संबंधी झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
हालांकि खेलों के सामान, सूती वस्त्र, चमड़े के जूतों के ​िनर्यात में भारत को कड़ी स्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका द्वारा टैरिफ वार शुरू करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने नवरात्रि के पहले दिन सूर्योदय के साथ अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधार लागू​ किए। जिससे अर्थव्यवस्था को एक नई रफ्तार ​िमली। वित्त वर्ष 2025 की दूसरी तिमाही में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जबकि एक साल पहले यह 5.6 प्रतिशत थी, जो आरबीआई और आम अनुमानों से कहीं अधिक है। बढ़ती निजी खपत, ​ निवेश आैर अमेरिकी टैरिफ के आगे उत्पादन और निर्यात में तेजी के कारण अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रही। ग्रामीण मांग में वृद्धि हुई। उच्च कृषि उत्पादन, स्थिर कृषि आय और ग्रामीण जिलों में श्रम बाजार की स्थिति में सुधार ने निजी उपभोग को मजबूत किया। आंकड़ों से यह स्वीकार किया जा सकता है कि भारत की विकास यात्रा वापिस पटरी पर आ गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “दिलचस्प बात यह है कि इस अवधि के दौरान अन्य देशों को भारत के व्यापारिक निर्यात का हिस्सा काफी बढ़ गया है, जो हमारे निर्यात बास्केट के विविधीकरण को दर्शाता है, जिसमें यूएई, चीन, वियतनाम, जापान और हांगकांग के साथ-साथ बंगलादेश, श्रीलंका और नाइजीरिया भी विभिन्न उत्पाद श्रेणियों में शीर्ष गंतव्यों में शामिल हैं। तो, क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ गंतव्य अब भारत से खरीद करने के बाद अमेरिका को अधिक निर्यात कर रहे हैं?’’ मोती और कीमती तथा अर्धकीमती पत्थरों के अमेरिकी आयात में आस्ट्रेलिया की हिस्सेदारी पिछले वर्ष की इसी अवधि के 2 प्रतिशत से बढ़कर जनवरी-अगस्त 2025 में 9 प्रतिशत हो गई है।
भारत अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के लिए लगातार बातचीत कर रहा है। उम्मीद तो इस बात की है कि आने वाले दिनों में कोई सम्मानजनक सहमति बन जाएगी। चुनौतियों के बावजूद भारत के सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होने का टैग बरकरार रखा है। फिलहाल आंकड़े सुकून देने वाले हैं कि उपभोग, निवेश और विनिर्माण में पुनरुद्धार के साथ भारत के विकास इंजन अब अधिक व्यापक आधारित हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियां विकास की उम्मीदें धुंधली कर सकती हैं। अभी हमें बहुत लम्बा रास्ता तय करना है। दुनिया में भूराजनीतिक संघर्ष आैर वित्तीय बाजार में अस्थिरता पूंजी प्रवाह और निवेश की गति को धीमा कर सकती है लेकिन भारत को मिल रहे नए बाजार उम्मीदों की उड़ान पंख दे रहे हैं।

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