तो क्या खामोशी भी हो सकती है वायरल ?

Summary :

प्रश्न किसी शब्द विशेष के नाम पर सोशल मीडिया किसी एक ऑपरेटर द्वारा एक नई पार्टी की स्थापना तक सीमित नहीं है। प्रश्न गंभीर है और व्यापक भी। वैसे किसी भी हंगामे या सनसनी की उम्र दो या चार दिन ही होती है। काश ऐसा मुमकिन हो जाए। यह नई पार्टी सोशल मीडिया पर जन्मी है और अमेरिका में बैठे एक 30 वर्षीय भारतीय ने अपने ‘सोशल मीडिया पेज’ पर ही इसका गठन घोषित किया है। इस दिशाहीन आक्रोश का आलम यह है कि अब सोशल मीडिया पर इसके 1.7 करोड़ ‘फॉलोअर’ हो गए हैं। यह संख्या निरंतर बढ़ रही…

प्रश्न किसी शब्द विशेष के नाम पर सोशल मीडिया किसी एक ऑपरेटर द्वारा एक नई पार्टी की स्थापना तक सीमित नहीं है। प्रश्न गंभीर है और व्यापक भी। वैसे किसी भी हंगामे या सनसनी की उम्र दो या चार दिन ही होती है। काश ऐसा मुमकिन हो जाए। यह नई पार्टी सोशल मीडिया पर जन्मी है और अमेरिका में बैठे एक 30 वर्षीय भारतीय ने अपने ‘सोशल मीडिया पेज’ पर ही इसका गठन घोषित किया है। इस दिशाहीन आक्रोश का आलम यह है कि अब सोशल मीडिया पर इसके 1.7 करोड़ ‘फॉलोअर’ हो गए हैं। यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। 30 वर्षीय इस युवा अभिजीत दिपके का संबंध महाराष्ट्र से है और परिवार छत्रपति संभाजी नगर में रहता है। वह एक पेशेवर राजनैतिक-संचार रणनीतिकार है। वर्ष 2022-23 में ‘आम आदमी पार्टी’ के आईटी प्रकोष्ठ से जुड़ा रहा है।
अब इस अभियान के खिलाफ भी कुछ टैली-रणनीतिकार समानांतर ‘रूप’ से पेज बनाने व सोशल मीडिया पर सक्रिय होने में जुट गए हैं। सोशल मीडिया पर इस घात-प्रतिघात की रोकथाम का भी कोई उपाय नहीं, मगर चिंता इस बात की है कि इसी तर्ज पर विश्व में किसी भी देश का कोई रणनीतिकार कोई भी मुहिम छेड़कर देश के अधिकांश युवाओं का ध्यान भटका सकता है। ऐसे माहौल में सबसे बड़ा खतरा यही रहता है कि अपने-अपने प्रोफेशनल कैरियर में लगे युवा वैज्ञानिक युवा, सोशल युवा छात्र, युवा पत्रकार इसी ‘मीडिया पेज’ पर ध्यान केंद्रित रखेंगे। इस सारे घटनाक्रम से यह भी पता चलता है कि अब इंस्टाग्राम व अन्य सोशल मीडिया चैनल, कभी-कभी प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी हावी होने लगे हैं।
यह समूचा घटनाक्रम देश के अग्रणी लोगों को भी चेता रहा है कि भविष्य में वे किसी भी विवादास्पद टिप्पणी से दूरी बनाए रखें। देश के सीजेआई एक सुसंस्कृत परिवार से हैं और निचली पायदान से अपनी बौद्धिक क्षमता व सतत परिश्रम से शिखर तक पहुंचे हैं। यदि वह ऐसी किसी टिप्पणी से परहेज़ रखते तो बेहतर रहता। न्यायिक-प्रणाली व न्यायिक सक्रियता के क्षेत्र में उनकी कुछ टिप्पणियों का व्यापक स्वागत भी हुआ है। बेहतर होता कि वह अपने पद की गरिमा के अनुरूप ऐसी किसी भी टिप्पणी से परहेज़ करते, जो उनके कद व प्रतिष्ठा पर हल्की सी भी खरोंच डाल सके।
अब यह प्रश्न भी बेमानी है कि इस ‘सोशल मीडिया चैनल’ के पीछे किसका हाथ है? हो सकता है कि यह एक सहज युवा-आक्रोश का मामला हो और यह भी संभव है कि किसी प्रतिपक्षी दल ने इसे अपनी रणनीति का माध्यम बनाया हो। ऐसे सिलसिले तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक सहज अंग बन चुके हैं। ये सिलसिले अतीत में कुछ साहित्यिक संस्थानों की कार्यप्रणाली को लेकर भी चले हैं। लेकिन ऐसे सिलसिले तो जारी रहेंगे और बेहतर है कि उनकी ज़द में आने से बचा जाए। हालांकि वर्षों पहले कवि दुष्यंत ने अपनी एक काव्य टिप्पणी में चेताया भी था- आप बचकर चल सकें, ऐसी कोई सूरत नहीं, मगर जब तक ये तूफान किसी अगले नए हंगामे के लिए रास्ता नहीं छोड़ता, तब तक यह सब सिलसिले तो चलते रहेंगे।
प्रश्न यह भी है कि क्या ऐसे किसी अभियान का इतना व्यापक प्रयोग किसी सकारात्मकता के लिए चलेगा। युवाओं में ‘स्टार्ट अप्स’ के लिए बाजार जुटाने व उन्हें ठोस व्यावहारिक धरातल पर खड़ा करने में मदद व समूचा दिशा ज्ञान अभी भी बकाया है। इसी दिशा में पाकिस्तान की एक युवा अदीब वरदा शहज़ादी द्वारा सोशल मीडिया पर सक्रियता को भी प्रेरक आधार बनाया जा रहा है। अपने देश पाकिस्तान के जहरीले माहौल में भी वह सोशल मीडिया पर ‘अमृता की बैठक’ और ‘पंजाबी गर्ल स्पीक्स’ सरीखी साहित्यिक बैठकें व ‘लिट फेस्ट’ आयोजित करती है।
शहज़ादी ने नई दिल्ली स्थित दक्षिण-एशियाई यूनियन से समाज शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की और बाद में लाहौर के जीसी विश्वविद्यलाय से उर्दू साहित्य में बीए ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की। वह सोशल मीडिया पर ‘लहंदा पंजाब’ व ‘चढ़दा पंजाब’ के विषयों पर लगातार सक्रिय रहती है। यह अलग बात है कि वहां के ‘लाहौर लिट फेस्टिवल’ या ‘कराची लिट फेस्ट’ में उसे विशेष महत्व नहीं दिया जाता लेकिन गुजरांवाला की यह बेटी पाकिस्तान की एक बेहद लोकप्रिय डिजिटल कंटेंट क्रिएटर, कहानीकार और प्रस्तुतकर्ता है, से मुख्य रूप से सोशल मीडिया पर ‘द पंजाबी गर्ल’ के नाम से जाना जाता है। वह अपनी भावुक प्रस्तुतियों के जरिए मशहूर पंजाबी कवयित्री अमृता प्रीतम की यादों, उनके जीवन और उनके अमर साहित्य को जीवित रखने का काम कर रही है। चूंकि अमृता प्रीतम का निधन साल 2005 में हो गया था, इसलिए वरदा शहजादी और अमृता प्रीतम के बीच सीधे तौर पर कोई मुलाकात या समकालीन ‘साहित्यिक बैठक’ संभव नहीं थी। इसके बावजूद, वरदा शहजादी ने अपने वीडियो, पॉडकास्ट और वर्चुअल साहित्यिक सत्रों के माध्यम से अमृता प्रीतम के साथ एक गहरा ‘वैचारिक और रूहानी’ संवाद स्थापित किया है।
वर्चुअल साहित्यिक बैठकों के मुख्य विषय अपने डिजिटल मंचों (जैसे यूट्यूब और फेसबुक) पर जो वीडियो सीरीज और चर्चाएं लाती हैं, उन्हें अमृता के प्रशंसकों द्वारा एक आधुनिक ‘साहित्यिक बैठक’ की तरह देखा जाता है। इन बैठकों के मुख्य पहलू हैं- ‘विभाजन का दर्द और ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं।’ वरदा अपनी बैठकों में भारत-पाकिस्तान विभाजन (1947) पर लिखी अमृता की सबसे प्रसिद्ध कविता ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं’ को बेहद मार्मिक ढंग से बयां करती हैं। वह दोनों पंजाबों (चढ़दा और लहंदा पंजाब) के बीच सांस्कृतिक सेतु का काम करती हैं। साहिर, इमरोज और अमृता का त्रिकोण वरदा ने अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ के अंशों को अपनी बैठकों का हिस्सा बनाया है। वे साहिर लुधियानवी के लिए अमृता के अनकहे प्यार और चित्रकार इमरोज के साथ उनके अनूठे सह-जीवन के अनछुए पहलुओं को दर्शकों के सामने रखती हैं।

Dr. Chander Trikha