सोशल मीडिया : क्या सही-क्या गलत

Summary :

आज जमाना बदल रहा है और सोशल मीडिया सब पर हावी हो रहा है। सोशल मीडिया अपने आप में बुरा नहीं है। सही इस्तेमाल हो तो यह बहुत उपयोगी माध्यम है। शिक्षा, ज्ञान आसानी से मिलता है। दुनिया भर की जानकारी कुछ सैकेंडों में मिल जाती है। बच्चों को नई भाषाएं, कला, विज्ञान और तकनीक सीखने का अवसर मिलता है। परिवार और दूर रहने वाले लोगों से सम्पर्क बना रहता है। प्रतिभाशाली बच्चों, युवकों, महिलाओं को अपनी कला दिखाने का मंच मिलता है। सामाजिक जागरूकता और आपदा के समय सहायता पहुंचाने में मदद मिलती है। छोटे व्यवसाय और रोजगार के…

आज जमाना बदल रहा है और सोशल मीडिया सब पर हावी हो रहा है। सोशल मीडिया अपने आप में बुरा नहीं है। सही इस्तेमाल हो तो यह बहुत उपयोगी माध्यम है। शिक्षा, ज्ञान आसानी से मिलता है। दुनिया भर की जानकारी कुछ सैकेंडों में मिल जाती है। बच्चों को नई भाषाएं, कला, विज्ञान और तकनीक सीखने का अवसर मिलता है। परिवार और दूर रहने वाले लोगों से सम्पर्क बना रहता है। प्रतिभाशाली बच्चों, युवकों, महिलाओं को अपनी कला दिखाने का मंच मिलता है। सामाजिक जागरूकता और आपदा के समय सहायता पहुंचाने में मदद मिलती है। छोटे व्यवसाय और रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब सोशल मीडिया का कम उम्र में अनियंत्रित इस्तेमाल हो। रील्स, शार्ट वीडियो आैर लगातार नोटिफिकेशन बच्चों का ध्यान पढ़ाई और खेल से हटकर स्क्रीन पर ले जाता है। दूसरों का आदर्श जीवन या दिखावे वाली जिन्दगी देखकर बच्चे अपने जीवन की तुलना करने लगते हैं। लाइक, फॉलोवर्स और कमेंट उनके आत्मविश्वास को प्रभावित करते हैं। सबसे बुरी बात जब गलत और अश्लील सामग्री तक बच्चे पहुंच जाते हैं। जिनका अभी मानसिक विकास भी नहीं होता। अभी की भारत सरकार ने भी बच्चों से संबंधित हानिकारक और यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के खिलाफ प्लेटफार्म को तेज कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। साइबर बुलिंग भी बहुत हो रही है। मजाक, गाली, ट्रोलिंग आैर हुमिलेशन आदि ऑनलाइन बहुत तेजी से फैलते हैं। एक छोटी घटना पूरे स्कूल या शहर तक पहुंच जाती है। इससे भी कहीं गलत बात कि अजनबी लोग फेक आइडेंटी बनाकर बच्चों से दोस्ती कर सकते हैं और उनका विश्वास जीतने की कोशिश कर सकते हैं। बच्चों के ​लिए यह गम्भीर सुरक्षा जोखिम है। यहां तक कि बच्चा घर में मौजूद होकर भी परिवार से मानसिक रूप से दूर हो सकता है। बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज्यादा हो जाता है। गाली-गलौच, हिंसा, असभ्य और दूसरों का मजाक उड़ाने वाली सामग्री को बार-बार देखने से कुछ बच्चों में वही व्यवहार सामान्य लगने लगता है।
इसीलिए बच्चों के लिए प्रतिबंध की बात भी हो रही है, क्योंकि बच्चे अभी सही और गलत, वास्तविक और झूठ के बीच अंतर करने की असमझ में होते हैं, इसलिए उन्हें वयस्कों जैसी पूरी डिजिटल ​फ्रीडम देना हमेशा उचित नहीं माना जा सकता।
इसी कारण दुनिया में कई देशों में माइनर के लिए उम्र के आधार पर प्रतिबंध पर चर्चा हो रही है। भारत में भी 8-12, 12-16 और 16-18 वर्ष जैसे अलग-अलग आयु वर्ग के लिए अलग रक्षा के उपायों पर विचार किया जा रहा है। यह केवल भारत की चिंता नहीं है, हाल ही में अमेरिका के न्यू मैक्सिको में मेटा के खिलाफ बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामले में अदालत ने कड़े रक्षात्मक नियम बनाने का आदेश दिया है।
मेरे विचार में पूर्ण प्रतिबंध से ज्यादा जरूरी है सु​रक्षित प्रतिबंध। मेरे अनुसार बच्चों के ​लिए तीन स्तर होने चाहिए। छोटे बच्चों को सोशल मीडिया से लगभग दूरी, केवल शिक्षात्मक और माता-पिता की देखरेख के साथ रुचि, उसके बाद किशोरों को सीमित समय के लिए छूट माता-पिता की देखरेख में हो और रात में सोशल मीडिया का उपयोग करने पर रोक, साथ ही 16-18 वर्ष पूरी तरह रोक लगाने की बजाय जिम्मेदारी से इस्तेमाल, प्राइवेसी से जुड़ी शिक्षा, साइबर सेफ्टी और माता-पिता का मार्गदर्शन। इसलिए केवल बैन लगा देना समाधान नहीं है। बच्चे काेई न कोई रास्ता निकाल लेंगे। इसलिए प्रौद्योगिकी, माता-पिता, स्कूल, सरकार, सोशल ​मीडिया से जुड़ी कम्पनियां सभी को जिम्मेदारी लेनी होगी। सोशल मीडिया ज्ञान का माध्यम भी बन सकता है और संस्कारों के संरक्षण का माध्यम भी।

Kiran Chopra