लोकसभा में इसके अध्यक्ष श्री ओम बिरला के विरुद्ध विपक्षी सांसदों ने उन्हें पद से हटाये जाने की अनुरोध सूचना सदन के महासचिव को सौंप दी है जिस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं अतः अब आगे की कार्रवाई के लिए सदन के नियमानुसार प्रक्रिया चलेगी और इस अविश्वास प्रस्ताव पर सदन के भीतर चर्चा कराई जायेगी । अभी तक जो सूचना मिल रही है उसके अनुसार चालू बजट सत्र के दूसरे चरण के शुरू होने पर इस प्रस्ताव पर 9 मार्च को सदन में बहस कराई जायेगी जिसके बाद मतदान होगा, जिसमें प्रस्ताव के स्वीकृत या होने का फैसला हो जायेगा। मगर एक समस्या यह खड़ी हो सकती है कि सदन में फिलहाल कोई भी उपाध्यक्ष नहीं है। लोकसभा में उपाध्यक्ष पद पिछली लोकसभा से ही खाली पड़ा हुआ है। इस पद को पिछली लोकसभा में भी भरने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई थी और 2024 में नई लोकसभा के गठन के बाद भी इसे अभी तक नहीं भरा गया है जबकि उपाध्यक्ष का पद भी पूरी तरह संवैधानिक पद होता है और इसके पास भी अध्यक्ष के समान ही सदन को चलाने के लिए पूरे अख्तियार होते हैं मगर इस पद को भरे जाने की जिम्मेदारी अध्यक्ष पर ही होती है क्योंकि संविधान के अनुसार वह ही इस पद के चुनाव की घोषणा व अधिसूचना जारी करते हैं।
सदन की यह भी परंपरा रही है कि उपाध्यक्ष पद विपक्षी सदस्यों में से किसी एक को दिया जाता है जिससे सदन की कार्यवाही पूरी तरह निष्पक्ष होकर चलती दिखे व आसन पर सत्ता व विपक्ष दोनों की तरफ के सदस्यों का विश्वास अडिग रहे। इसकी मूल वजह यह है चूंकि अध्यक्ष पारंपरिक रूप से सत्ता पक्ष के ही बनते हैं अतः उपाध्यक्ष पद विपक्ष को देकर सदन में सन्तुलन बनाकर रखा जाये जिससे अध्यक्ष का आसन सही मायनों में विक्रमादित्य का आसन समझा जा सके। परन्तु हम जानते हैं कि वर्तमान समय की कर्कश राजनीति में परम्पराएं टूट रही हैं। संसद में सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों दुश्मनों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। यह स्थिति संसदीय लोकतन्त्र के लिए बहुत अप्रिय है मगर राजनीतिक तौर पर इसका औचित्य दोनों ही तरफ से ढूंढा जा रहा है। अब सवाल यह है कि सदन में उपाध्यक्ष के न होने से श्री बिरला को पद से हटाये जाने की बहस के दौरान बैठकों की सदारत कौन करेगा। वैसे तो सदन में अध्यक्ष की अनुपस्थिति में सभा की अध्यक्षता करने के लिए सभापतियों का एक पूरा पैनल है। जाहिर है कि प्रस्ताव की सुनवाई के दौरान इन्हीं में से किसी वरिष्ठतम सदस्य का चुनाव होगा। मगर सदन में इससे पूर्व एेसा कोई उदाहरण नहीं है अतः सदन की संवैधानिक नियमावली के अनुसार ही कोई न कोई रास्ता निकाला जायेगा। वैसे इस अवसर पर लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष स्व. जी.वी. मावलंकर के उस कथन की तरफ ध्यान दिये जाने की जरूरत है जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारी संसद में एक दिन वह भी आ सकता है जब इसके अध्यक्ष पर सदन से बाहर के किसी निष्पक्ष व्यक्ति को बैठाने की मांग होने लगे। स्व. मावलंकर ने ये शब्द एक संसदीय प्रणाली पर आयोजित समारोह में ही व्यक्त किया थे। स्वयं उनके विरुद्ध ही 1954 में लोकसभा में उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव लाया गया था क्योंकि विपक्ष के कुछ सांसदों का आरोप था कि अध्यक्ष उनके साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। बेशक वह प्रस्ताव भारी मतों से गिर गया था मगर उस पर सदन में खुलकर बहस हुई थी और विपक्षी सांसदों ने अपनी बातें बेबाक होकर कहीं थीं। जबकि स्व. मावलंकर लोकसभा अध्यक्ष के पद को पूरी तरह सरकार से निरपेक्ष बनाये रखने के उत्प्रेरक थे और उन्हीं के प्रयासों से अध्यक्ष का पृथक सचिवालय स्थापित हुआ था जिससे अध्यक्ष को किसी भी बात पर सरकार पर निर्भर न रहना पड़े और वह सदन के भीतर सभी पक्षों के सदस्यों के साथ पूर्ण न्याय कर सकें और सदन के भीतर प्रत्येक सदस्य के अधिकारों का संरक्षण निर्भय होकर बिना किसी राग-द्वेष के कर सकें।
अध्यक्ष के खिलाफ जब उन्हें पद से हटाये जाने का प्रस्ताव सदन में स्वीकृत हो जाता है और उस पर बहस शुरू हो जाती है तो अध्यक्ष अपने आसन पर नहीं बैठ सकते और उन्हें सामान्य सांसदों के साथ ही बैठना पड़ता है। वह प्रस्ताव पर होने वाली बहस में भी हिस्सा नहीं ले सकते क्योंकि बहस का विषय उन्हीं का आचरण होता है और न ही मतदान में भाग ले सकते हैं। अतः श्री बिरला का यह निर्णय समायोचित है कि उन्होंने प्रस्ताव पर फैसला हो जाने तक सदन में न आने की मंशा जाहिर की है लेकिन विपक्ष को भी यह विचार करना चाहिए कि जब अध्यक्ष के विरुद्ध वह प्रस्ताव लाता है तो लोकतन्त्र के लिए उसके मायने बहुत गंभीर होते हैं। बेशक हमने अध्यक्ष के चुनाव की सर्वसम्मत परम्परा को तिलांजिली दे दी है मगर उस पद की मर्यादा को कायम रखने का दायित्व सभी पक्षों का बनता है। मर्यादा तो यह भी कहती थी कि जब अध्यक्ष श्री बिरला ने विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी को अवकाश प्राप्त जनरल नरवणे की पुस्तक का हवाला न दिये जाने पर अपना अिन्तम फैसला दे दिया था तो वह इसका जिक्र अपने भाषण में न करते और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर अपनी बात को दूसरी तरह से कहते। मगर उन्होंने एेसा करने का कोई प्रयास नहीं किया और अपनी जिद पर अड़े रहे। लोकतन्त्र कभी भी ‘जिद’ से नहीं चलता है, बल्कि यह ‘जहन’ से चलता है। वक्त का तकाजा था कि विपक्ष के नेता कोई एेसा बीच का रास्ता निकालते जिससे राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर वह अपनी बात बिना किताब का सन्दर्भ दिये ही कह पाते लेकिन दुर्भाग्य से एेसा संभव नहीं हो सका और सत्ता पक्ष भी जिद पर अड़ गया, जिसकी वजह से आज ये हालात बने। अब लोकसभा से यही उम्मीद की जानी चाहिए कि अविश्वास प्रस्ताव पर जब आगामी 9 मार्च को सदन में बहस हो तो पूरी तरह शान्त और गरिमामयी वातावरण में हो। मगर इसमें अभी बहुत समय बाकी है और इस दौरान राजनीति क्या-क्या रंग लायेगी, कोई कुछ नहीं कह सकता क्योंकि देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा भी होनी है।




















