पंजाब जिसे गुरुओं पीरों की धरती कहा जाता और खासकर अमृतसर शहर जिसमें सिखों का सबसे पवित्र धार्मिक स्थल श्री दरबार साहिब जिसके प्रति आज सिख ही नहीं बल्कि गैर सिखों में भी पूर्ण आस्था है और देश विदेश से हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन इस पवित्र स्थल पर नतमस्तक होकर अपना अकीदा गुरु चरणों मंे भेंट करते हैं, मगर वहीं कुछ कट्टरपंथी संगठन समय-समय पर खालिस्तानी गतिविधियों को बढ़ावा देकर माहौल खराब करने और समूचे संसार में सिखों की बदनामी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। बीते दिनों जब समूचा देश गणतन्त्र दिवस का जश्न मनाने में लगा था तो उस दौरान एक बार फिर से श्री दरबार साहिब परिसर में आकर खालिस्तानी समर्थकों ने माहौल खराब करने और आपसी भाईचारे को खराब करने की मंशा से खुलेआम खालिस्तानी नारे लगाए। हैरानी तो इस बात की भी है कि प्रशासन के द्वारा इन्हें शुरूआत में ही क्यों नहीं रोका गया जिससे कहीं न कहीं पंजाब की सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े होते हैं। खालिस्तानी समर्थक हैरिटेज स्थल, भरावां दा ढाबा से खालिस्तानी नारे लगाते हुए श्री दरबार साहिब की ओर कूच कर रहे थे जो कि 2 किलोमीटर के करीब का रास्ता है अगर प्रशासन उन्हें वहीं रोक लेता तो शायद वह श्री दरबार साहिब परिसर में दाखिल ही न होते। अगर शिरोमणि कमेटी ने सूझबूझ से काम न लिया होता तो शायद कट्टरपंथियों और कमेटी स्टाफ में खूनी झड़प भी हो सकती थी।
वैसे तो अब सभी लोग इस बात को समझ चुके हैं कि भारत का कोई भी सिख खालिस्तान का समर्थक नहीं हैं। चंद लोग ही हैं जो समय समय पर खालिस्तान के नारे लगाते रहते हैं जिसके लिए शायद उन्हंे विदेशों से फंडिंग होती है। विदेशों में बैठकर गुरपतवंत सिंह पन्नू जैसे लोग हैं जो इन लोगों से ऐसा करवाते रहते हैं। दिल्ली में भी पुलिस ने 2 लोगों को हिरासत में लिया जिन्हें गुरपतवंत सिंह पन्नू जैसों के द्वारा दिल्ली की दीवारों पर खालिस्तानी नारे लिखने की जिम्मेवारी दी गई थी, मगर दिल्ली पुलिस की चौकसी ने उन्हें पहले ही काबू कर लिया। पंजाब केवल एक राज्य नहीं, बल्कि गुरुओं की तपोभूमि, शहीदों की कर्मभूमि और मेहनतकश किसानों-मजदूरों की धरती है। इस मिट्टी ने देश को अन्न दिया, आज़ादी की लड़ाई में सबसे ज्यादा बलिदान दिए और सीमाओं पर खड़े होकर राष्ट्र की रक्षा की, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज चंद लोग खालिस्तानी नारों के ज़रिये पंजाब के शांत माहौल को फिर से अशांत करने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली को खालिस्तान बनाने जैसे धमकी भरे ईमेल भेजकर, स्कूलों और संसद को बम से उड़ाने वाले धमकी भरे ईमेल भेजकर दहशत फैलाई जा रही है। 1980 और 90 के दशक का पंजाब आज भी लोगों के ज़हन में ज़िंदा है। बड़ी मेहनत से पंजाब ने उस अंधेरे से निकलकर दोबारा सामान्य जीवन पाया। इसका सबसे ज्यादा नुक्सान पंजाब के युवाओं का हो रहा है। बेरोज़गारी, नशा, विदेश पलायन और भविष्य की चिंता पहले से ही उन्हें परेशान कर रही है। ऐसे में सोशल मीडिया पर भावनात्मक वीडियो, अधूरी कहानियां और भड़काऊ भाषण दिखाकर उन्हें उकसाया जाता है।
टाइगर अभी जिन्दा है : टाइगर अभी जिन्दा है यह किसी फिल्म का डॉयलाग लग रहा होगा मगर इन शब्दों का प्रयोग शिरोमणि अकाली दल के नेता विक्रम सिंह मजीठिया ने जेल से बाहर आकर अपने समर्थकों का हौंसला बढ़ाने और विरोधियों को चेतावनी देने हेतु किया गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि मजीठिया के जेल से रिहाई ने वैंटीलेटर पर जाती शिरोमणि अकाली दल को नया जीवनदान दिया है। सूत्रों की मानें तो सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की इच्छा थी कि विक्रम सिंह मजीठिया को 2027 के आम चुनावों तक जेल में रखा जाए जिससे उन्हें शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ प्रचार करने का पूरा मौका मिले। मजीठिया का संदेश अकाली कार्यकर्ताओं के लिए ऊर्जा है और आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए सीधी चुनौती। अब विपक्ष की राजनीति सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सड़क से सदन तक संघर्ष का रूप ले सकती है। पंजाब की सियासत में लंबे समय बाद ऐसा दिन आया जब एक रिहाई ने पूरे राजनीतिक माहौल में हलचल पैदा कर दी। शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता विक्रम सिंह मजीठिया की जेल से वापसी सिर्फ एक व्यक्ति की आज़ादी नहीं है, बल्कि यह उस राजनीति की वापसी है, जो आक्रामक तेवर, संगठनात्मक पकड़ और सत्ता से सीधी टक्कर के लिए जानी जाती है। मजीठिया जब जेल में थे, तब अकाली दल की राजनीति कुछ हद तक रक्षात्मक हो गई थी। पार्टी का हमला सीमित था और नेतृत्व का एक बड़ा चेहरा मैदान से बाहर था।
उनकी अनुपस्थिति में अकाली दल वह धार नहीं बना पाया, जो कभी उसकी पहचान थी। अब मजीठिया की वापसी से पार्टी को फिर से आक्रामक विपक्ष की आवाज़ मिल गई है। अब तक सरकार मजीठिया की गिरफ्तारी को ‘नशे के खिलाफ कार्रवाई’ के रूप में पेश करती रही। लेकिन रिहाई के बाद विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताकर जनता के बीच ले जाएगा। मुख्यमंत्री भगवंत मान के द्वारा रिहाई से पूर्व जेल में मजीठिया से मिलने पहुंचे डेरा ब्यास मुखी गुरिन्दर सिंह ढिल्लो पर जिस प्रकार तंज कसा गया उससे भी जनता काफी खफा दिखाई दे रही है। वहीं दिल्ली से शिरोमणि अकाली दल नेता परमजीत सिंह सरना ने साफ कहा कि एक धार्मिक डेरे के मुखी का जेल में मजीठिया से मुलाकात करना और बाहर आकर मीिडया से रुबरु होकर यह कहना कि वह उनके दोस्त, रिश्तेदार हैं, और बेकसूर हैं दर्शाता है कि मजीठिया ही नहीं समूचे शिरोमणि अकाली दल को बिना वजह बदनाम किया जा रहा है।
गुरुद्वारा अंब साहिब जमीन बिक्री मामले में धामी की छवि धूमिल : सिख धर्म के गुरुद्वारे केवल इमारतें नहीं होते, वे आस्था, इतिहास और संगत के विश्वास का केंद्र होते हैं। लेकिन जब इन्हीं धार्मिक स्थलों की संपत्ति पर सवाल खड़े होने लगें, तो मामला केवल काग़ज़ों तक सीमित नहीं रहता, वह समाज की आत्मा को झकझोर देता है। मोहाली स्थित गुरुद्वारा श्री अंब साहिब की ज़मीन बेचने को लेकर उठा विवाद आज संसार भर में चर्चा का विषय बन चुका है। बताया जा रहा है कि गुरुद्वारे की बेशक़ीमती ज़मीन जिसकी कीमत करोड़ों में है उसे मात्र एक करोड़ बत्तीस लाख मंे बेच दिया गया और जब मामला तूल पकड़ने लगा तो अध्यक्ष हरजिन्दर सिंह धामी के द्वारा एक मैनेजर पर कार्रवाई कर मामला शान्त करने के प्रयास किए गए जिससे इस धांधली के छिंटे उनके दामन पर भी पड़ते दिखाई दे रहे हैं। हर कोई सोचने को मजबूर है कि किसी भी संस्था में कार्यरत किसी मुलाजिम की इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि इतनी बड़ी धांधली को अंजाम दे सके जब तक उसके पीछे कोई बड़ी ताकत ना हो। इसमें भी शिरोमिण अकाली दल या शिरोमणि गुरुद्वारा कमेटी के कई बड़े नेतागण शामिल हो सकते हैं जिसकी जांच निश्चित तौर पर होनी चाहिए। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका, महासचिव जगदीप सिंह काहलो सहित अन्य सिख जत्थेबंदियों के द्वारा मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार साहिब से भी गुहार लगाई गई है कि इस मामले पर कार्रवाई की जाए वहीं पंजाब सरकार को भी चाहिए कि किसी सरकारी एजेन्सी के द्वारा जांच करवाई जाए।























