पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकंद नरवणे की अप्रकाशित किताब फ़ोर स्टारज़ ऑफ डेसटिनीको लेकर संसद में खूब हंगामा हो रहा है। राहुल गांधी विशेष तौर पर बहुत उत्तेजित हैं। वह किताब पर चर्चा की ज़िद्द कर रहे हैं जबकि सत्तापक्ष भी अड़ गया है कि क्योंकि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई, इसलिए उस पर बहस नहीं हो सकती। राहुल गांधी ने संसद के बाहर ‘किताब’ की कापी पत्रकारों को दिखा भी दी पर यह बाज़ार में नहीं आई क्योंकि रक्षा मंत्रालय ने इसकी अनुमति नहीं दी, लेकिन इसके कुछ अंश एक पत्रिका में छप चुके हैं और इसका पीडीएफ़ उपलब्ध बताया जाता है। जनरल नरवणे ने इस बात का प्रतिवाद नहीं किया कि उन्होंने यह किताब लिखी है।
इस अप्रकाशित किताब का विवादित हिस्सा जून 2020 में लद्दाख के रचिन ला के पास गलवान में भारत और चीन के बीच टकराव से सम्बंधित है। इस टकराव में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे और चीन के 4 सैनिक मारे गए थे। चीन के हताहतों के बारे स्थिति अस्पष्ट है। कई विदेशी एजेंसियों ने बताया है कि 45 चीनी सैनिक मारे गए थे। जनरल नरवणे के अनुसार उन्हें सूचना मिली कि चार चीनी टैंक भारतीय सैनिकों का तरफ़ बढ़ रहे हैं। इन सैनिकों ने कैलाश हाईट्स पर क़ब्ज़ा कर लिया था। तब जनरल ने ऊपर फ़ोन कर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से पूछा कि उन्हें कार्यवाही का क्या आदेश है? जनरल नरवणे के अनुसार, “कुछ घंटों के बाद राजनाथ सिंह ने वापस फ़ोन किया। उन्होंने बताया कि वह पीएम से बात कर चुके हैं और यह विशुद्ध सैन्य निर्णय है, जो उचित समझो वह करो”। इस पर जनरल नरवणे बताते हैं कि उन्हें ‘हॉट पोटैटो’ अर्थात् अप्रिय मामला सौंप दिया गया। वह महसूस कर रहे थे कि जैसे सरकार ने उन्हें अकेले छोड़ दिया। उन्हें ‘काटब्लांष’ अर्थात् कार्यवाही करने का पूर्णाधिकार दे दिया गया। उन्हें ही देखना था कि कार्यवाही के राजनीतिक और आर्थिक परिणाम क्या हो सकते हैं ?
इसी को अब राहुल गांधी ने पकड़ लिया है। विशेष तौर पर जो उचित समझो वह करो को राहुल राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी के तौर पर प्रदर्शित कर रहे हैं। उनका आरोप है कि नेतृत्व ने इस टकराव में स्पष्ट निर्देश नहीं दिए। पर,जो उचित समझो वह करो में अनुचित है क्या? पूर्व सेनाध्यक्ष शिकायत तब करते अगर राजनीतिक नेतृत्व उनके हाथ बांध देता कि तुम कुछ नहीं करोगे। यहां तो उल्टा खुला हाथ दिया गया है। एक सैनिक जनरल के लिए तो यह गर्व की बात होनी चाहिए कि राजनीतिक नेतृत्व उनकी क्षमता पर पूरा विश्वास कर रहा है। ज़मीन पर स्थिति के बारे सैनिक नेतृत्व को अधिक पता होता। जब दुश्मन बढ़ रहा है तो जल्द निर्णय लिया जाना चाहिए। वह समय बैठकों का नहीं होता। ऐसे समय में प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री ने सेनाध्यक्ष पर पूरा विश्वास प्रकट कर बिल्कुल उचित किया, अगर राजनीतिक नेतृत्व सैनिक निर्णय लेने लगे तो ग़लत कार्यवाही हो सकती है। हमारे अपने इतिहास में दो प्रमुख उदाहरण है।
सितंबर 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान पंजाब सैक्टर में भीषण युद्ध चल रहा था। उस वक्त लै. जनरल हरबक्श सिंह जो पश्चिमी कमान के जीओसी-इन-सी थे, को सेनाध्यक्ष जनरल जे.एन. चौधरी का मौखिक आदेश आया कि वह 11 कोर जो लाहौर की तरफ़ बढ़ रही थी, को ब्यास नदी के पीछे वापस बुला लें। इसका अर्थ था कि पंजाब के मांझा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा जिसमें अमृतसर शहर भी शामिल था, पाकिस्तान के अधीन जा सकता था। जनरल चौधरी को आशंका थी कि पाकिस्तान की सेना भारतीय सेना को घेर लेगी और बहुत नुक़सान होगा, पर जनरल हरबक्श सिंह ने आदेश मानने से इंकार कर दिया जिसका ब्यौरा उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी दिया है। उन्होंने अपने सेनाध्यक्ष से कहा कि या आप लिखित आदेश दीजिए या खुद मोर्चे पर आकर युद्ध का संचालन करें, मैं वापिस नहीं जाऊंगा। अगले ही दिन स्थिति सुधर गई और प्रसिद्ध बैटल ऑफ असल उत्तर में हमारी सेना ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए। जनरल हरबक्श सिंह की दृढ़ता ने पंजाब को बचा लिया और देश ऐसी पराजय से बच गया जैसी 1962 में मिली थी।
यह स्थानीय कमांडर की हिम्मत, नेतृत्व और सोच का परिणाम था। उनका कारनामा सेना की शौर्य गाथाओं का हिस्सा बन चुका है। युद्ध के बाद कृतज्ञ देश ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी कार्यवाही में यह संदेश है कि नाज़ुक समय में कमांडर को खुद साहसिक निर्णय लेने पड़ते है। कमांडर उपर की तरफ़ देखता नहीं रह सकता, अगर जनरल हरबक्श ऊपर की बात मानते तो ब्यास नदी तक का सारा क्षेत्र, स्वर्ण मंदिर समेत, बिना लड़े हाथ से निकल जाता। उन्होंने वह किया जिसे उन्होंने ‘उचित’ समझा। इससे विपरीत दूसरी मिसाल 1971 की लड़ाई से है। जनरल सैम मानिकशॉ के अपने कथन के अनुसार, पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन पर बहुत दबाव डाला कि वह तुरंत कार्यवाही करें। इंदिरा गांधी ने साफ़ कहा कि “ मैं चाहती हूं कि आप पूर्वी पाकिस्तान में दाख़िल हो जाएं”। यह अप्रैल 1971 की बात है। मानिकशॉ ने उत्तर दिया कि इसका मतलब युद्ध होगा। इंदिरा गांधी का जवाब था कि अगर युद्ध होता है तो होने दो। मानिकशॉ ने कहा कि हम तैयार नहीं हैं। मानसून शुरू होने वाली है और “अगर प्रधानमंत्री आप मुझे यह करने को कहेंगी तो मैं 100% गारंटी दे सकता हूं कि हम पराजित हो जाएंगे। मुझे समय चाहिए”। इस पर इंदिरा गांधी रुक गईं। सैम मानिकशॉ ने सेना को तैयार किया और दिसम्बर, 1971 में निर्णायक जीत हासिल की। 16 दिसम्बर, 1971 को पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बन गया। यह भारत के इतिहास का स्वर्णिम क्षण रहेगा।
प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष के बीच यह वार्तालाप कैबिनेट की बैठक में हुआ। इंदिरा गांधी नाराज़ नहीं हुई कि उनकी बात मानी नहीं गई उल्टा जनरल सैम मानिकशॉ को उनके योगदान को देखते हुए जनवरी 1973 में फील्ड मार्शल बना दिया गया। प्रधानमंत्री ने सेनाध्यक्ष की बात मान ली और सेनाध्यक्ष ने अपना वादा पूरा कर दिखाया। दोनों ने उच्च नेतृत्व दिखाया, पर उल्लेखनीय है कि जनरल हरबक्श सिंह की ही तरह जनरल मानिकशॉ ने भी वही किया जिसे उन्होंने उचित समझा।
एक ने कार्यवाही न करने का आदेश नहीं माना तो दूसरे ने कार्यवाही करने का आदेश मानने से इंकार कर दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध भी ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है जहां स्थानीय कमांडर ने वह किया जिसे उस उचित समझा क्योंकि युद्ध की स्थिति में हर बार आदेश की इंतज़ार नहीं किया जा सकता। आशा है सरकार पर से रोक हटा लेगी। इसके बारे रक्षात्मक होने की ज़रूरत नहीं। वैसे भी एक ज़िम्मेवार उच्च सैनिक अधिकारी के लिखे को रोका क्यों जाए?
पर इस विवाद को लेकर संसद में जो कुछ चल रहा है उसे उचित नहीं कहा जा सकता। विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने से नहीं रोका जाना चाहिए। उनका भी एक मसले को लेकर संसद को ठप्प करने का प्रयास सही नहीं है। वह तो धमकी दे रहे थे कि वह ‘किताब’ की कापी प्रधानमंत्री को सौंपेंगे। इस तमाशे की क्या ज़रूरत है? लोग चाहते हैं कि संसद में उन मुद्दों पर बात हो जो उनको प्रभावित करते हैं पर नेता विपक्ष को तमाशा खड़ा करने का बहुत शौक़ है। सत्ता पक्ष की तरफ़ से निशिकांत दुबे ने ‘एडवीना एंड नेहरू’ किताब का ज़िक्र कर दिया। प्रभाव मिलता है कि सत्तापक्ष के पास प्रतिभा की कमी है नहीं तो बार-बार नेहरू को उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। क्या तर्क से जवाब नहीं दिया जा सकता? फिर स्पीकर महोदय ने यह कह कर हैरान परेशान कर दिया कि उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि वह सदन में न आएं। उनके अनुसार, “मुझे विश्वसनीय जानकारी मिली कि कांग्रेस पार्टी के कुछ सदस्य प्रधानमंत्री की सीट पर पहुंच सकते थे और एक अप्रत्याशित घटना को अंजाम दे सकते थे”।
माननीय स्पीकर का यह कथन न केवल दुर्भाग्य पूर्ण है बल्कि अत्यंत चिन्ताजनक भी है। हमारे संसदीय इतिहास में ऐसा मौक़ा पहले कभी नहीं आया। क्या देश की लोकसभा में प्रधानमंत्री से कुछ ‘अप्रत्याशित’ हो सकता है? एक मंत्री ने कह दिया कि कुछ महिला सांसद प्रधानमंत्री ‘को काट सकती थीं’! यह संसद है या जुरासिक पार्क ? अगर प्रधानमंत्री सुरक्षित नहीं तो कौन है? कि प्रधानमंत्री भी उस दिन वापस चले गए और अगले दिन राज्य सभा में अपना भाषण दिया, भी बताता है कि स्पीकर की बात को गंभीरता से लिया गया। स्पीकर को ऐसे सांसदों के नाम सार्वजनिक करने चाहिए जो प्रधानमंत्री पर हमला करना चाहते थे और उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करवानी चाहिए। उनकी ज़िम्मेदारी है कि वह सब सदस्यों, प्रधानमंत्री समेत, को सुरक्षा दिलवाएं। विपक्ष उनकी बात का प्रतिवाद करता है कि प्रधानमंत्री पर किस तरह के ‘हमले’ की योजना थी पर कांग्रेस की महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट के पास क्या करने गईं थी? क्या सदन की गरिमा का कुछ ध्यान नहीं रहा? सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जो टकराव चल रहा है वह हमारे लोकतंत्र को कहां पहुंचा रहा है? यहां तो कुछ भी उचित नज़र नहीं आ रहा।




















