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दिल से काम करें राज्य सरकारें

भारत में कोरोना वायरस से मरने वाले मरीजों की संख्या 5 लाख के पार जा चुकी है और हजारों बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने अपने मां-बाप में से किसी एक को खोया है और सैकड़ों ऐसे बच्चे जिन्होंने माता-पिता दोनों को खोया है।

भारत में कोरोना वायरस से मरने वाले मरीजों की संख्या 5 लाख के पार जा चुकी है और हजारों बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने अपने मां-बाप में से किसी एक को खोया है और सैकड़ों ऐसे बच्चे जिन्होंने माता-पिता दोनों को खोया है। कोरोना महामारी में मौतों का सही-सही आंकड़ा अभी भी उलझा हुआ है और पीड़ित परिवारों को मुआवजे का मसला भी पहाड़ बनकर खड़ा है। कोरोना से मौत के मामले में मुआवजे में देरी पर सुप्रीम कोर्ट कई बार सख्त नाराजगी जाहिर कर चुका है और राज्य सरकारों को फटकार भी लगा चुका है। लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही निकला है।
कोरोना से हुई मौतों पर मुआवजे के दावों से जुड़े जो आंकड़े कोर्ट को दिए गए हैं उनको लेकर भी गम्भीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई राज्यों की सरकारों ने कोरोना से मौत की संख्या से अधिक मुआवजे के लिए पेश ​किए गए दावे की संख्या बताई है। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में जहां कोरोना से हुई मौतों की सरकारी संख्या 1,41,737 है तो मुआवजा दावों की संख्या 2,13,890 है। वहीं कुछ राज्य सरकारों ने इसके उलट भी आंकड़े पेश किए हैं। पंजाब, बिहार, कर्नाटक और असम जैसे कई राज्यों में मुआवजे के लिए पेश किए गए दावों की संख्या मौत के सरकारी आंकड़ों से काफी कम है। कोरोना मौतों के लिए आर्थिक मुआवजे की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण (एनडीएमए) से अनुग्रह राशि तय करने पर विचार करने को कहा था। एनडीएमए ने राज्य आपदा कोष से मृतक के परिजनों को 50 हजार रुपए के मुआवजे का भुगतान करने की सिफारिश की थी, जिसे कोर्ट ने पिछले वर्ष अक्तूबर में स्वीकार कर लिया था। मुआवजे की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इस दिशा में कुछ ठोस कार्रवाई नहीं हो रही।
एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ढिलाई के लिए राज्यों को कड़ी फटकार लगाई है। राज्य सरकारें तकनीकी आधार पर क्लेम रिजेक्ट कर पल्ला झाड़ रही हैं। राज्य महज इस आधार पर मुुआवजा देने से इंकार कर रहे हैं कि आवेदन आनलाइन सबमिट करने की ऑफलाइन दिया गया। महाराष्ट्र में ऐसे मामले ज्यादा हैं। सुनवाई के दौरान कर्नाटक में मुआवजे के तौर पर मिले चेक भी बाउंस हो जाने का उल्लेख किया गया। जिसे अदालत ने बहुत गम्भीरता से लिया है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि तकनीकी खामी के चलते मुआवजा एप्लीकेशन रिजैक्ट नहीं की जा सकती। राज्यों को मुआवजा एप्लीकेशंस पर विचार के लिए एक समर्पित अधिकारी को नोडल आफिसर के तौर पर नियुक्त करें जो कम से कम मिनिस्टर सचिवालय के डिप्टी सैक्रेटरी रैंक का होगा। यही अधिकारी मुआवजा देने का फैसला करेगा। दस​ दिन के भीतर मुआवजा दे दिया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अनाथ बच्चों को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। अनाथ बच्चे आनलाइन आवेदन नहीं कर सकते। जाहिर है उन्हें इसके​ लिए रिश्तेदारों की मदद लेनी पड़ रही है। अगर वे ऑफलाइन आवेदन देते हैं तो उन्हें तकनीकी आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे अपनी लीगल सर्विस अथाॅरिटीज को मैदान में उतारें और कोरोना वायरस के कारण अपने परिवार के सदस्यों को खोने वाले सभी परिवारों का पूरा ब्यौरा उपलब्ध कराएं। जो बच्चे महामारी के कारण अनाथ हुए हैं उन्हें कानूनी सेवा मुहैया कराई जाए।
कोरोना महामारी के दिनों में देश ने बहुत पीड़ा झेली है। हालात ऐसे थे कि जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। कोरोना से हुई मौतों का मंजर याद कर रूह आज भी कांप उठती है। हालात ऐसे थे कि कोरोना से मौत होने पर शवों को सीधे श्मशान पहुंचाया जाता था। अनेक लोगों ने निजी अस्पतालों में शव लेने के लिए डैथ सर्टिफिकेट में कोरोना का उल्लेख नहीं करवाया तब जाकर वह अंत्येष्टि कर पाए। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम व्यवस्था दी थी कि कोई सरकार इस आधार पर मुआवजा देने से मना नहीं कर सकती कि डेथ सर्टिफिकेट में कोविड को मौत की वजह नहीं बताया गया। मृत व्यक्ति की आरटीपीसीआर रिपोर्ट देखने से ही पता लग जाएगा ​िक उस व्यक्ति को कोरोना हुआ था या नहीं। इसके बाद डेथ सर्टिफिकेट में बदलाव किया जा सकता है। अनेक मरीज ऐसे थे जो कोरोना से ठीक होकर घर लौट आए थे, लेकिन वायरस से संबंद्ध अन्य बीमारियों से उनकी मौत हो गई। राज्य सरकारें ऐसे मामलों को भी कोरोना आंकड़ों में नहीं जोड़ती। कोरोना महामारी से पीड़ित परिवार जो आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और उन्हें मदद की जरूरत है उन्हें तुरन्त राहत पहुंचाए जाने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों से तलख शब्दों में कहा है कि आप कोई चैरिटी नहीं कर रहे यह आपका फर्ज है और आपको इसे दिल से करना चाहिए। कल्याणकारी राज्य की धारणा तभी सार्थक होगी जब राज्य सरकारें पीड़ितों का दुख-दर्द बांटें। पीड़ितों का दुख-दर्द बांटना समाज का भी दायित्व है। लेकिन सरकरों को भी यह काम जिम्मेदारी के साथ करना होगा तभी हम महामारी की पीड़ा से उभर पाएंगे। समाज को भी चाहिए कि वह अनाथ बच्चों की देखभाल के​​ लिए आगे आएं।

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