देश में राजमार्ग पर आवारा पशुओं व जंगली जानवरों की वजह से हादसे बढ़े हैं। भोजन की तलाश में भटकते इन बेजुबान को इस बात का अंदाजा नहीं हो पाता कि खुद वे भी हादसे का शिकार हो सकते हैं। यही कारण है कि आए दिन कोई न कोई हादसे का शिकार हो ही जाता है। यह समस्या किसी एक प्रदेश की नहीं बल्कि देशभर की है। आये दिन सूचना के विभिन्न माध्यमों से इस बाबत समाचार प्रकाश में आते रहते हैं।
ये हालात तब हैं जब इस पर केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और न्यायपालिका समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करती रही है। देश में जिस तेजी से हाईवे और एक्सप्रेस वे बढ़ रहे हैं, उसी अनुपात में अवारा और जंगली जानवरों से होने वाली दुर्घटनाएं भी बढ़ी हैं। आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के नेशनल हाईवे और एक्सप्रेस वे पर होने वाले कुल सड़क हादसों में से करीब 12 से 15 फीसदी हादसे अचानक आवारा पशुओं के सामने आने की वजह से होते हैं, जिसमें हर साल 1100 से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं।
झांसी-कानपुर हाईवे पर पिछले कुछ महीनों में आवारा पशुओं के कारण गंभीर हादसे सामने आए हैं। बीती 6 अगस्त झांसी-कानपुर हाईवे पर पूंछ के खिल्ली के पास पशु बचाने में कार डिवाइडर से भिड़ी, इसमें दो लोगों की मौत हो गई। 7 अगस्त को झांसी-ललितपुर हाईवे पर ओरछा के चकरपुर चौकी क्षेत्र में पशु को बचाने के चक्कर में टमाटर से भरा ट्रक पलट गया। बीती 30 जुलाई को झांसी-खजुराहो हाईवे पर मप्र-उप्र सीमा के पास पशु बचाने के प्रयास में दूध से भरा टैंकर पलट गया।
18 मई को झांसी-कानपुर हाईवे पर पूंछ के सेसा के पास पशु बचाने में कार पलटी, जिसमें कई लोग घायल हुए। 15 अप्रैल को झांसी-कानपुर हाईवे पर मोंठ के समीप पशु बचाने के चक्कर में गिट्टी से भरा ट्रक पलट गया। 18 फरवरी को झांसी-खजुराहो हाईवे पर मऊरानीपुर के समीप पशु से टकराने के कारण एक बाइक सवार की मौत हो गई। इस साल 23 जनवरी को झांसी-खजुराहो हाईवे पर मऊरानीपुर के बीच पशु से कार टकराने से तीन लोग घायल हो गए। आज लगभग हर नेशनल हाईवे की स्थिति यही बनी हुई है।
शासन और प्रशासन ने आवारा पशुओं की समस्या से निपटने के लिए गांव-गांव गोशालाओं का निर्माण कराया है, इसके बावजूद हाईवे पर मवेशियों की बेरोकटोक चहलकदमी जारी है। पिछले एक साल के सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों पर गौर करें तो अधिकांश हादसे पशुओं को बचाने के चक्कर में ही घटित हुए हैं। हरियाणा सरकार के सख्त निर्देशों के बावजूद हरियाणा-एनसीआर के शहरों में बेसहारा पशुओं की समस्या खत्म होने के बजाय गंभीर होती जा रही है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत और रेवाड़ी समेत कई शहरों की सड़कों पर 10 से 15 हजार से अधिक पशु घूम रहे हैं।
ये पशु न केवल यातायात के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं, बल्कि इनके हमलों और इनसे बचने की कोशिश में होने वाले हादसों में लोगों की जान भी जा रही है। पिछले एक महीने में ही फरीदाबाद में एक और रेवाड़ी में दो लोगों की गोवंश के हमले में मौत हो चुकी है। इसके बावजूद पशुओं को पकड़ने और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर भेजने की व्यवस्था प्रभावी नजर नहीं आ रही। कहीं एजेंसी की जिम्मेदारी तय है तो कार्रवाई धरातल के बजाय कागजों तक सीमित है और कुछ शहरों में अभी तक एजेंसी ही नियुक्त नहीं हुई है।
एक आधिकारिक अध्ययन के अनुसार, पंजाब में होने वाली पशु-वाहन दुर्घटनाओं में 53 फीसदी मौतें सीधे जानवरों से टकराने के कारण होती हैं। रोपड़-बलाचौर, फिरोजपुर रोड और श्री मुक्तसर-मलोट जैसे राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर रात के समय यह समस्या सबसे घातक साबित हो रही है। ओडिशा में सड़कों पर घूमते आवारा पशु अब बड़ी समस्या बन चुके हैं। पिछले तीन सालों (2022-24) में राज्य में हुई 17,348 सड़क दुर्घटनाओं में 1601 लोगों की मौत सीधे-सीधे गाय, बैल और कुत्तों जैसे पशुओं से टकराने के कारण हुई है।
यानी सड़क हादसों में हर साल होने वाली मौतों में 9.22 प्रतिशत मौतों के पीछे आवारा पशु जिम्मेदार हैं। सिर्फ इंसान ही नहीं, इन हादसों में 331 पशुओं की भी जान गई है। सरकार ने सड़क डिजाइन और सुरक्षा इंतजामों में सुधार तो किए, लेकिन अचानक सड़क पर आ खड़े होने वाले इन पशुओं से होने वाली दुर्घटनाओं पर अब तक काबू नहीं पाया जा सका। आंकड़ों के मुताबिक, राजस्थान में पिछले पांच वर्षों में राज्य में आवारा पशुओं की वजह से 6,000 से अधिक सड़क हादसे हुए हैं, जिनमें 1200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
यह समस्या न केवल इंसानी जिंदगी बल्कि मूक पशुओं के लिए भी उतनी ही दर्दनाक साबित हो रही है। समस्या का दूसरा पहलू यह भी है कि नेशनल हाईवे टोल कंपनियों के पास दुर्घटनाग्रस्त या घायल पशुओं के इलाज और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने का कोई पुख्ता प्रावधान नहीं होता, जिससे मृत या घायल पशु सड़कों पर ही पड़े रहते हैं और दोबारा हादसों का सबब बनते हैं। समस्या की जड़ में वो लोग हैं जो अपना काम निकालते है और उसके बाद पशु को खुला सड़कों पर छोड़ देते है। यही पशु कई बार दुर्घटनाओं का कारण बनते है।
डेयरी उद्योग से जुड़े लोग गाय और बैलों की उपयोगिता खत्म होने या दूध देना बंद करने के बाद उन्हें सड़कों पर लावारिस छोड़ देते हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे खुले में फेंका जाने वाला कचरा और घास-फूस पशुओं को आकर्षित करते हैं, जिससे वे अचानक तेज रफ्तार वाहनों के सामने आ जाते हैं। इस संकट से निपटने के लिए सरकार और न्यायपालिका द्वारा कई कड़े कदम उठाए गए हैं, बावजूद सड़कों पर आवारा पशुओं का खतरा बना हुआ है। स्थानीय निकाय द्वारा अभियान चलाकर पशु पकड़े जाते हैं, लेकिन संख्या घटने के बजाय फिर बढ़ जाती है।
पकड़े गए पशुओं को मालिकों को लौटाने और कुछ मामलों में केवल कागजों पर पकड़ दिखाने के आरोप भी व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर इशारा करते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों, नगर निकायों और एनएचएआई को आदेश जारी कर राष्ट्रीय राजमार्गों और सार्वजनिक सड़कों से आवारा पशुओं को तुरंत हटाकर गौशालाओं या आश्रय गृहों में स्थानांतरित करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि सड़कों पर घूम रहे जानवर “नेचुरल स्पीड ब्रेकर” नहीं हैं, बल्कि मौत का वारंट हैं।
कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि सड़कों पर घूमने वाले मवेशियों की अनिवार्य टैगिंग की जाए ताकि उनके मालिकों की पहचान हो सके। पीठ ने आवारा जानवरों को आने से रोकने के लिए सड़कों और एक्सप्रेस-वे पर बाड़ लगाने का सुझाव दिया। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) शुरू की है, जिसके तहत हाईवे पर पशुओं को लावारिस छोड़ने वाले मालिकों पर भारी जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इस समस्या पर प्रभावी रोक और समाधान के लिए नागरिकों को जागरूक किया जाना चाहिए।
वहीं आवारा पशुओं के आवास एवं भोजन की व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ करने की जरूरत है। वास्तव में, सड़क पर घूमते आवारा पशु सिर्फ एक समस्या नहीं बल्कि जीवन के लिए खतरा हैं। यात्रियों और पशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में साझे प्रयासों की जरूरत है।


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