मैंने दुनिया के न जाने कितने देशों की यात्रा की है, बेहद खूबसूरत देश भी देखे हैं, प्रकृति की अनोखी कृतियों को देखा है लेकिन यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि मॉरीशस इन सभी में बेमिसाल है। समुद्र इतने लुभावने कि बस लहरों को गिनते रहिए, पानी इतना साफ है कि कांच की तली वाले नाव से कोरल की बेहद खूबसूरत कॉलोनी में रंगीन मछलियों को देखते रहिए। लोग यहां मोहब्बत से इतने भरे हुए हैं, ऐसा अतिथि भाव है कि आप हर पल आश्चर्यचकित होते रहें कि क्या किसी देश में प्रेम की ऐसी गंगा बह सकती है।
मैं जिस वन एंड ओनली ले सेंट गेरान रिजॉर्ट में रुका था, वहां के मैनेजर रोमन गोच के पास नहीं शब्द के लिए कोई जगह नहीं थी। केवल हां ही हां था। मॉरीशस की फिजा के हर कतरे में बसी मोहब्बत कह रही है कि कुछ किस्से आपसे साझा करूं। लोकमत वन वर्ल्ड समिट एंड अवॉर्ड्स के सिलसिले में एक बार फिर मुझे मॉरीशस की फिजा में कुछ दिन जिंदगी के सुहानेपन को समंदर की ऊर्जावान लहरों के बीच दिल से जीने का अवसर मिला, लोग यहां आते हैं, मॉरीशस के प्यार में डूब जाते हैं।
बार-बार आना चाहते हैं, सात रंगों की रेत वाली मिट्टी को देखकर दंग रह जाते हैं। प्रकृति भी क्या-क्या रचती रहती है। मॉरीशस के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित चामारेल गांव के पास लाल, भूरे, बैंगनी, हरे, नीले, पर्पल और पीले रंग की मिट्टी के टीले स्पष्ट रूप से दिखते हैं। खासियत यह है कि इन अलग-अलग रंगों की मिट्टी को आपस में मिला दें तो कुछ समय बाद वे अपने आप अलग-अलग परतों में बंट जाते हैं। हम उसके वैज्ञानिक कारणें में नहीं जाएंगे लेकिन है न कमाल की बात।
यहां हर रंग और हर नस्ल के लोग आपको मिल जाएंगे लेकिन उन्हें परतों में बांट कर आप नहीं देख पाएंगे। उनकी अपनी नस्लीय और धार्मिक पहचान है और वे उस पर गर्व भी करते हैं लेकिन एक-दूसरे से ऐसे गुंथे हुए हैं जैसे कोई खूबसूरत माला। 13 लाख से भी कम आबादी वाले इस देश में करीब 48 प्रतिशत हिंदू, 26 प्रतिशत क्रिश्चियन, 17 प्रतिशत मुस्लिम और 9 प्रतिशत अन्य धर्मों के लोग शामिल हैं। बहुसंख्यक भारतीय मूल के लोगों में बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिल, तेलुगु, मराठी और गुजराती मूल के लोग हैं।
इसके अलावा अफ्रीकी-यूरोपीय मिश्रित क्रेओल, चीनी और फ्रेंच मॉरिशियन हैं। कमाल की बात है कि इस विविधता के बावजूद 1968 में आजादी मिलने के बाद से मॉरीशस में सांप्रदायिक दंगा कभी नहीं हुआ। संविधान सभी धर्मों को बराबर अधिकार देता है। स्कूलों में धार्मिक सहिष्णुता की शिक्षा दी जाती है, सभी धर्मों के लोग मिलकर त्यौहार मनाते हैं। मगर आपके मन में एक सवाल पैदा हो रहा होगा कि यहां का मूल निवासी कौन है? जवाब दर्दनाक है, यहां का मूल निवासी था डोडो पक्षी, मॉरीशस का वह अब भी राष्ट्रीय प्रतीक है।
वन वर्ल्ड समिट के लोगो में हमने इसे शामिल किया था लेकिन डोडो को आखिरी बार वर्ष 1662 में देखा गया था। इस द्वीप को पुर्तगाली नाविक ने 1510 में जब खोजा था तब यहां डोडो की बहुतायत थी। उस वक्त मॉरीशस की धरती पर ऐसा कोई दूसरा जानवर नहीं था जो डोडो का शिकार करता, इसलिए पक्षी होने के बावजूद उसे कभी उड़ने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई होगी। उसने इंसान भी नहीं देखे थे, उसे क्या पता था कि ये इंसान उसका खात्मा कर देंगे।
समय के अंतराल पर यहां आने वाले डच, पुर्तगालियों और ब्रिटिश ने डोडो को खाना शुरू किया। इंसानों के साथ द्वीप पर सूअर, चूहे, कुत्ते और बंदर भी पहुंचे जो डोडो के अंडे और बच्चों को खाने लगे।
इंसानों ने जंगल को खेत बनाने के लिए बेहिसाब कटाई की। उन्हीं जंगलों में एक पेड़ था जिसके बीज खाकर डोडो जिंदा रहते थे, इसीलिए उस पेड़ का नाम भी डोडो ट्री रख दिया गया था। डोडो जैसे-जैसे खत्म होने लगे तो डोडो ट्री के नए पौधे भी उगना बंद हो गए, क्योंकि उसके बीज बड़े सख्त होते हैं। डोडो का पाचन तंत्र बीज के सख्त हिस्से को पचा लेता था और बीज बाहर आकर अंकुरित हो जाता था, जब तक यह चक्र समझ में आता तब तक डोडो विलुप्त हो गए।
संतोष की बात है कि मॉरीशस ने डोडो ट्री को बचा लिया है, इसकी भी कहानी बहुत दिलचस्प है, डोडो ट्री के बीज जंगली टर्की और कछुए की एक विशाल प्रजाति एल्डैब्रा को खिलाए गए तो वो बीज उसके पाचन तंत्र से गुजरने के बाद अंकुरित हो गए, अब तो सैंडपेपर से रगड़कर बीजों के छिलके को पतला करके नर्सरी में नए पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
मॉरीशस यात्रा के दौरान हर पल महसूस होता है कि हमारी संस्कृति यहां महफूज है, हिंदी ने नागपुर और मॉरीशस को खास रिश्ते में पिरो रखा है, 10 जनवरी 1975 को नागपुर में विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन इंदिरा गांधी ने किया था और उसमें मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम मुख्य अतिथि थे।
वहीं तय हुआ कि विश्व हिंदी सम्मेलन का सचिवालय मॉरीशस में रहेगा, लोकमत वन वर्ल्ड समिट एंड अवॉर्ड्स के सिलसिले में मुझे मॉरीशस के राष्ट्रपति धरमबीर गोखूल और उनकी पत्नी वृंदा गोखूल, कृषि मंत्री डॉ. अरविन बोलेल, जूनियर मिनिस्टर फॉरेन अफेयर नरसिंघेन हैं। बीराजेन कई अन्य मंत्रियों, सांसदों तथा हाई कमिश्नर अनुराग श्रीवास्तव से गुफ्तगू का मौका मिला। वाईपीओ के अभय सोलंकी ने हमारे लिए पार्टी आयोजित की थी, मॉरीशस की उपप्रधानमंत्री मैरी एरियन नवार मारी भी आई थीं, कई अन्य मंत्री भी थे।
सभी लोगों से बातचीत में मैंने महसूस किया कि मॉरीशस ने सामाजिक आबोहवा को मोहब्बत से परिपूर्ण रखने का नायाब नुस्खा तैयार कर लिया है। भारत जैसे देश को भी यही नुस्खा अपनाने की जरूरत मैं महसूस कर रहा हूं। हमारी फिजा का भी हर कतरा मोहब्बत से लबरेज हो जाए इससे अच्छा और क्या हो सकता है?


Download Android App
Download iOS App




