क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे, इसे लेकर चर्चा होती रही है लेकिन एक बड़ी बात यही है कि वह भी वास्तव में भारत रत्न के हकदार हैं। कांग्रेस में भी फोकस परिवारवाद पर रहता है। वहां भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल और लाला लाजपत राय को भुला दिया गया है, जैसे स्वातंत्र्य वीर सावरकर को भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया, ठीक यही काम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ भी किया गया। उनका बंगाल से संबंध रहा है, इस में कोई दो राय नहीं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का बड़ा बलिदान था, जिसके कारण उनकी प्रतिमा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के दिल में इंडिया गेट (भारत द्वार), राज पथ (कर्त्तव्य पथ) स्थापित की। अभी हाल ही के चुनाव में पश्चिमी बंगाल में भाजपा को धुरंधर जीत प्राप्त हुई, मगर बंगाल टाइगर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनका वह आदर-सत्कार नहीं किया गया जैसा कि होना चाहिए था।
शरणार्थियों के प्रश्न और नेहरू-लियाक़त समझौते जैसे मुद्दों पर मतभेद के कारण उन्होंने 1950 में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने एक ऐसे राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस की जो भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता को अपने मूल सिद्धांतों के रूप में अपनाए। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई स्वयंसेवकों और राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े लोगों के सहयोग से भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जिसका प्रमुख उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करना, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा करना, जम्मू-कश्मीर के लिए अलग व्यवस्था का विरोध करना और स्वदेशी और आत्मनिर्भर आर्थिक नीतियों का समर्थन करना।
1977 में आपातकाल के बाद जनसंघ ने अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर जनता पार्टी का गठन किया। बाद में वैचारिक मतभेदों के कारण जनसंघ परंपरा से जुड़े नेताओं ने 1980 में भाजपा की स्थापना की। इस प्रकार भारतीय जनसंघ को आज की भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक और संगठनात्मक पूर्वज माना जाता है। जनसंघ का जन्म कांग्रेस से वैचारिक मतभेदों और एक वैकल्पिक राष्ट्रवादी राजनीतिक मंच की आवश्यकता के परिणामस्वरूप हुआ था।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय राजनीति, मानवता, शिक्षा और राष्ट्रवाद के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में स्मरण किए जाते हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में हुआ था। वे प्रसिद्ध शिक्षाविद् सर आशुतोष मुखर्जी के पुत्र थे। अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर उन्होंने कम आयु में ही शिक्षा, प्रशासन और राजनीति के क्षेत्रों में विशिष्ट पहचान बनाई। उनका ज्ञान बंगाली, अंग्रेज़ी, हिंदी और फ्रेंच भाषा में विलक्षण था। डॉ. मुखर्जी एक उत्कृष्ट शिक्षाविद् थे। वे मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने भारतीय शिक्षा को राष्ट्रीय मूल्यों से जोड़ने और उच्च शिक्षा के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
स्वतंत्रता से पूर्व वे बंगाल की राजनीति में सक्रिय रहे और बाद में स्वतंत्र भारत की पहली केंद्रीय मंत्रिपरिषद में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने किंतु राष्ट्रीय नीतियों के कुछ प्रश्नों पर मतभेद होने के कारण उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। जिस प्रकार से पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कश्मीर के मामले में ढील दी थी और पाकिस्तानी आदिवासी वहां क़ाबिज़ हो गए थे और जिसका खामियाजा आज भी भारत भुगत रहा है, उसे लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी काफ़ी आहत थे।
मुखर्जी का मानना था कि यदि पंडित जी तुरंत उस समय सेना भेज देते तो कश्मीर पूर्ण रूप से भारत के पास होता। इसके अतिरिक्त भी भारत की संप्रभुता और गवर्नेंस को लेकर नेहरू से उनका मतभेद था। वे कांग्रेस से दूर डांगर की तरह बांधना कदापि नहीं चाहते थे। उन्हें इस बात की भी कांग्रेस से शिकायत थी कि उस में ‘इंटरनल डेमोक्रेसी’ आंतरिक स्वतंत्रता का अभाव भी था। इसके पश्चात श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की जो आगे चलकर भारतीय राजनीति की एक प्रमुख धारा बनी, जिसका आधार, “सबका साथ, सबका विकास”, सबका विश्वास मानसिकता ही थी।
डॉ. मुखर्जी भारत की एकता और अखंडता के प्रबल समर्थक थे। जम्मू-कश्मीर के लिए लागू पृथक प्रावधानों और परमिट व्यवस्था का उन्होंने दृढ़ता से विरोध किया। उनका प्रसिद्ध नारा था “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।” पाकिस्तानी मानसिकता के चलते कश्मीर की जन्नत को दोज़ख़ बना दिया गया था। उन्होंने भारत की संप्रभुता को बचाने के लिए ज़बरदस्त आंदोलन चलाया। इसी आंदोलन के दौरान उन्हें जम्मू-कश्मीर में गिरफ्तार किया गया। 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान उनका निधन हो गया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्रभक्ति, साहस और सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक है। वे केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी शिक्षाविद्, विचारक और राष्ट्रीय चेतना के प्रेरणास्रोत थे। आज भी उनका योगदान भारत की राजनीतिक और शैक्षिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्मरण किया जाता है।
राष्ट्रीय एकता के प्रबल समर्थक थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी
Summary :
क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे, इसे लेकर चर्चा होती रही है लेकिन एक बड़ी बात यही है कि वह भी वास्तव में भारत रत्न के हकदार हैं। कांग्रेस में भी फोकस परिवारवाद पर रहता है। वहां भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल और लाला लाजपत राय को भुला दिया गया है, जैसे स्वातंत्र्य वीर सावरकर को भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया, ठीक यही काम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ भी किया गया। उनका बंगाल से संबंध रहा है, इस में कोई दो राय नहीं कि…


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