ममता के अस्तित्व का संकट

Summary :

विगत 4 मई को प. बंगाल में चुनाव हारने के बाद ममता दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस जिस तरह तिनके-तिनके होकर बिखर रही है, उसके नये-नये आयाम खुलने का दौर समाप्त ही नहीं हो रहा है और ताजा घटनाक्रम में पार्टी के विद्रोही विधायकों के साथ ही नगर निकायों के चुने हुए पार्षदों ने पृथक राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाकर ममता दी को ही पार्टी के अध्यक्ष या चेयरपर्सन पद से हटा दिया है और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी से बाहर निकाल दिया है। निश्चित रूप से बंगाल की राजनीति में यह एेसा अभूतपूर्व दौर है जिसमें चुनावी हार से…

विगत 4 मई को प. बंगाल में चुनाव हारने के बाद ममता दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस जिस तरह तिनके-तिनके होकर बिखर रही है, उसके नये-नये आयाम खुलने का दौर समाप्त ही नहीं हो रहा है और ताजा घटनाक्रम में पार्टी के विद्रोही विधायकों के साथ ही नगर निकायों के चुने हुए पार्षदों ने पृथक राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाकर ममता दी को ही पार्टी के अध्यक्ष या चेयरपर्सन पद से हटा दिया है और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी से बाहर निकाल दिया है। निश्चित रूप से बंगाल की राजनीति में यह एेसा अभूतपूर्व दौर है जिसमें चुनावी हार से ही पार्टी का पूरा ढांचा चरमरा गया है। बेशक तृणमूल कांग्रेस को 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता दी ने ही खड़ा किया था और राज्य में तत्कालीन सत्तारूढ़ वामपंथी दलों के विरुद्ध सड़कों पर उतर कर उनके शासन को चुनौती दी थी जिससे उनके साथ बंगाल की आम जनता जुड़ती चली गई थी जिसके परिणामस्वरूप 2011 में उन्होंने वामपंथी दलों को मात देते हुए सत्ता का सिंहासन पाया और लगातार तीन चुनावों में अपनी पार्टी को विजय दिलाई मगर 2020 के आते-आते उन्होंने अपनी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को किसी पारिवारिक दल में बदलना शुरू किया और धीरे-धीरे अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बना डाला जिसके विरुद्ध तृणमूल कांग्रेस के निष्ठावान नेताओं के बीच भीतर ही भीतर रोष पैदा होना शुरू हुआ जो 2026 में उनकी पार्टी की पराजय होते ही फूटकर बाहर आ गया और उनकी पार्टी से विधायकों व सांसदों का पलायन शुरू हो गया।
इसकी ताजा परिणिती बीते कल यह हुई कि तृणमूल पार्टी के कुल चुने हुए 80 विधायकों में 60 को लेकर अलग हुए नेता ऋतव्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी विधायकों व विभिन्न शहरों के चुने हुए पार्षदों ने तृणमूल कांग्रेस पार्टी का एक विशेष अधिवेशन बुलाया और उसमें खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए ममता बनर्जी को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा कर उनके स्थान पर श्री अरूप राय को इस पद पर बैठा दिया। इस अधिवेशन में पार्टी की 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्य समिति का भी गठन किया गया और चार उपाध्यक्ष व चार महासचिव भी नियुक्त किये गये। पार्टी के इस गुट के अनुसार ममता बनर्जी उनकी मुख्य सलाहकार बनी रह सकती हैं। जाहिर है कि अब तृणमूल कांग्रेस में असली पार्टी होने की लड़ाई छिड़ेगी और विवाद चुनाव आयोग व न्यायालय तक भी जायेगा। मगर इससे पूर्व पार्टी के कुल 28 लोकसभा सदस्यों में से जिन 20 सांसदों ने विद्रोह किया था उन्होंने अपने गुट का विलय एक क्षेत्रीय नेशनल सिटीजंस पार्टी में करने का एेलान करते हुए लोकसभा अध्यक्ष से सदन में अपने बैठने की अलग व्यवस्था करने की मांग की थी। राज्य स्तर पर तृणमूल कांग्रेस संगठन दो समानान्तर गुटों में विभक्त हो चुका है और राष्ट्रीय स्तर पर इसका एक गुट नेशनल सिटीजंस पार्टी में तब्दील हो चुका है। इसे देखते हुए ममता दी के लिए अपने राजनीतिक अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। मगर तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि उनसे टूट कर केन्द्रीय व राज्य स्तर पर जितने भी नेता अलग हुए हैं उनका कोई जनाधार नहीं है और वे सभी चुनावों में ममता दीदी की लोकप्रियता के आधार पर जीते थे।
अतः राजनीति कभी-कभी खुद को दोहराती भी है क्योंकि 1969 में हमने देखा था कि किस तरह कांग्रेस पार्टी में पहली बार विभाजन हुआ था और श्रीमती इन्दिरा गांधी प्रधानमन्त्री रहने के बावजूद संगठन में अकेली रह गई थीं और पार्टी के सभी बड़े नेता संगठन कांग्रेस या सिंडीकेट में चले गये थे। मगर फर्क यह था कि उस समय वह सत्ता में थीं जिसकी वजह से आम जनता को जनमूलक नीतियां देकर उन्होंने लोकसभा चुनाव भारी बहुमत से जीता परन्तु 1971 का दूसरा उदाहरण स्व. चौधरी चरण सिंह का भी है जब उन्होंने अपनी पार्टी भारतीय क्रान्ति दल को विस्तार देने की खातिर इसका अध्यक्ष ओबेराॅय होटल शृंखला के मालिक स्व. मोहन सिंह ओबेराय को बनाया था, कुछ समय बाद ही श्री ओबेराॅय से नीतिगत मतभेद उत्पन्न हो जाने पर उन्होंने चौधरी चरण सिंह को ही भारतीय क्रान्ति दल से बाहर निकाल दिया था। मगर इसका चौधरी साहब पर कोई असर नहीं पड़ा और वही पार्टी भारतीय क्रान्ति दल कहलाई जहां वह खड़े थे। इसके बाद 1977 के इमरजेंसी हटने के बाद हुए लोकसभा चुनावों में जब श्रीमती इन्दिरा गांधी अपनी सीट समेत चुनाव हार गईं तो कांग्रेस कार्य समिति ने उन्हें दूसरी बार पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया मगर उन्होंने अपनी अलग कांग्रेस पार्टी बनाई और 1980 के चुनावों में धमाकेदार वापसी की लेकिन ममता बनर्जी वर्तमान राजनीतिक दौर में न तो इन्दिरा गांधी हो सकती है और न चौधरी चरण सिंह क्योंकि उन्होंने अपने 15 वर्ष के लम्बे शासन के दौरान उन सभी विकृतियों को पकड़े रखा जिनके विरुद्ध वह वामपंथी शासन के दौरान संघर्ष कर रही थीं।
यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में अपने राष्ट्रवादी विमर्श के बूते पर करारी मात दी। इसी कारण से यह कहा जा रहा है कि उनका अस्तित्व अब तभी बच सकता है जब वह अपनी बची-खुची पार्टी का मूल कांग्रेस पार्टी में विलय कर लें। मगर सत्ता में रहते हुए ममता दी ने जिस तरह अपने राज्य से कांग्रेस पार्टी को ही समाप्त करने की रणनीति बनाई उसे लेकर भी कांग्रेस पार्टी में खींचतान की खबरें बाहर आती रहती हैं। दूसरी तरफ प. बंगाल की भाजपा की सुभेन्दु अधिकारी की सरकार ने नीतिगत आधार पर जो बदलाव शुरू किया है उससे ममता दी के शासन के दौरान हुई अव्यवस्था के बाहर आने का भी भारी खतरा बना हुआ है जिसे देखते हुए ममता दी को अपने जनाधार के खिसकने का डर भी बना रहेगा। कुल मिलाकर प. बंगाल की राजनीति में अभी कई और रंग आने बाकी हैं।

Aditya Chopra

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