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द कश्मीर फाइल्स : नग्न सत्य

एक फिल्म की प्रशंसा करने और आलोचना करने का अधिकार दर्शकों को भी है और फिल्म समीक्षकों काे भी है लेकिन देश को सच देखने का अनुभव होना ही चाहिए।

एक फिल्म की प्रशंसा करने और आलोचना करने का अधिकार दर्शकों को भी है और फिल्म समीक्षकों काे भी है लेकिन देश को सच देखने का अनुभव होना ही चाहिए। ‘द ताशकंद फाइल्स’ जैसी चर्चित फिल्म बनाने वाले निर्देशक विवेक रंजन अ​ग्निहोत्री की नई फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ जबरदस्त हिट होे रही है। इस फिल्म को लेकर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। राजनीति के घमासान ने फिल्म को और भी चर्चित कर ​दिया है। ऐसा नहीं है कि कश्मीर को केन्द्र में रख पहले फिल्में नहीं बनीं। पहले फिल्मकारों ने कश्मीर की हसीन वादियों में केवल रोमांस ही दिखाई दिया। फिर आतंकवाद से ग्रस्त कश्मीर को आधार बनाकर कई फिल्में बनीं। कई हिट फिल्मों में आतंकवाद से ग्रस्त कश्मीर को दिखाया गया परन्तु आज तक ​किसी ने भी कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनकी पीड़ा को फोक्स में रखकर कोई फिल्म नहीं बनाई। आज तक किसी नामी-गिरामी फिल्म निर्माता-निर्दशक ने इस विषय को छुआ ही नहीं। कश्मीर की खूबसूरत वादियों में घाटी के काले इतिहास को बेहद मार्मिक और दर्दनाक ढंग से दिखाया जाना ही इस​ फिल्म को दूसरी फिल्मों से अलग दिखाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह फिल्म तथ्यों पर आधारित है। 1990 के दशक में कश्मीर के आतंकवाद को लेकर ‘पंजाब केसरी’ ने लगातार लिखा और इसके स्वर्गीय मुख्य सम्पादक और मेरे पिता श्री अश्विनी कुमार ने अनुच्छेद 370 को हटाने और कश्मीरी पंडितों के पलायन को लेकर लगातार तीखे सम्पादकीय लिखे लेकिन सत्ता बड़ी निष्ठुर होती है, अपने ही देश में शरणार्थी हो गए कश्मीरी पंडितों के बारे में किसी ने कुछ नहीं किया। पंजाब केसरी के जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद ही नहीं पंजाब के आतंकवाद के खिलाफ डटे रहने पर मेरे परदादा संस्थापक और स्वतंत्रता सेनानी लाला जगत नारायण जी और दादा रमेश चन्द्र जी को शहादत देनी पड़ी। इतना ही नहीं पंजाब केसरी के पत्रकारों, संवाददाताओं और समाचार पत्र विक्रेताओं को भी गोलियों का ​िनशाना बनाया गया। जिसकी पीड़ा आज तक परिवार झेल रहे हैं। 
कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार नाजियों और सिखों पर हुए अत्याचारों से कम नहीं हैं। निर्देशक ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ में कथानक को तोड़मरोड़ कर ड्रामाई अंदाज में पेश करने की जरा भी कोशिश नहीं की। यदि कहानी पाश्विक और क्रूर है तो फिर उसे वैसा ही दिखाए जाने में गलत क्या है। तमाम तरह की करूर कहानियां पहले भी सिनेमा के जरिये दुनिया भर में दिखाई जाती रही हैं। हिटलर द्वारा यहूदियों के नरसंहार और रवांडा में हुए नरसंहार पर भी अनेक फिल्में बन चुकी हैं तब दुनिया ने सच्चाई को स्वीकार किया। फिल्म सवाल करती है ​कि घाटी से कश्मीरी पंडितों को विस्थापित हुए 33 वर्ष हो गए। पंडितों की एक नई पीढ़ी सामने है और सामने यह प्रश्न भी है कि क्या यह लोग कभी अपने घर कश्मीर वापिस जा पाएंगे। 14 सितम्बर, 1989 को जम्मू-कश्मीर भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष टिक्कू लाल टपलू की हत्या से कश्मीर में शुरू हुआ आतंक का दौर समय के साथ-साथ विभत्व होता चला गया। टिक्कू की हत्या के महीने भर बाद ही जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल बट्ट को मौत की सजा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश नील कंठ गंजू की हत्या कर दी गई। फिर 13 फरवरी को श्रीनगर के दूरदर्शन केन्द्र के निदेशक लासा कौल की निर्मम हत्या के बाद आतंक अपने चर्म पर पहुंच गया था। उस समय इस आतंक ने धर्म को अपना हथियार बनाया और इसके निशाने पर आ गए कश्मीरी पंडित। पंडितों के घरों में कुछ दिन पहले ही फोन आने लगे थे कि वह जल्द से जल्द घाटी खाली करके चले जाएं या फिर मरने के लिए तैयार रहें। घरों के बाहर ऐसे पोस्टर चिपका दिए गए जिसमें उन्हें घर छोड़ कर जाने या अंजाम भुगतने की धमकियां दी गई थीं। लोगों से उनकी घड़ियों को पाकिस्तानी समय के साथ सैट करने का हुकुम दिया जा रहा था, सिंदूर लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। भारतीय मुद्रा को छोड़ कर पाकिस्तानी मुद्रा अपनाने की बात होने लगी थी। जिन मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से कभी इबादत की आवाज सुनाई देती थी उनसे कश्मीरी पंडितों के लिए जहर उगला जा रहा था। ऐसे नारे सुनाई देते थे, ‘‘यहां क्या चलेगा निजाम-ए-मुस्तफा’ आजाद का मतलब क्या ला इल्लाह इल्लल्लाह।’’
कर्फ्यू के बावजूद कट्टरपंथियों ने सड़कों पर आकर कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतारने, उनकी बहन-बेटियों का बलात्कार करने और हमेशा के लिए उन्हें घाटी के बाहर खदेड़ना शुरू कर ​दिया था। 19 जनवरी, 1990 को लगभग 3 लाख कश्मीरी पंडित अपना सब कुछ छोड़ कर कश्मीर छोड़ने को विवश हो गए। अपने ही देश में लोग पराये हो गए और तम्बुओं में जीवन जीने काे मजबूर हो गए। इस नग्न सच को निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने बड़ी ईमानदारी से दिखाया है। करीब 700 कश्मीरी पंडितों के परिवारों से बातचीत कर, व्यापक रिसर्च के बाद ईमानदारी से कथानक तैयार किया गया। पूरी फिल्म उन लोगों की कहानियों पर आधारित है जिन्होंने हिंसा काे झेला और विस्थापित होने का दर्द आज भी उन्हें टीस दे रहा है। अतीत के पन्नों में दफन इस सच को देखकर हर दर्शक का ​दिल झकझोर उठता है। कश्मीरी पंडितों पर हुए क्रूर अत्याचारों काे देखना मानवता और न्याय व्यवस्था को घुटने टेकते देखना दिल दहला देने वाला है। फिल्म में अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती और सभी का अभिनय दर्शकों को रूला देने के लिए काफी है। फिल्म निर्माण में जुटी टीम एक ईमानदार प्रयास के लिए बधाई की पात्र है।

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