लाहौर का लव-मंदिर हमारा स्वर्णिम अतीत

Summary :

पड़ौस में बिखरे पड़े हैं हमारे स्वर्णिम अतीत के बहुमूल्य पन्ने। भगवान राम के युवराज पुत्र लव ने जिस शहर को बसाया था, वह शहर लाहौर है। लाहौर के शाही किले में अब भी महाराजा लव की स्मृतियों को कांपते अधरों से स्मरण करता लव-मंदिर मौजूद है, मगर धीरे-धीरे हमारी विरासत का वह सुनहरी पृष्ठ भी भुरभुराने लगा है। लाहौर के शाही किले की चारदीवारी में आलमगीरी-गेट के पास स्थित है यह मंदिर, जहां अतीत के कुछ दुर्लभ चिह्न एवं कुछ पिंडियां मौजूद हैं। पाकिस्तानी शासन तंत्र का स्थापत्य विभाग इस पुराने खजाने का महत्व अब समझता है, संभवत: इसीलिए…

पड़ौस में बिखरे पड़े हैं हमारे स्वर्णिम अतीत के बहुमूल्य पन्ने। भगवान राम के युवराज पुत्र लव ने जिस शहर को बसाया था, वह शहर लाहौर है। लाहौर के शाही किले में अब भी महाराजा लव की स्मृतियों को कांपते अधरों से स्मरण करता लव-मंदिर मौजूद है, मगर धीरे-धीरे हमारी विरासत का वह सुनहरी पृष्ठ भी भुरभुराने लगा है।
लाहौर के शाही किले की चारदीवारी में आलमगीरी-गेट के पास स्थित है यह मंदिर, जहां अतीत के कुछ दुर्लभ चिह्न एवं कुछ पिंडियां मौजूद हैं। पाकिस्तानी शासन तंत्र का स्थापत्य विभाग इस पुराने खजाने का महत्व अब समझता है, संभवत: इसीलिए इसके रख-रखाव पर अब ध्यान दिया जा रहा है। आतंकवाद एवं धार्मिक उन्माद के कैंसर से ग्रसित इस पड़ौसी देश में हमारी विरासत बची रहे, इतना भी कम नहीं। अब इस तथ्य को स्वीकार कर लिया गया है कि इस शहर की स्थापना मां सीता और श्रीराम के पुत्र राजकुमार लव ने की थी। एक अन्य चर्चित शहर कसूर की स्थापना उसके जुड़वां भाई राजकुमार कुशा ने की थी। इस शहर में हजारों साल पुराने लव मंदिर की सफाई व कारसेवा और साथ ही एक शिवालय का निर्माण सर गंगाराम ने कराया था। भूख और तंगहाली से जूझते पाकिस्तानियों को अब भगवान राम और उनके बेटे लव की याद आ रही है। पाकिस्तानियों के अचानक हुए इस हृदय परिवर्तन ने कई लोगों को अचरज में डाल दिया है।
भारत में पहले भी इस तरह की बात कही जाती रही है, लेकिन इस बार पाकिस्तानी मीडिया ने भी इस सत्य को स्वीकार किया है। मुस्लिम लीग समर्थित अखबार ‘द डॉन’ की एक रिपोर्ट में लाहौर शहर के प्राचीन इतिहास की पड़ताल की गई है। इस रिपोर्ट में माना गया है लाहौर को राजकुमार लव ने बसाया था और उन्हीं के नाम पर इस शहर को यह नाम मिला। साथ ही पाकिस्तानी शहर ‘कसूर’ को भगवान राम के दूसरे बेटे कुश का बसाया हुआ बताया गया है। इसके अलावा भी इस शहर के कई पुराने मंदिरों और ऐतिहासिक इमारतों के बारे में बताया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान और पाकिस्तानी मीडिया वहां के प्राचीन हिन्दू इतिहास से इनकार करता रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में भी पाकिस्तान में ज्यादा बात नहीं की जाती। वे मुहम्मद बिन कासिम से पहले के इतिहास को ‘अंधेरे का युग’ कहते रहे हैं।
लाहौर किले के भीतर मौजूद लव मंदिर लाहौर की सबसे पुरानी इमारत है। यह मंदिर किले के बनने से काफी पहले से यहां मौजूद था। मुगल काल में बादशाह अकबर ने इसी के चारों ओर किले का निर्माण करा दिया। इसके बाद यह मंदिर भी किले का हिस्सा हो गया, लेकिन मंदिर के डिजाइन और मौजूदा शहर की सतह से इसकी उसकी ऊंचाई के आधार पर माना गया है कि यह मंदिर किले की अपेक्षा काफी पुराना है। लाहौर किले में मंदिर के नीचे खुदाई की गई, जिसमें उसके प्राचीन होने के सबूत मिले।
7वीं सदी में चीनी यात्री युवान चांग भारत की यात्रा पर आया था। इस दौरान वह लाहौर भी गया। उसने लाहौर के बारे में लिखा कि यह शहर सुंदर और बड़े मंदिरों और बागों से भरा हुआ है। इसके अलावा वर्ष 1982 में लिखे गए एक दस्तावेज में भी लाहौर के मंदिरों के बारे में जानकारी मिलती है। ये लिखित दस्तावेज आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में देखे जा सकते हैं।
टिब्बी बाजार भी लाहौर का भीड़भाड़ वाला इलाका है। इसी इलाके के बीचोंबीच एक प्राचीन शिव मंदिर है। इसे टिब्बी वाला शिवालय कहा जाता है। ये शिवालय अरब आक्रमण के पहले से लाहौर में मौजूद है। इसी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लाहौर शहर लगभग 4000 हजार साल पुराना है। अरब आक्रमण से पूर्व यहां कई बड़े हिंदू और बौद्ध शासक हुए थे।
मुझे वर्ष 1988 में कटासराज-यात्रा के मध्य वहां के पंजाब विश्वविद्यालय में जाने का अवसर मिला था। संस्कृत-हिंदी व ‘पाली’ की अमूल्य पांडुलिपियां पुस्तकालय में आज भी सुरक्षित हैं। यहां अरबी, फारसी, तुर्की, उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं की कुल बाइस हजार पांडुलिपियां रखी हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी संस्कृत विभाग के एक शोध छात्र राजेश सरकार ने इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त की हैं। कुल मिलाकर लाहौर सांस्कृतिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
लाहौर में हिंदू, सिख, जैन संस्कृति के अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं। इनमें आर्य समाज मंदिर, महादेव मंदिर, शीतला मंदिर, भैरव मंदिर, रावर रोड पर श्रीकृष्ण मंदिर, अकबरी मंदिर, दूधवाली माता मंदिर, महाराजा रणजीत सिंह की समाधि, डेरा साहिब, जैन दिगंबर मंदिर व भाबडिय़ान, जैन श्वेतांबर मंदिर के अवशेष मौजूद हैं। मगर हम इनकी व्यवस्थित जानकारी एक समग्र ग्रंथ के रूप में पिरो नहीं पाए। और अब तक्षशिला (पाकिस्तान) में भी भारत के प्राचीन इतिहास के महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ चिह्न मिले हैं। इसी तक्षशिला की गत सप्ताह हुई खुदाई में कुषाण काल के सिक्के व आभूषण एवं हिन्दू-मूर्तियों के भग्नावशेष भी प्राप्त हुए हैं।

Dr. Chander Trikha