‘शांतिदूत’ की दादागिरी

Summary :

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शांतिदूत वाली अपनी छवि बनाने की कोशिश तो बहुत की। भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष समेत आठ युद्ध रुकवाने का दावा किया और खुद को शांति का मसीहा बताया। यहां तक कि नोबेल शांति पुरस्कार पर दावा भी जता दिया लेकिन उन्होंने नववर्ष के तीसरे ही दिन वेनेजुएला पर हमला कर उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया। ऐसा करके ट्रंप ने दुनिया में अशांति फैला दी है। यह अमेरिकी सेना का हैरतंगेज मिशन था जिसमें उसका कोई प्रतिरोध नहीं हुआ यह एक संप्रभु देश के खिलाफ ताकत का घोर…

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शांतिदूत वाली अपनी छवि बनाने की कोशिश तो बहुत की। भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष समेत आठ युद्ध रुकवाने का दावा किया और खुद को शांति का मसीहा बताया। यहां तक कि नोबेल शांति पुरस्कार पर दावा भी जता दिया लेकिन उन्होंने नववर्ष के तीसरे ही दिन वेनेजुएला पर हमला कर उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया। ऐसा करके ट्रंप ने दुनिया में अशांति फैला दी है। यह अमेरिकी सेना का हैरतंगेज मिशन था जिसमें उसका कोई प्रतिरोध नहीं हुआ यह एक संप्रभु देश के खिलाफ ताकत का घोर इस्तेमाल और अमेरिका की अधिपत्यवादी कार्रवाई है। अमेरिका का हमला अंतर्राष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन है और शांति और सुरक्षा को खतरा पैदा करने वाला एक्शन है। वेनेजुएला पर हमले को लेकर दुनिया बंटी हुई है। संयुक्त राष्ट्र एक मृत संस्था है, उसकी सुनेगा कौन?
ट्रंप ने दादागिरी करके न केवल लैटिन अमेरिकी देशों को बल्कि चीन और रूस को भी दिखा दिया है कि अगर कोई भी देश उसकी खींची गई लाइन पर नहीं चलेगा तो वहां तख्तापलट करवा दिया जाएगा। वैसे ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में विदेशी धरती पर कुल 622 बम गिरा चुके हैं। सीरिया, नाइजीरिया, ईरान, सोमालिया, यमन और ईराक पर अमेरिका बम गिरा चुका है। ट्रंप के इशारे पर ही बांग्लादेश में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को कार्यवाहक सरकार का मुखिया बनाकर अपनी कठपुतली बनाया है। ऐसा ही वेनेजुएला में करना चाहता है। वेनेजुएला पर कहानी के पीछे खेल कुछ और है। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है जिसे 303 अरब बैरल से भी ज्यादा बताया जाता है। कई प्रतिबंधों की वजह से यह अब तक अनछुआ भंडार है। इसके अलावा उसके पास सोने और गैस का भी जबर्दस्त भंडार है। यूं तो वेनेजुएला की ओर से इन पदार्थों का निर्यात न के बराबर है लेकिन अगर अमेरिका की इस तक पहुंच होती है तो ट्रंप प्रशासन को मध्य पूर्व (भारत के पश्चिम एशिया) में तेल की खरीद पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। वह सीधे वेनेजुएला के तेल भंडार का दोहन करके अपने ऊर्जा बाजार को आगे बढ़ा सकता है और अपने तेल रिजर्व को सुरक्षित भी रख सकता है। इसके अलावा वेनेजुएला में बीते वर्षों में जिस तरह से भू -राजनीतिक घटनाक्रम बदले हैं, वह भी अमेरिका के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। दरअसल, वेनेजुएला के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण होने के बाद से चीन और रूस ने वेनेजुएला से रिश्ते बढ़ाए हैं और उसे अरबों डॉलर की सहायता मुहैया कराई है। कई बार यह सहायता वेनेजुएला के तेल के लिए ही की गई है। दूसरी तरफ वेनेजुएला ने रूस, चीन, ईरान और क्यूबा से हथियार और सुरक्षा के लिए कई उपकरण भी हासिल किए हैं। ऐसे में ट्रंप सरकार वेनेजुएला पर दबाव बनाकर एक बार फिर पूरे दक्षिण अमेरिका में अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश में है। निकोलस मादुरो तब से ट्रंप की आंखों में खटक रहे थे जब से उन्होंने अमेरिकी तेल कम्पनियों की सम्पत्ति जब्त की थी। अमेरिका आरोप लगाता रहा है कि वेनेजुएला की सरकार ​अमेरिका के लिए खतरा है। मादुरो ड्रग्स कार्टल चलाते हैं और खतरनाक ड्रग्स की तस्करी अमेरिका भी की जाती है। ट्रंप का यह भी आरोप है कि मादुरो की नीतियों से लाखों वेनेजुएलाई नागरिक देश छोड़ अमेरिका पहुंचे हुए हैं। अमेरिका पिछले कुछ दिनों से कथित रूप से ड्रग्स ले जाने वाली नावों को निशाना बना रहा था लेकिन नार्कोटिक विशेषज्ञों का कहना है कि वेनेजुएला तो ड्रग्स तस्करी का बहुत छोटा खिलाड़ी है। यह सही है कि मादुरो की सत्ता अवैध है लेकिन यह उसका आंतरिक मामला है। ट्रंप का असली मकसद तो तेल का खेल है। ऐसे विध्वंसक खेल अमेरिका पहले भी खेलता आया है लेकिन जब हम थोड़ा इतिहास पलटते हैं, तब हमें कुछ और ही कहानी दिखती है। वियतनाम वॉर में हजारों बेगुनाह मारे गए। अफगानिस्तान में 20 साल युद्ध चला। अफगान नागरिक आज भी उसका दंश झेल रहे हैं। एक झूठी खुफिया जानकारी के आधार पर इराक को तबाह कर दिया गया। इसी वजह से इस्लामिक स्टेट पैदा हुआ। हवाई हमलों में मासूम बच्चों की हत्याएं हुईं। मगर इन सबके सूत्रधार अमेरिका पर किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने उंंगली तक नहीं उठाई। किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के ​खिलाफ आईसीसी ने अरेस्ट वॉरंट नहीं निकाला। मसलन, मार्च 2003 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यु बुश ने इराक पर हमले का आदेश दिया था। कहना ये कि सद्दाम हुसैन के पास वैपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन हैं। यानी, भयानक बर्बादी पैदा करने वाले हथियार। इसी को आधार बनाकर अमेरिका ने सेना उतारी। सद्दाम को अरेस्ट कर फांसी पर लटकाया और फिर कहा कि कैमिकल वैपन की बात भ्रामक थी। हमें इराक में ऐसा कोई हथियार नहीं मिला।
अमेरिका ने लीबिया में घुसकर कर्नल गद्दाफी को मारकर तख्तापलट किया था। जिस देश में भी अमेरिका घुसा वे सभी तबाह होकर रह गए। एक तरफ से अमेरिका ने वेनेजुएला को हड़प लिया है। ट्रंप वहां भी ऐसे नेता को सत्ता में लाकर कठपुतली सरकार बनाना चाहते हैं जो उनके इशारों पर चले। न्यूयार्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने राष्ट्रपति मादुरो को पकड़ने के लिए अमेरिकी कार्रवाई को एक्ट ऑफ वार बताया है। अमेरिका के विपक्षी दल और कमला हैरिस ने भी अमेरिकी कार्रवाई का विरोध किया है। ट्रंप ने मादुरो पर मुकदमा चलाने और सजा देने की बात कही है। इस मौके पर यह नहीं कहा जा सकता कि विश्व इस पर क्या प्रतिक्रिया देगा क्योंकि इजराइल-हमास युद्ध और रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भी दुनिया बंटी हुई हैं। बड़े-बड़े देश बयानबाजी तो बहुत करते हैं लेकिन बड़ी ताकतों के सामने कोई किसी देश का साथ नहीं देता। फिलिस्तीन और यूक्रेन के उदाहरण हमारे सामने हैं। जिस की लाठी उसकी भैंस इसी मुहावरे को प्रमाणित करती हुई दुनिया चल रही है। चीन, रूस और ब्राजील वेनेजुएला की कितनी मदद करते हैं यह देखना होगा। दुनियाभर के देशों को सतर्क होकर अपनी लाठी को मजबूत करना पड़ेगा अन्यथा दूसरे देशों में अमेरिकी दखल का खूनी इतिहास बार-बार दोहराया जाता रहेगा। मैं पहले कई बार ​लिखता आ रहा हूं कि विश्व शांति के लिए अगर कोई खतरा है तो वह है अमेरिका। शांति के नाम पर वह लगातार विध्वंस का खेल खेलता आया है। उसका अगला निशाना ईरान होगा यह भविष्य ही बताएगा। प्रमुख की लड़ाई जारी रहेगी।

Aditya Chopra

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