परिसीमन विधेयक पर नम्बर गेम

Summary :

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतंत्र में यह जरूरी है कि जनसंख्या के आधार पर सभी को उचित प्रतिनिधित्व मिले। जनसंख्या का बढ़ाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। ऐसे में अगर किसी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र की जनसंख्या में अधिक वृद्धि हो जाए लेकिन वहां की सीट एक ही रहे तो वहां के लोगों का प्रतिनिधित्व सदन में कम हो जाएगा। इस स्थिति को बदलने और सबको एक समान प्रतिनिधित्व देने के लिए परिसीमन किया जाता है। समय-समय पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की संख्या और उनकी सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि…

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतंत्र में यह जरूरी है कि जनसंख्या के आधार पर सभी को उचित प्रतिनिधित्व मिले। जनसंख्या का बढ़ाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। ऐसे में अगर किसी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र की जनसंख्या में अधिक वृद्धि हो जाए लेकिन वहां की सीट एक ही रहे तो वहां के लोगों का प्रतिनिधित्व सदन में कम हो जाएगा। इस स्थिति को बदलने और सबको एक समान प्रतिनिधित्व देने के लिए परिसीमन किया जाता है। समय-समय पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की संख्या और उनकी सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि अगर किसी संसदीय क्षेत्र में जनसंख्या बढ़ जाए तो उस सीट को दो टुकड़ों में बांटकर दो सीट बनाई जा सकती हैं।
केन्द्र की मोदी सरकार संसद में मानसून सत्र में परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक और महिला आरक्षण विधेयक फिर से लाने की तैयारी कर रही है। गत 17 अप्रैल को सरकार संख्या बल जुटाने में विफल रही थी इसलिए संविधान संशोधन विधेयक गिर गया था। विधेयक को पास कराने के लिए दो तिहाई यानि 352 सीटें चाहिए थी। भारत में आजादी के बाद से अब तक कुल 4 बार परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हुई है। 1952, 1963 और 1973 में जब परिसीमन हुआ तो लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें बढ़ी और उनकी सीमाएं भी दोबारा तय हुई, लेकिन 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा सीटों की संख्या को फ्रीज कर दिया गया था। चौथी बार परिसीमन हुआ 2002 में इस परिसीमन में सीटों की संख्या नहीं बढ़ी, सिर्फ उनकी सीमाएं बदली। 1976 में सीटों की संख्या जो फ्रीज हुई थी, उसे अब खोलने की तैयारी है। परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है और दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर काफी काम किया है और देश के विकास में भागीदार बने हैं, उनकी शंका यह है कि अगर जनसंख्या को ही परिसीमन का आधार बनाया गया तो उनका प्रतिनिधित्व देश की राजनीतिक सत्ता में कम हो सकता है, इसलिए वे जनसंख्या आधारित परिसीमन का विरोध कर रहे हैं।
संसद में इस मुद्दे को लेकर सरकार और विपक्ष में तीखी नोकझोंक हुई थी। विपक्ष ने यह आरोप भी लगाया था कि महिला आरक्षण के नाम पर सरकार देश में परिसीमन अपने हिसाब से कराकर उसका लाभ लेना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने बार-बार यह कहा था कि सरकार नारी शक्ति को उनका अधिकार देना चाहती है जो वर्षों से लंबित है। परिसीमन विधेयक के पारित हो जाने से देश में लोकसभा सीटों की संख्या 550 से बढ़कर 850 तक हो जाएगी क्योंकि परिसीमन 1971 की बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर होगा। दक्षिण भारतीय राज्यों को यह आशंका है कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें तय होती हैं तो सत्ता पर हिन्दी भाषी राज्यों का दबदबा बढ़ जाएगा क्योंकि उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। गृहमंत्री अमित शाह ने पिछली बार ही यह स्पष्ट कर दिया था कि सरकार सभी राज्यों की सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ौतरी करने को तैयार है लेकिन तब गर्मागर्मी में बात नहीं बनी। अब सरकार का नम्बर गेम काफी बदल चुका है। पिछले तीन महीनों में लोकसभा का गणित तेजी से बदला है। पहले टीएमसी में टूट के बाद 20 सांसद नैशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया के एनडीए में आने और शिवसेना उद्धव ठाकरे के 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली ​िशवसेना में शामिल होने के बाद विधेयक का समर्थन करने वाले सांसदों की संख्या 324 पहुंच गई है। अब सबकी नजरें एनसीपी शरद पवार और डीएमके पर लगी हुई हैं। तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना उद्धव गुट में टूट-फूट के बाद एनसीपी शरद गुट में भी बगावत की खबरें आम हैं। क्योंकि पार्टी के कई सांसद एनसीपी सुनेत्रा पवार गुट में शामिल होने के इच्छुक हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि मराठा दिग्गज शरद पवार या तो दोनों एनसीपी में विलय कर सकते हैं और परिसीमन बिल पर एनडीए को समर्थन दे सकते हैं। राजनीतिक के माहिर शरद पवार अपने कुनबे को बिखरने से बचाने के लिए कोई भी रणनीति अपना सकते हैं।
शरद पवार की बेटी सुप्रिया सूले ने यह साफ संकेत दे दिए हैं कि अगर केन्द्र सरकार सभी राज्यों में सीटों में 50 फीसदी की बढ़ौतरी करती है तो उनकी पार्टी महिला आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन बिल का समर्थन कर सकती है। अब नजरें तमिलनाडु के क्षेत्रीय दल डीएमके पर लगी हुई हैं। 50 फीसदी सीटें एक मुश्त बढ़ाने के प्रयास पर डीएमके सहमत हो सकता है। डीएमके के समर्थन से केन्द्र दो तिहाई बहुमत जुटाने में सफल हो सकता है। उम्मीद है कि परिसीमन विधेयक के समर्थन में सरकार जरूरी आंकड़ा जुटाने में सफल हो जाएगी। इससे विपक्ष को जबरदस्त झटका लग सकता है। इस बिल के पारित होने से देश की राजनीति का स्वरूप ही बदल जाएगा।
इंडिया गठबंधन में बिखराव का फायदा सरकार को बिल पास करवाने में मिल सकता है। वहीं सो​िनया गांधी के घर हुई बैठक में कांग्रेस ने परिसीमन ​विधेयक का विरोध करने का निर्णय लिया है।

Aditya Chopra

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