सरदार तेजा सिंह समुंद्री : सेवा, साहस और समन्वय की विरासत

Summary :

इतिहास अनेक नेताओं को उनकी उपलब्धियों के लिए याद करता है, किंतु कुछ ही ऐसे होते हैं जिन्हें उन मूल्यों के लिए स्मरण किया जाता है जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में जिया। सरदार तेजा सिंह समुंद्री ऐसे ही विशिष्ट दूरदर्शी व्यक्तित्वों में से एक थे, जिनका जीवन साहस, विनम्रता और निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक बन गया। 17 जुलाई को जब सिख समुदाय उनकी शहादत की 100वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब उस महान व्यक्तित्व की विरासत को स्मरण और विमर्श करना उपयुक्त ही है, जिसने अपना संपूर्ण जीवन पंथ और राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। 1881 में…

इतिहास अनेक नेताओं को उनकी उपलब्धियों के लिए याद करता है, किंतु कुछ ही ऐसे होते हैं जिन्हें उन मूल्यों के लिए स्मरण किया जाता है जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में जिया। सरदार तेजा सिंह समुंद्री ऐसे ही विशिष्ट दूरदर्शी व्यक्तित्वों में से एक थे, जिनका जीवन साहस, विनम्रता और निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक बन गया। 17 जुलाई को जब सिख समुदाय उनकी शहादत की 100वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब उस महान व्यक्तित्व की विरासत को स्मरण और विमर्श करना उपयुक्त ही है, जिसने अपना संपूर्ण जीवन पंथ और राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
1881 में राय का बुर्ज (वर्तमान रायपुर बालिम, ज़िला तरनतारन) में जन्मे तेजा सिंह समुंद्री ने बचपन से ही असाधारण गुणों का परिचय दिया। शांत स्वभाव, सत्यनिष्ठ वाणी, निर्भीक आचरण और गहन आध्यात्मिकता के कारण वे उन लोगों का भी सम्मान प्राप्त करते थे जो उनसे मतभेद रखते थे। डॉ. प्यार सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “तेजा सिंह समुंद्री : जीवन और योगदान”, जिसका हाल ही में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. करमजीत सिंह द्वारा अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया है, उनके इन विशिष्ट गुणों को ऐतिहासिक प्रमाणिकता और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करती है।
उनका जीवन सिख आदर्श ‘संत-सिपाही’ का सजीव उदाहरण था। उनमें अद्भुत शारीरिक और मानसिक शक्ति थी किंतु उन्होंने कभी भी क्रोध या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को अपने निर्णयों पर हावी नहीं होने दिया। उथल-पुथल भरे आंदोलनों और राजनीतिक संघर्षों के बीच भी वे शांत, धैर्यवान और करुणामय बने रहे। उनका नेतृत्व यह सिद्ध करता है कि सार्थक परिवर्तन शत्रुता से नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास, विवेक और नैतिक साहस से आता है।
तेजा सिंह समुंद्री गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रमुख शिल्पकारों में से एक बनकर उभरे। उन्होंने गुरुद्वारा रकाबगंज आंदोलन, ननकाना साहिब आंदोलन और ऐतिहासिक गुरु का बाग़ मोर्चे में अग्रणी भूमिका निभाई तथा अन्याय और औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े रहे। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के संस्थापक सदस्यों में शामिल होकर उन्होंने अथक प्रयास किए कि सिख संस्थान सिख समुदाय के संरक्षण और प्रबंधन में बने रहें। यह समझते हुए कि विचार ही आंदोलनों को दिशा देते हैं, उन्होंने ‘अकाली’ समाचार पत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे जानते थे कि जागरूक और सूचित समाज ही सशक्त समाज होता है। सेंट्रल सिख लीग, अखिल भारतीय कांग्रेस तथा विभिन्न पंथिक संगठनों में उनकी सक्रिय भागीदारी इस विश्वास को दर्शाती है कि धार्मिक स्वतंत्रता और भारत की आज़ादी का संघर्ष एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है किन्तु तेजा सिंह समुंद्री की दृष्टि केवल राजनीतिक सक्रियता तक सीमित नहीं थी। उनका दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा ही एक प्रबुद्ध समाज की आधारशिला है।
उन्होंने अनेक खालसा शिक्षण संस्थानों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके लिए उन्होंने केवल अपना नेतृत्व ही नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत संसाधन भी समर्पित किए। उनके इन प्रयासों से असंख्य युवा सिखों को ऐसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हुई, जिसकी नींव, आस्था, चरित्र और सेवा के मूल्यों पर आधारित थी। सामाजिक समानता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता भी उतनी ही उल्लेखनीय थी। जब समानता राष्ट्रीय प्राथमिकता भी नहीं बनी थी, तब तेजा सिंह समुंद्री ने अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव का दृढ़तापूर्वक विरोध किया। उनका मानना था कि ‘संगत’ और ‘पंगत’ के सिख सिद्धांत केवल विचार नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में अपनाए जाने वाले आचरण हैं, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान और समान गरिमा प्राप्त हो।
तेजा सिंह समुंद्री के व्यक्तित्व को उनके जीवन भर किए गए व्यक्तिगत त्याग से बेहतर कुछ भी व्यक्त नहीं कर सकता। उन्होंने अपने पुत्रों को भी पंथ की सेवा के लिए प्रेरित किया और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर समुदाय के कल्याण को स्थान दिया। यह केवल उनके साहस का ही नहीं, बल्कि इस अटूट विश्वास का भी प्रमाण था कि मानवता की सेवा ही सर्वोच्च कर्त्तव्य है। स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के समय, न्याय और सिख अधिकारों के प्रति अपनी अडिग प्रतिबद्धता के कारण उन्हें ब्रिटिश शासन ने गिरफ्तार कर लिया किंतु अंतिम सांस तक उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और 17 जुलाई 1926 को कारागार में शहीद हो गए। उनका शरीर भले ही कैद कर लिया गया, पर उनके आदर्शों को कभी कैद नहीं किया जा सका।
एक शताब्दी बाद भी तेजा सिंह समुंद्री आने वाली पीढ़ियों को एक अमर संदेश देते हैं-सच्चे नेतृत्व का मूल्यांकन सत्ता या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा, संतुलन और निस्वार्थ सेवा से होता है। आज, जब समाज अक्सर विभाजन और संघर्ष से घिरा दिखाई देता है, उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि स्थायी परिवर्तन विवेक, करुणा, साहस और सत्य के प्रति अटूट निष्ठा से ही संभव है।
उनकी शहादत की इस शताब्दी पर सरदार तेजा सिंह समुंद्री को स्मरण करना केवल इतिहास को श्रद्धांजलि अर्पित करना नहीं है, बल्कि उन मूल्यों को अपनाने का आह्वान भी है जो एक अधिक सशक्त, अधिक एकजुट और अधिक संवेदनशील समाज के निर्माण में हमारी सहायता कर सकते हैं।

​- मिष्ठी अरुण

स्वदेशी जागरण मंच महिला प्रमुख, अमृतसर

Team Desk