ये इथेनॉल का झमेला? क्या और क्यों?

Summary :

पिछले कुछ हफ्तों से इथेनॉल और ई-20 (E20) को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो गई है। आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है और नाराज़गी ज़ाहिर कर रहा है। वाहन चालकों की शिकायत है कि गाड़ियों के इंजन में दिक्कतें आ रही हैं, माइलेज पहले की तुलना में कम हो गया है और रबर के पुर्ज़े अपेक्षाकृत जल्दी घिस रहे हैं। इस पूरे विवाद के केंद्र में सरकार है, जिस पर घोटाले और गलत मंशा के आरोप लगाए जा रहे हैं। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि जिस योजना को मूल रूप से…

पिछले कुछ हफ्तों से इथेनॉल और ई-20 (E20) को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो गई है। आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है और नाराज़गी ज़ाहिर कर रहा है। वाहन चालकों की शिकायत है कि गाड़ियों के इंजन में दिक्कतें आ रही हैं, माइलेज पहले की तुलना में कम हो गया है और रबर के पुर्ज़े अपेक्षाकृत जल्दी घिस रहे हैं। इस पूरे विवाद के केंद्र में सरकार है, जिस पर घोटाले और गलत मंशा के आरोप लगाए जा रहे हैं। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि जिस योजना को मूल रूप से वर्ष 2030 तक चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना था, उसे जल्दबाज़ी में आगे बढ़ाया गया। हालांकि, इस विवाद को समझने से पहले इथेनॉल और ई-20 की पूरी कहानी जानना ज़रूरी है।
आख़िर इथेनॉल क्या है? इसकी संरचना क्या है? इसे लेकर इतना विरोध क्यों हो रहा है? आम आदमी खुद को ठगा हुआ क्यों महसूस कर रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या सरकार ने ऐसा कुछ किया है जो उसे नहीं करना चाहिए था?
सरल शब्दों में कहें तो इथेनॉल एक ऐसा ईंधन है, जिसे फसलों और कृषि अवशेषों से तैयार किया जाता है। इसे पहले किण्वन (फर्मेंटेशन) की प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है, फिर आसवन (डिस्टिलेशन) और शुद्धिकरण (प्यूरिफिकेशन) किया जाता है। कुल मिलाकर, यह फसलों से बनने वाला एक जैविक ईंधन है। इसके बाद इसे पैट्रोल में मिलाकर दोपहिया और चारपहिया वाहनों सहित विभिन्न वाहनों में इस्तेमाल किया जाता है। भारत इस ईंधन का उपयोग करने वाला पहला देश नहीं है। ब्राज़ील, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में लंबे समय से इथेनॉल मिश्रित पैट्रोल का उपयोग वाहनों में किया जा रहा है। भारत ने भी वर्ष 2001 में इथेनॉल मिश्रण की शुरुआत की थी। हालांकि उस समय पैट्रोल में इथेनॉल की मात्रा केवल लगभग 1 से 1.5 प्रतिशत थी, जो लगभग नगण्य मानी जा सकती है। वर्ष 2014 तक यह मिश्रण बढ़कर लगभग 5 प्रतिशत से थोड़ा कम हो गया था। यह सब सरकार के इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के तहत हुआ, जिसकी शुरुआत देश में चीनी के बढ़ते अधिशेष उत्पादन के कारण की गई थी। बाद के वर्षों में इथेनॉल मिश्रण का अनुपात बढ़ाकर पहले 10 प्रतिशत और फिर 15 प्रतिशत कर दिया गया। इसके साथ ही मक्का और टूटे हुए चावल (ब्रोकन राइस) जैसे अनाजों को भी इथेनॉल उत्पादन में शामिल किया गया। नतीजतन, अब इथेनॉल के उत्पादन के लिए बहु-स्रोत (मल्टी-फीडस्टॉक) प्रणाली अपनाई जा रही है, जिसमें गन्ने के साथ-साथ अनाज का भी इस्तेमाल किया जाता है। अब सवाल यह है कि इथेनॉल मिश्रित पैट्रोल और वाहनों में इस्तेमाल होने वाले सामान्य पैट्रोल में क्या अंतर है?
ऑटोमोबाइल उद्योग और उससे जुड़े कई संगठनों के सूत्रों के अनुसार, दोनों एक ही श्रेणी (सेम क्लास) के ईंधन हैं। उनका कहना है कि इथेनॉल मूल रूप से डिनैचर्ड अल्कोहल है जो तकनीकी रूप से पैट्रोल में मिश्रित किए जाने के लिए उपयुक्त है। हालांकि, भारतीय शुगर एंड बायो-मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के मुताबिक, इसकी एक प्रमुख कमी यह है कि इथेनॉल का ऊष्मीय मान (कैलोरिफिक वैल्यू) पैट्रोल की तुलना में कम होता है। यहीं से असली समस्या शुरू होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे पैट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ती है, ईंधन की ऊर्जा क्षमता घटती जाती है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में उपभोक्ता शिकायत कर रहे हैं और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
यहां भारत का मॉडल ब्राज़ील और कुछ अन्य देशों से अलग है। उन देशों में उपभोक्ताओं को अपनी पसंद का ईंधन चुनने का विकल्प मिलता है, जबकि भारत सरकार ने ई-20 को अनिवार्य कर दिया है। यानी यह ‘लो या छोड़ो’ (टेक इट ऑर लीव इट) जैसी व्यवस्था बन गई है। उपभोक्ताओं के पास ई-20 ईंधन अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में इसे लेकर कई तरह की आशंकाएं और भ्रांतियां सामने आई हैं, जिनमें कुछ तथ्यों पर आधारित हैं, जबकि कई केवल अफवाह, संदेह और भ्रामक जानकारी का परिणाम हैं।
सबसे बड़ी शिकायत यह है कि ई-20 को लागू करने का फैसला जल्दबाज़ी में लिया गया और इस पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। जानकारों का मानना है कि बेहतर तरीका यह होता कि सरकार मौजूदा पैट्रोल के साथ-साथ ई-20 भी उपलब्ध कराती और वाहन मालिकों व उपभोक्ताओं को नई तकनीक और ईंधन मिश्रण को धीरे-धीरे अपनाने का अवसर देती। इससे लोग अपनी इच्छा से इसे स्वीकार करते, बजाय इसके कि इसे अनिवार्य रूप से उन पर लागू किया जाता।
सरकार की ओर से भी यह अपेक्षा की जा रही थी कि वह ई-20 को लेकर उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता अभियान चलाती, उन्हें इसकी कार्यप्रणाली और लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी देती तथा इससे जुड़ी भ्रांतियों और आशंकाओं को दूर करती। हालांकि यह भी सच है कि ई-20 की शुरुआत पिछले वर्ष ही हो चुकी थी, जबकि इसे लेकर विवाद और विरोध पिछले दो महीनों में ही तेज़ हुआ है। ऐसे में यह भी माना जा रहा है कि इस नीति को बदनाम करने के लिए सुनियोजित तरीके से अभियान चलाया गया, जबकि इसके घोषित लाभ इसके नुक्सान की तुलना में कहीं अधिक बताए जाते हैं।
ई-20 का सबसे बड़ा फायदा यह माना जा रहा है कि इससे भारत आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा और घरेलू स्तर पर ईंधन उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। इससे विदेशी मुद्रा की भी बड़ी बचत होगी। दूसरी ओर उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्हें कम माइलेज और इंजन के प्रदर्शन में गिरावट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन शिकायतों में कुछ हद तक सच्चाई है। इथेनॉल मिश्रित ईंधन, खासकर जब उसमें इथेनॉल का अनुपात अधिक हो तो माइलेज में कुछ कमी आ सकती है। हालांकि उपलब्ध तकनीकी परीक्षण और वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि यह कमी बहुत मामूली होती है और सामान्य उपयोग में इसका प्रभाव सीमित रहता है।
एक अन्य प्रमुख चिंता वाहन के पुर्ज़ों को होने वाले संभावित नुक्सान को लेकर है। इस संबंध में भी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। वैज्ञानिक और तकनीकी परीक्षणों में पाया गया है कि रबर से बने कुछ पुर्ज़ों पर समय के साथ असर पड़ सकता है, लेकिन वाहन के प्रमुख यांत्रिक (मैकेनिकल) हिस्सों को किसी प्रकार के नुक्सान का कोई प्रमाण नहीं मिला है। मान्यता प्राप्त परीक्षण एजेंसियों द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर कई ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों और उद्योग संगठनों ने भी इस निष्कर्ष की पुष्टि की है।
नए और पुराने वाहनों के लिए नियम भी अलग-अलग हैं। वर्ष 2023 के बाद निर्मित वाहन ई-20 अनुकूल (E-20 Compliant) हैं और इसलिए उन पर संभावित जोखिमों का प्रभाव नगण्य माना जाता है। सवाल उन वाहनों को लेकर है जो वर्ष 2023 से पहले बनाए गए थे। ये वाहन ई-20 के अनुरूप डिज़ाइन नहीं किए गए हैं और इसलिए इनमें कुछ तकनीकी समस्याएं आने की आशंका जताई जा रही है। ऑटोमोबाइल उद्योग और वाहन निर्माताओं से जुड़े विशेषज्ञों का भी कहना है कि ऐसे पुराने वाहनों में कम माइलेज, इंजन के प्रदर्शन में गिरावट और रबर के पुर्ज़ों के अपेक्षाकृत जल्दी खराब होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। यही वह बिंदु है जहां लोगों की नाराज़गी सबसे अधिक दिखाई देती है।
भारत में अधिकांश लोग अपने वाहन जल्दी नहीं बदलते और आमतौर पर उन्हें 5 से 10 वर्षों तक इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में ई-20 ईंधन का अनिवार्य उपयोग पुराने वाहनों के मालिकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। आलोचकों का कहना है कि इथेनॉल मिश्रित पैट्रोल को जल्द लागू करने की जल्दबाज़ी में सरकार ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। इसके साथ ही सरकार और आम नागरिक के बीच पहले से मौजूद भरोसे की कमी (ट्रस्ट डेफिसिट) ने भी इस विवाद को और गहरा कर दिया है। शायद यही वजह है कि इथेनॉल आधारित ईंधन के स्पष्ट और बड़े लाभ कुछ चुनिंदा कमियों के पीछे दब गए हैं। इन कमियों को लगातार प्रमुखता से उठाया जा रहा है और कुछ मामलों में बढ़ा-चढ़ाकर भी पेश किया जा रहा है जिससे लोगों के मन में आशंकाएं और असंतोष पैदा हो रहा है। निःसंदेह, सरकार ने ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है, लेकिन जहां वह चूकती दिखाई देती है वह है वाहन उपयोगकर्ताओं चाहे दोपहिया चालक हों या कार चलाने वाले आम नागरिक का विश्वास जीतने में।

Team Desk