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किसान आंदोलन की ‘राह’

सरकार की आंदोलनकारी किसानों से बातचीत फिर असफल हो गई है और किसानों ने बुधवार से पुनः दिल्ली कूच का आह्वान कर दिया है। किसान मांग कर रहे हैं कि उनकी 29 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी दी जाए जिनकी घोषणा स्वयं सरकार करती है। कानूनी गारंटी का मोटा मतलब यह निकलता है कि जो समर्थन मूल्य घोषित हो उससे निचले भाव पर फसल की खरीदी ना हो सके। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों की फसल चाहे सरकार खरीदे या कोई और पूंजीपति या उद्योगपति या व्यापारी वह न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर फसल नहीं खरीद पाएगा परंतु खुला बाजार मांग और आपूर्ति के समीकरण पर चलता है। किसान की फसल आने का एक समय निश्चित होता है और इस अंतराल में पूरा उत्पादन बाजार में आता है जिससे माल की सप्लाई बहुत बढ़ जाती है और उसके दाम कम हो जाते हैं। किसान यही चाहते हैं की खुले बाजार में मांग और सप्लाई का समीकरण लागू न हो क्योंकि अपनी फसल बेचने के बाद किसान स्वयं उपभोक्ता बनकर बाजार में खड़ा हो जाता है। बाजार के इस समीकरण को तोड़ने के लिए यह आवश्यक लगता है कि किसान की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य इस प्रकार लागू हो जिससे उसकी फसल एक अंतराल में भारी मिकदार में आने के बावजूद नीचे दामों पर ना खरीदी जा सके। किसान यह भी मांग कर रहे हैं कि फसलों की आवक के समय यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य से बाजार की ताकतें उनके माल का दाम कम आकती हैं तो जो बाजार मूल्य और समर्थन मूल्य में अंतर होता है उसकी भरपाई सरकार करें। सरकार पर यह तो जिम्मेदारी रहेगी कि वह अधिक से अधिक फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदे मगर कोई बाध्यता नहीं रहेगी। सरकार अपनी आवश्यकता के अनुसार ही किसान का माल खरीदती है जिससे वह अपनी सामाजिक देनदारियां निपटा सके जैसे की खाद्य कानून के तहत उसे जो भोजन समाज के कमजोर तबको को देना होता है उसके लिए वह सीधे किसानों से खरीदारी करती है। 2021 में जब किसानों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया था तो वह मूल रूप से उन तीन कृषि कानून के खिलाफ था जो केंद्र सरकार इस क्षेत्र के लिए ला रही थी। इन कानून को किसानों ने नकार दिया था जिसकी वजह से सरकार को यह कानून वापस लेने पड़े और उसके बाद किसानों को यह आश्वासन देना पड़ा कि वह उनकी मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करेगी तथा समर्थन मूल्य को कानूनी दर्जा देने के उपाय भी खोजेगी। इस बारे में एक 26 सदस्य कमेटी का गठन भी किया गया परंतु उसकी रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है, हालांकि इसकी 33 बैठकें हो चुकी हैं। आंदोलनकारी किसान अभी पंजाब-हरियाणा के शंभू बॉर्डर पर बैठे हुए हैं और उनकी मांग है कि उन्हें दिल्ली आने दिया जाए। उनका आंदोलन पूर्णरूप से शांतिपूर्वक रहेगा इसका आश्वासन किसान लगातार दे रहे हैं। हरियाणा और पंजाब के बीच में अवरोध लगाकर अभी किसानों को शंभू बॉर्डर पर ही रोक दिया गया है और चंडीगढ़ में सरकार और किसानों के प्रतिनिधियों के बीच चार दौर की बातचीत भी इस दौरान हो चुकी है मगर इसका नतीजा कुछ नहीं निकला। सरकार की तरफ से वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने भाग लिया। इस बातचीत में एक प्रस्ताव रखा गया कि पंजाब-हरियाणा के किसान अपनी खेती का विविधिकरण करें अर्थात वे चावल और गेहूं के अलावा दलहन और कपास आदि की खेती करें। सरकार का यह कहना है कि वह अरहर, मूंग, उड़द तथा मक्का व कपास की खेती करें तो सरकार अपनी एजेंसियों के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करके 5 साल तक इनकी खरीदारी करेगी। इसका मतलब यह है कि सरकार इन पांच फसलों में ठेके की खेती को बढ़ावा देगी। किसानों को यह मांग स्वीकार नहीं है और वह मांग कर रहे हैं की सरकार इसके स्थान पर उनकी 23 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी दे। किसान नेताओं का कहना है की सरकार कह रही है की इन पांच फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर उनकी खरीदारी पर सरकार का डेढ़ लाख करोड़ रुपया खर्च होगा जबकि सरकार यदि 23 फसलों के समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी दे तो उसका पौने दो लाख करोड़ रुपया खर्च होगा। किसान नेताओं का तर्क है कि सरकार पाम आयल के आयात पर ही पौने दो लाख करोड़ रुपया खर्च कर देती है अगर सरकार तिलहन पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करें तो यह पौने दो लाख करोड़ रुपए बचा सकती है। सरकार और किसानों के बीच बातचीत से ऐसा महसूस हो रहा है कि दोनों के बीच गहरे मतभेद हैं और सहमति के वे बिंदु नहीं उभर रहे हैं जिन पर आगे बातचीत हो सके। कृषि क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था की आज भी जान है क्योंकि 60प्रतिशत लोग इस पर निर्भर करते हैं। बेशक सकल उत्पादन में कृषि क्षेत्र का हिस्सा गिरा हो मगर रोजगार देने में यह क्षेत्र आज भी सबसे आगे है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चलाने में इस क्षेत्र की अहम भूमिका है। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखकर के ही आगे का रास्ता तय किया जाना चाहिए।

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