ट्रम्प की चीन यात्रा का अर्थ

Summary :

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि वर्तमान में विश्व राजनीति में जो हड़कम्प मचा हुआ है उसके लिए पूरी तरह से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने अमेरिका को पुनः महान बनाने के चक्कर में पूरे विश्व क्रम को झिंझोड़ कर रख दिया है और यूरोप समेत समस्त एशिया व अफ्रीकी देशों के समक्ष आत्म सम्मान बचाने का संकट पैदा कर दिया है। भारत के पड़ोस ईरान में जो अमेरिका व इजराइल मिल कर ईरान के विरुद्ध युद्ध कर रहे हैं उससे विश्व के अधिसंख्य देशों के समक्ष ऊर्जा संकट पैदा हो गया है और…

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि वर्तमान में विश्व राजनीति में जो हड़कम्प मचा हुआ है उसके लिए पूरी तरह से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने अमेरिका को पुनः महान बनाने के चक्कर में पूरे विश्व क्रम को झिंझोड़ कर रख दिया है और यूरोप समेत समस्त एशिया व अफ्रीकी देशों के समक्ष आत्म सम्मान बचाने का संकट पैदा कर दिया है। भारत के पड़ोस ईरान में जो अमेरिका व इजराइल मिल कर ईरान के विरुद्ध युद्ध कर रहे हैं उससे विश्व के अधिसंख्य देशों के समक्ष ऊर्जा संकट पैदा हो गया है और अमेरिकी राष्ट्रपति शेखी बघार रहे हैं कि अमेरिका के पास पैट्रोलियम तेल व गैस की कमी नहीं है। दरअसल यह अमेरिका की वह हठधर्मिता है जिसकी वजह से दुनिया के विकासशील एशियाई व अफ्रीकी देशों को अपने विकास के लिए कोई विकल्प नहीं सूझ रहा है। एेसे विश्व वातावरण में ट्रम्प चीन की यात्रा पर हैं जहां वह इस देश के साथ अपने मतभेदों को दूर करने का प्रयास कर सकते हैं।
वास्तव में ट्रम्प चीन की यात्रा पर अपने राष्ट्रीय हित इस प्रकार साधने गये हैं कि चीन जैसा तेजी से विकास करता देश अमेरिका की सहायता के बिना कुछ न कर सके। मगर चीनी नेता भी बहुत तेज हैं और वे एशिया व अफ्रीका में अपने बढ़ते निवेश पर अमेरिकी नजर नहीं पड़ने देना चाहते। मगर यह भी सत्य है कि अमेरिका व चीन के बीच विश्वास की भारी कमी पैदा हो चुकी है जिसकी वजह से ट्रम्प कभी चीन पर भारी शुल्क दरें लगाने का एेलान करते हैं तो कभी उसके साथ मतभेदों को दूर करने की तजवीजें ढूंढते हैं। चीन ने पिछले 15 वर्षों के दौरान आर्थिक मोर्चे पर जो बढ़त प्राप्त की है उसकी वजह से अमेरिका व चीन की अर्थ व्यवस्थाएं एक-दूसरे पर निर्भर होती जा रही हैं। एक तरफ चीन जहां दुनिया का उत्पादन केन्द्र बन चुका है और सामान्य उपभोक्ता सामग्री से लेकर टैक्नोलॉजी उत्पादन क्षेत्र तक में उसका दबदबा कायम हो चुका है वहीं अमेरिका उच्च टैक्नोलॉजी के क्षेत्र शोध व उन्नयन पर अपना कब्जा जमाये हुए हैं। अमेरिका की वरीयता है कि उसके बोइंग वायुयान से लेकर बीफ (मांस) सोयाबीन और बोर्ड आॅफ ट्रेड को संरक्षण मिले। बोर्ड आॅफ ट्रेड के माध्यम से अमेरिका सेमी कंडक्टर व क्रत्रिम मेधा (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) के क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर चीन को पछाड़ेे। अमेरिका चाहता है कि एेसे क्षेत्रों में व्यापार बढ़ाकर वह चीन के साथ अपने कारोबार में सन्तुलन लाये। क्योंकि चीन अमेरिका को जितना निर्यात करता है अमेरिका उसके सामने कहीं नहीं टिकता है। दूसरी तरफ चीन चाहता है कि अमेरिका ताइवान के मामले में अपनी जिद छोड़े और उसे किसी प्रकार की मदद न दे। जहां तक व्यापार का सम्बन्ध है तो चीन की कोशिश है कि अमेरिका उसके साथ उच्च टैक्नोलॉजी साझा करे और उसके आयात पर शुल्क की मुनासिब दर ही लागू करे। मगर इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू ईरान में चल रही लड़ाई भी है। ईरान के पक्ष में रूस व चीन इस प्रकार हैं कि वे हर कूटनीतिक मोर्चे पर ईरान का समर्थन करते हैं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका का कोई भी वार निरुद्देश्य करते रहते हैं। हालांकि चीन प्रत्यक्ष रूप से ईरान की सैनिक मदद नहीं कर रहा है मगर उससे तेल की खरीदारी जारी रख कर वह उसकी अर्थ व्यवस्था को ढहने से बचाने का प्रयास भी कर रहा है।
चीन अमेरिका को दुर्लभ खनिज पदार्थों की सप्लाई करने में भी कंजूसी बरत रहा है जबकि इन पदार्थों का दुनिया में वह सबसे बड़ा वितरक है। इससे अमेरिका के वाणिज्यिक विकास पर विपरीत असर पड़ रहा है। अतः चीन व अमेरिका इस समय एक–दूसरे के साथ ‘तू डाल-डाल मैं पात-पात’ की तर्ज पर चल रहे हैं और सन्देश दे रहे हैं कि किसी एक की शर्त पर दोनों देशों के बीच कोई समझौता नहीं हो सकता। इसका विश्व व्यवस्था के क्रम पर उल्टा असर पड़ रहा है क्योंकि पहले से बनी व्यवस्था के तहत बने नियामक इस प्रकार टूट रहे हैं कि कथित विकसित यूरोपीय देश व विकासशील एशियाई देश एक ही पंक्ति में खड़े नजर आने लगते हैं। यह संस्थागत तरीके से विश्व क्रम को उलटने का फार्मूला है जो ट्रम्प का इजाद किया हुआ है। अतः ट्रम्प व चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भेंट के बाद इस बात की संभावना ज्यादा है कि यदि दोनों देशों के बीच सम्बन्धों में और प्रगाढ़ता न भी आये तो स्थिरता जरूर आये। यह स्थिरता विश्व क्रम की स्थिरता के लिए बहुत जरूरी मानी जा रही है जिसके परिक्षेत्र में ईरान में चल रहा युद्ध भी आता है ।
चीन कूटनीतिक रूप से अमेरिका पर दबाव बना सकता है कि वह ईरान में स्थायी युद्ध विराम की घोषणा करे वरना चीन भी अमेरिका की भांति ताइवान को दी जा रही सैनिक मदद की तरह ईरान के पाले में खड़ा हो सकता है। एेसी स्थिति भारत समेत विभिन्न अन्य देशों के लिए किसी भी तरह से प्रिय नहीं होगी क्योंकि तब युद्ध की विभीषिका नये तेवरों में प्रकट हो सकती है। अतः बहुत जरूरी है कि इन दोनों विश्व शक्तियों के बीच स्थिरता का वातावरण बने जिससे विश्व में बेचैनी और न बढ़े। मगर ट्रम्प के लिए यह समय बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि नवम्बर महीने में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने हैं और इस दौरान ट्रम्प की अपने देश में लोकप्रियता काफी घट गई है। अतः उनके लिए जरूरी है कि वह चीन से खाली हाथ न लौटें।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.