भारत में सोना केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव की चीज है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहराते वैश्विक आर्थिक संकट और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारतीयों से कम से कम एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है। सोना खरीदने का सीधा संबंध हमारे विदेशी मुद्रा भंडार से होता है। भारत को सोने के हर एक औंस का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करना पड़ता है। सोने की जितनी ज़्यादा खरीद उतनी डॉलर की मांग भी बढ़ती है और जितनी मांग बढ़ती है, उतनी डॉलर की कीमत भी बढ़ जाती है। भारत सरकार ने भी अपनी आर्थिक स्थिित ठीक करने के लिए उपाय करने शुरू कर दिए हैं। भारत ने अपने गोल्ड रिजर्व को बढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले दो दशकों में भारत ने लगातार अपनी गोल्ड होल्डिंग बढ़ाई है। दूसरी तरफ भारतीय परिवारों के लिए सोना न केवल पारंपरिक गहनों के रूप में एक फैशन है, बल्कि यह समृद्धि, सुरक्षा और मुद्रास्फीति के खिलाफ एक दीर्घकालिक रक्षा के रूप में भी कार्य करता है। अनुमान के मुताबिक भारतीय परिवारों के पास मौजूद कुल सोने की वैल्यू 5 ट्रिलियन डॉलर (450 लाख करोड़) के पार निकल गई है। यह आंकड़ा देश की कुल 4.1 ट्रिलियन डॉलर यानी, 370 लाख करोड़ रुपए की जीडीपी से भी ज्यादा है। सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के कारण ऐसा हुआ है।
एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय घरों में लगभग 34,600 टन सोना जमा है। ‘यह आंकड़ा भारत की अर्थव्यवस्था में सोने के सांस्कृतिक, वित्तीय और मनोवैज्ञानिक महत्व को दर्शाता है।’आमतौर पर माना जाता है कि जब किसी संपत्ति की कीमत बढ़ती है तो लोग खुद को अमीर महसूस करते हैं और ज्यादा खर्च करते हैं। इसे वैल्थ इफेक्ट यानी धन का प्रभाव कहते हैं। भारत में 75-80 प्रितशत सोना ज्वेलरी के रूप में है। लोग इसे लॉन्ग टर्म सेविंग और परंपरा की तरह देखते हैं। आज के समय में दुनिया तेजी से बदल रही है। भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव के बीच सोना फिर से मजबूत और सुरक्षित निवेश के रूप में उभर रहा है। भारत में इस रणनीति को संभालने का काम भारतीय रिजर्व बैंक करता है, जिसने हाल के वर्षों में अपने गोल्ड रिजर्व को तेजी से बढ़ाया है। यूएस और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर दुनियाभर में देखने को मिल रहा है। इसी वजह से भारत की अर्थव्यवस्था भी गड़बड़ा रही है। तनाव की स्थिति इस कदर बिगड़ रही है कि अब भारत अपनी आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए तेज हो गया है। इसके लिए विदेशों में रखा भारत का सोना वापस लाया जा रहा है।
वहीं आरबीआई की अक्तूबर 2025 से मार्च 2026 की रिपोर्ट के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत के पास इस वक्त कुल 880.52 मीट्रिक टन सोना है। इसका लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा यानी करीब 680 टन अब देश में ही सुरक्षित रखा गया है। सिर्फ 6 महीनों में भारतीय रिजर्व बैंक ने करीब 104.23 मीट्रिक टन सोना अपने भंडार में जोड़ा। वहीं 197.67 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स के पास है, जबकि 2.8 टन जमा के रूप में है।
फिलहाल के हालातों को देखते हुए वैश्विक जोखिम से खुद को बचाने के लिए भारत तेजी से ये कदम उठा रहा है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ छह महीने में ही 104.23 टन सोना देश में वापस लाया गया है। बता दें कि मार्च 2023 तक हमारा केवल 37 प्रतिशत सोना ही देश में था। ये तेजी बताती है कि भारत अब किसी भी तरह के बाहरी जोखिम को हल्के में नहीं ले रहा है। दरअसल, रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा अफगानिस्तान और रूस के रिजर्व फंड पर रोक लगाने जैसी घटनाओं ने पूरी दुनिया के केंद्रीय बैंकों की नींद उड़ा दी है। दुनिया को यह समझ आ गया है कि दूसरे देशों में रखी संप्रभु संपत्ति पूरी तरह से राजनीतिक फैसलों से सुरक्षित नहीं है। आज के टूटते वैश्विक मौद्रिक तंत्र में अगर सोना आपके सीधे कब्जे में नहीं है तो वह वास्तव में आपका है ही नहीं। भारत का यह कदम एक तरह का ‘स्ट्रैटेजिक इंश्योरेंस’ है।
संकट के समय तरलता (लिक्विडिटी) के लिए यह तभी काम आएगा जब यह हमारी अपनी पहुंच में होगा। ऐसे में भारत विदेशों में जमा अपना सोना तेजी से वापस ला रहा है। सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के कई अन्य देश भी विदेशी जोखिमों से बचने के लिए अपना सोना वापस मंगा रहे हैं। फ्रांस 2026 की शुरुआत में न्यूयॉर्क फेडरल रिजर्व से 129 टन सोना वापस पेरिस ले आया। जर्मनी न्यूयॉर्क में रखे अपने 1,236 टन सोने की सुरक्षा को लेकर विचार कर रहा है। टूटती वैश्विक व्यवस्था के मौजूदा दौर में दुनिया भर के सेंट्रल बैंक मानने लगे हैं कि अगर सोना उनके पास नहीं है तो ये उनका सोना नहीं है। मौजूदा सोने के मूल्य पर बैंक ऑफ इंग्लैंड को सालाना लगभग 10 करोड़ डॉलर यानी 950 करोड़ रुपये के आसपास की कस्टडी फीस देनी पड़ती थी। ये पैसा अब नहीं देना पड़ेगा। भारतीय फाइनेंशियल मार्केट में लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए सोना सीधे उपलब्ध होगा। आरबीआई जरूरत पड़ने पर इसे रुपये की कीमत के लिए या स्वैप के माध्यम से डॉलर जुटाने के लिए तत्काल इस्तेमाल कर सकेगा।
आज से 35 साल पहले खाड़ी युद्ध के समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 3 हफ्ते के आयात के बराबर भी नहीं बचा था। ऐसी स्थिति में भारत को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ से 7 अरब डॉलर का कर्ज लेना पड़ा। इसके लिए भारत के स्वर्ण भंडार से 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था। 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड ले जाना पड़ा जबकि 20 टन सोना यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड चार्टर्ड विमान से ये सोना भेजा गया था। उस वक्त भारत का सोने का भंडार केवल 333 टन था। यानी 20 प्रतिशत सोना गिरवी रखना पड़ा। सोचिए, वही बैंक ऑफ इंग्लैंड, वही स्विट्जरलैंड, जहां भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा लेकिन 2026 में युद्ध के हालात में भी भारत विदेश से अपना सोना वापस ला रहा है। उसी बैंक ऑफ इंग्लैंड से सोना निकाल रहा है, जिसके पास सोना गिरवी रखने की मजबूरी आई थी। उस वक्त सिर्फ 1 अरब डॉलर के आसपास भारत का विदेशी मुद्रा भंडार था, फिलहाल भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर के आसपास है। यानी 700 गुना ज्यादा। 2026 में सोना वापस लाना भारत के लिए गर्व की बात है। इसीलिए हम इसे देश का गोल्डन डिसीजन कह रहे हैं।
देश की गोल्डन स्ट्रेटेजी
Summary :
भारत में सोना केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव की चीज है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहराते वैश्विक आर्थिक संकट और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारतीयों से कम से कम एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है। सोना खरीदने का सीधा संबंध हमारे विदेशी मुद्रा भंडार से होता है। भारत को सोने के हर एक औंस का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करना पड़ता है। सोने की जितनी ज़्यादा खरीद उतनी डॉलर की मांग भी बढ़ती है और जितनी मांग बढ़ती है, उतनी डॉलर की कीमत भी बढ़ जाती है।…


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