दो बोतल तीन गिलास की कहानी

Summary :

एक पुस्तक सरकार की समीक्षा के अधीन थी और दूसरी प्रकाशन के लिए तैयार खड़ी थी। क्या यह एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ थी?या फिर हिसाब चुकता करने की कोशिश? पहली नजर में मामला कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। लेकिन पहले संदर्भ समझना जरूरी है। जनरल मनोज मुकुंद नरवणे फरवरी की उस सुबह घर पर आराम से समय बिता रहे थे, तभी मित्रों के घबराए हुए फोन कॉल ने उन्हें चौंका दिया। उन्हें तनिक भी अंदाजा नहीं था कि उनकी अभी अप्रकाशित पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी में लिखी बातों को लेकर राजनीतिक तूफान खड़ा होने वाला है।…

एक पुस्तक सरकार की समीक्षा के अधीन थी और दूसरी प्रकाशन के लिए तैयार खड़ी थी। क्या यह एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ थी?या फिर हिसाब चुकता करने की कोशिश? पहली नजर में मामला कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। लेकिन पहले संदर्भ समझना जरूरी है।
जनरल मनोज मुकुंद नरवणे फरवरी की उस सुबह घर पर आराम से समय बिता रहे थे, तभी मित्रों के घबराए हुए फोन कॉल ने उन्हें चौंका दिया। उन्हें तनिक भी अंदाजा नहीं था कि उनकी अभी अप्रकाशित पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी में लिखी बातों को लेकर राजनीतिक तूफान खड़ा होने वाला है।
रिपोर्टों के अनुसार, पुस्तक में उन्होंने संकेत दिया था कि सरकार ने मानो उन्हें अकेला छोड़ दिया, उनके हाथ में “मुश्किल परिस्थिति” थमा दी, गलवान में जब दुश्मन दरवाजे पर खड़ा था तब निर्णय लेने में एक घंटे से अधिक समय गंवा दिया गया और अंततः कहा गया “जो उचित समझो करो।” इसी मुद्दे को लेकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संसद में बोलते हुए जनरल नरवणे की पुस्तक के अंशों का हवाला देने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “यह सेना प्रमुख नरवणे के संस्मरण से है, जब चार चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर रहे थे, तब वे डोकलाम में एक पहाड़ी अवरोध तैयार कर रहे थे।”
हालांकि सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि संसद में किसी अप्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करना नियमों के विरुद्ध है, लेकिन गांधी ने संसद परिसर के बाहर जनरल की पुस्तक की एक प्रति भी प्रदर्शित की।
जानकारी न रखने वालों के लिए बता दें कि जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की पुस्तक में यह उल्लेख है कि वर्ष 2020 में तेजी से आगे बढ़ रही चीनी सेना पर तोपों से गोलाबारी की अनुमति मांगने के बावजूद राजनीतिक नेतृत्व ने निर्णय लेने में विलंब किया। ऐसा इसलिए क्योंकि गोली चलाने की अनुमति शीर्ष स्तर से मिलना आवश्यक था। और जब एक घंटे से अधिक समय बाद आदेश आया, तब उनसे कहा गया कि वे परिस्थिति के अनुसार उचित निर्णय लें। बताया जाता है कि नरवणे ने लिखा कि उनके हाथ में “मुश्किल परिस्थिति” थमा दी गई थी, जिसे राहुल गांधी ने सरकार द्वारा जिम्मेदारी से पीछे हटने के समान बताया। इसके बावजूद पुस्तक और उससे जुड़े बयान विवादों में घिर गए। सरकार ने पुस्तक की सामग्री की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाए। यह पुस्तक अब तक प्रकाशित नहीं हो सकी है क्योंकि इसे रक्षा मंत्रालय से अनुमति मिलना अभी बाकी है। उस समय जनरल नरवणे ने कुछ नहीं कहा, जबकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी रहा। अब उन्होंने सामने आकर ऐसा बयान दिया है जिसे कई लोग सरकार को क्लीन चिट देने और उसके पूर्ण समर्थन की पुष्टि के रूप में देख रहे हैं। कुछ लोगों के अनुसार यह यू-टर्न है, जबकि अन्य इसे स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास बता रहे हैं। हालांकि नरवणे लगातार यह कहते रहे हैं कि उन्हें किसी को स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं है और सेना प्रमुख के रूप में उन्होंने वही किया जो उनसे अपेक्षित था, लेकिन तथ्य यह भी है कि उन्होंने अब एक प्रकार का स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि सरकार को सेना पर पूरा भरोसा है और वह पूरी तरह उसके साथ खड़ी है।
यह तर्क कई लोगों को इसलिए असंतोषजनक लगता है क्योंकि राहुल गांधी द्वारा सार्वजनिक रूप से उठाए गए पुस्तक के अंश एक अलग कहानी बयान करते हैं। उस समय यह धारणा बनी थी कि सरकार निर्णय लेने में हिचकिचाई, जिम्मेदारी से बचती रही और महत्वपूर्ण समय गंवाने के बाद फैसला सेना प्रमुख पर छोड़ दिया, जिसे नरवणे ने “मुश्किल परिस्थिति” थमाए जाने जैसा बताया था। हालांकि नरवणे ने इस पूरे विवाद को “गलत व्याख्या” करार दिया है, लेकिन यह तथ्य बना हुआ है कि उनके शब्दों से एक स्तर पर यही संदेश गया था कि सरकार पीछे हट गई और उसने अपेक्षित कदम नहीं उठाए। दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए तो इसका अर्थ यह भी निकलता है कि सरकार ने सेना के कामकाज में हस्तक्षेप न करना ही उचित समझा और उसे स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की छूट दी। यदि पहले पक्ष को माना जाए तो यह वही नकारात्मक तस्वीर है जिसे राहुल गांधी सामने लाना चाहते थे, जबकि दूसरा पक्ष वह सकारात्मक संदेश है जिसे जनरल मनोज मुकुंद नरवणे दुनिया के सामने स्थापित करना चाहते हैं। हालांकि पुस्तक का भविष्य अभी अधर में लटका हुआ है क्योंकि रक्षा मंत्रालय ने अब तक इसकी सामग्री को मंजूरी नहीं दी है। सेना प्रमुख के पद पर रहते हुए नरवणे कई संवेदनशील जानकारियों से अवगत रहे थे, इसलिए पुस्तक की सामग्री की सरकारी जांच और स्वीकृति आवश्यक मानी जा रही है।
यह मंजूरी मिलती या नहीं, यह अभी भी अनिश्चित है, लेकिन राहुल गांधी के इस विवाद में कूद पड़ने के बाद पुस्तक का भविष्य लगभग तय माना जा रहा है। नरवणे हालांकि इस देरी को “उत्तम मदिरा की तरह पुस्तक के और परिपक्व होने” की प्रक्रिया बताते हैं। लेकिन दुनिया रुकती नहीं और अब न ही सेवानिवृत्त जनरल रुकने वाले हैं। उन्होंने हर वर्ष एक पुस्तक लिखने का संकल्प लिया है। उनकी नवीनतम पुस्तक वर्दीधारी जवानों की कहानियों पर आधारित है-उन बातों पर, जो ज्ञात भी हैं और अज्ञात भी। द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड शीर्षक वाली इस पुस्तक में “ढाई मूर्ति” से जुड़ी रोचक कहानियां हैं। इसमें यह भी बताया गया है कि सशस्त्र बलों में सलामी लौटाना क्यों अनिवार्य माना जाता है और किस प्रकार “दो बोतल तीन गिलास” जैसी कहावत अस्तित्व में आई। यह परंपरा उस समय की है जब अवकाश स्वीकृति की प्रक्रिया तीन स्तरों से होकर गुजरती थी। इसकी शुरुआत प्रतिवेदन अधिकारी से होती थी और अंततः सर्वोच्च कमांडर तक पहुंचती थी। सभी स्तरों से अनुमति मिलने के बाद अधिकारी शाम को अधिकारी मेस में एकत्र होकर इसका उत्सव मनाते थे। वहां तीन अधिकारियों के लिए तीन गिलास होते थे, लेकिन बीयर की बोतलें केवल दो होती थीं, जिन्हें तीनों के बीच बांटकर पिया जाता था। इसी से “दो बोतल तीन गिलास” कहावत प्रचलित हुई।
“ढाई मूर्ति” की चर्चा के साथ-साथ पुस्तक में उस धारणा को भी तोड़ा गया है कि जहाज डूबते समय कप्तान हमेशा उसके साथ ही डूब जाता है। लेकिन पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश सलामी और “सलाम” के बीच के अंतर को लेकर है। जनरल कहते हैं, “सलामी अधीनता का प्रतीक नहीं है। सलामी और सलाम में अंतर होता है। सलामी सीना तानकर दी जाती है और इसमें किसी के आगे झुकना नहीं होता। जबकि सलाम में व्यक्ति श्रद्धा से सिर झुकाता है, मानो वह स्वयं को दूसरे से नीचे मान रहा हो। सलामी समानता का प्रतीक है, अधीनता का नहीं।”
हालांकि जिन लोगों के लिए “सलाम” एक परंपरा और अनिवार्य अभिवादन का हिस्सा है, वे इस विचार को किस प्रकार लेंगे, इस पर बहस संभव है। आखिर जनरल नरवणे ने गोलियों और बंदूकों की दुनिया से निकलकर कलम और स्याही की दुनिया में कदम कैसे रखा? लेखन की प्रतिभा उन्हें कहां से मिली? इस पर वे कहते हैं, “यह मेरी मां से मिला है।” उनकी मां मराठी भाषा की प्रतिष्ठित लघुकथा लेखिका हैं और कई पुस्तकें लिख चुकी हैं।

Shera Rajput