तिनके-तिनके होती तृणमूल

Summary :

देश के दो राज्यों में कल दो महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों ने भविष्य की राजनीति की तरफ इंगित करते हुए साफ किया कि एक तरफ जहां बलशाली क्षेत्रीय दलों का ह्रास हो रहा है वहीं दूसरी ओर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस अपनी विचारधारा की ताकत पर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए जद्दोजहद कर रही है। इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि राजनीति में सकल रूप से क्षेत्रीय दलों का प्रभाव जिस तरह पिछले कुछ दशकों खास कर 90 के दशक के बाद बढ़ा था उसके पीछे कोई निश्चित सैद्धान्तिक विचारधारा काम नहीं कर रही थी, बल्कि…

देश के दो राज्यों में कल दो महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों ने भविष्य की राजनीति की तरफ इंगित करते हुए साफ किया कि एक तरफ जहां बलशाली क्षेत्रीय दलों का ह्रास हो रहा है वहीं दूसरी ओर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस अपनी विचारधारा की ताकत पर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए जद्दोजहद कर रही है। इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि राजनीति में सकल रूप से क्षेत्रीय दलों का प्रभाव जिस तरह पिछले कुछ दशकों खास कर 90 के दशक के बाद बढ़ा था उसके पीछे कोई निश्चित सैद्धान्तिक विचारधारा काम नहीं कर रही थी, बल्कि कोरी सत्ता की समीकरणें प्रमुख भूमिका निभा रही थीं और लगातार राज कर रही कांग्रेस पार्टी के शिथिल रवैये के प्रति लोगों में उत्पन्न हुई उदासीनता को भुना रही थीं। एक तरफ दक्षिण के राज्य कर्नाटक में कल कांग्रेस के नये मुख्यमन्त्री श्री डी.के. शिवकुमार ने पद व गोपनीयता की शपथ अपने राज्य के राजनीति के महाबली के रूप में स्थापित श्री सिद्धारमैया को गद्दी से उतार की तो दूसरी तरफ पूर्व के राज्य प. बंगाल में एक महीने पहले तक राज कर रहीं जन नेता के रूप में जानी जाने वाली सुश्री ममता बनर्जी के विरुद्ध उनके अपने ही दल तृणमूल कांग्रेस में हुए व्यापक विद्रोह को वैधानिकता प्राप्त हुई।
ममता दीदी के विरुद्ध यह विद्रोह उन्हीं की पार्टी के एक नेता ऋतुब्रत बनर्जी ने किया और घोषणा की कि राज्य विधानसभा में हाल के चुनावों में चुने गये पार्टी के 80 विधायकों में से 60 उनके साथ हैं अतः वही विधानमंडल दल के नेता हैं। उनके इस दावे को विधानसभा के अध्यक्ष ने जायज पाया और उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे दी। जबकि इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के महासचिव व ममता दी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने अध्यक्ष को अपनी पार्टी की ओर से सूचित किया था कि उनकी पार्टी का विधानमंडल दल श्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय को अपना नेता चुनता है अतः उन्हें नेता प्रतिपक्ष घोषित किया जाना चाहिए परन्तु इस पक्ष के बारे में श्री ऋतुब्रत बनर्जी के साथ एक अन्य विधायक ने दावा किया कि अभिषेक बनर्जी द्वारा भेजे गये पत्र पर उनके जाली दस्तखत हैं और इसकी शिकायत विधानसभा अध्यक्ष के साथ लोकसभा अध्यक्ष को भी कर दी क्योंकि अभिषेक बनर्जी प. बंगाल की डायमंड हार्बर सीट से लोकसभा सदस्य हैं। दूसरी तरफ राज्य विधानसभा के तृणमूल कांग्रेस के 58 विधायकों ने श्री ऋतुब्रत बनर्जी के पक्ष में अध्यक्ष को जो पत्र भेजा उसमें साफ लिखा कि वे ही तृणमूल कांग्रेस का विधानसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि उनके पास दो-तिहाई विधायकों से अधिक का बहुमत प्राप्त है और ममता दीदी उनकी नेता हैं। इससे स्पष्ट है कि ममता दी की पार्टी में जो विद्रोह हुआ है वह वैधानिक नियमों की परिधि में सर्वथा जायज है। क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष को इस बात से मतलब होता है कि किसी पार्टी के विधानमंडल दल में किस गुट का बहुमत है । इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं।
पहला उदाहरण यह है कि 1969 में जब स्वर्गीय इन्दिरा गांधी ने बैंक राष्ट्रीयकरण के मुद्दे पर विभाजन किया तो पार्टी दो भागों में विभाजित हो गई। एक नई कांग्रेस बनी और दूसरी संगठन कांग्रेस बनी। इन्दिरा जी की नई कांग्रेस सत्ता में थी और संगठन कांग्रेस के सांसद विपक्ष में बैठे। उस समय लोकसभा में संगठन कांग्रेस के सांसदों की संख्या सभी विपक्षी दलों के सांसदों से ज्यादा थी अतः लोकसभा अध्यक्ष ने संगठन कांग्रेस के नेता स्व. रामसुभग सिंह को ही विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी । अतः प. बंगाल में भी आज ठीक 1969 जैसे हालात बने हैं, फर्क सिर्फ यह है कि उस समय कांग्रेस सत्ता में थी और आज प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पार्टी विपक्ष में है। मगर इसके साथ यह भी हकीकत है कि विगत 4 मई को प. बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजों में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के बुरी तरह पराजित हो जाने के बाद कुछ ही दिनों में इसमें विद्रोह के बादल मंडराने लगे इसका अर्थ यही निकलता है कि ममता दी के साथ जो भी नेता उनके सत्ता में रहते चिपके हुए थे वे उनकी पार्टी की विचारधारा की वजह से नहीं बल्कि सत्ता की वजह से चिपके हुए थे। हालांकि यह स्थिति हम आजकल राष्ट्रीय राजनीतिक धरातल पर भी देख रहे हैं, मगर प. बंगाल में इसका प्रदर्शन बहुत विद्रूप स्वरूप में हुआ है और पार्टी में अभिषेक बनर्जी के विरुद्ध गुस्सा फूट पड़ा है। इसकी तुलना हम 1977 के इमरजेंसी के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम से कर सकते हैं जब इस वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की करारी पराजय के बाद कांग्रेसियों ने इमरजेंसी काल में हुई ज्यादतियों के लिए इन्दिरा जी के छोटे पुत्र स्वर्गीय संजय गांधी को जिम्मेदार माना था और स्वयं इन्दिरा जी को ही पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त कर दिया था। तब इन्दिरा जी ने फिर से अपनी अलग से कांग्रेस पार्टी गठित की थी और 1980 के चुनावों में विजय प्राप्त की थी। सवाल यह है कि क्या अपनी पार्टी में विद्रोह के बाद ममता दी में इतनी ताकत है कि वह फिर से अपनी पार्टी खड़ी कर सकें। इसका उत्तर हमें नकारात्मक इसलिए मिलता है क्योंकि ममता दी राजनीति में कोई विचारधारा लेकर नहीं चलीं, बल्कि वह सत्ता के विरुद्ध उपजे फौरी आक्रोश को भुनाने की गरज से सभी प्रकार की विकृतियों को स्वीकृति देती हुई चलीं जिसकी वजह से उनकी शासन पद्धति और उनसे पहले वामपंथियों की शासन पद्धित में भेद मिटता चला गया। अतः 1998 में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने जो अपनी अलग तृणमूल कांग्रेस पार्टी बनाई थी वह आज तिनके-तिनके हुई जा रही है और इस काम में उन्हीं के कल तक के साथी योगदान दे रहे हैं।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.