पश्चिम एशिया संकट दूर हो

Summary :

भारत यात्रा पर आये अमेरिकी विदेश मन्त्री मार्को रूबियो के इस कथन से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि फारस की खाड़ी के समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान का बन्धक मार्ग बना कर नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि यह एक अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री रास्ता है । मगर अमेरिका व इजराइल के ईरान के विरुद्ध चलते युद्ध के बीच ईरान इसे एक चुंगी नाके में बदलना चाहता है और इस मार्ग से गुजरने वाले माल वाहक जहाजों से चुंगी वसूलना चाहता है। श्री रूबियो का भारतीय विदेश मन्त्री एस. जय शंकर के साथ एक संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस में दिया गया यह…

भारत यात्रा पर आये अमेरिकी विदेश मन्त्री मार्को रूबियो के इस कथन से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि फारस की खाड़ी के समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान का बन्धक मार्ग बना कर नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि यह एक अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री रास्ता है । मगर अमेरिका व इजराइल के ईरान के विरुद्ध चलते युद्ध के बीच ईरान इसे एक चुंगी नाके में बदलना चाहता है और इस मार्ग से गुजरने वाले माल वाहक जहाजों से चुंगी वसूलना चाहता है। श्री रूबियो का भारतीय विदेश मन्त्री एस. जय शंकर के साथ एक संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस में दिया गया यह जवाब पूरी तरह अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप ही कहा जायेगा कि यदि ईरान को ऐसा करने दिया गया तो इससे विश्व के अन्य जल मार्गों पर भी अनियमितताएं पैदा होने का संकट गहरा सकता है और गलत परंपरा शुरू हो सकती है।

जहां तक भारत का सवाल है तो इसने श्री मार्को रूबियो के इस मत से सहमति जताई है और जलडमरूमध्य को निर्बाध रूप से खुला रखने की वकालत की है। मगर इसके साथ हमें यह भी देखना होगा कि पश्चिम एशिया युद्ध को शुरू हुए अब लगभग तीन महीने का समय पूरा होने जा रहा है और दोनों ही पक्षों के बीच तनातनी बनी हुई है। भारत हमेशा से इस मत का रहा है कि विश्व की किसी भी समस्या का हल केवल कूटनीतिक संवाद के रास्ते से ही खोजा जाना चाहिए क्योंकि युद्ध से किसी समस्या का हल नहीं होता है, बल्कि युद्ध अपने साथ अन्य विभिन्न प्रकार के संकटों को लेकर आता है।

इस मामले में अमेरिका व ईरान के बीच बारास्ता पाकिस्तान में जो कूटनीतिक वार्ताएं हो रही हैं उनका सुखद परिणाम भी अभी तक सामने नहीं आया है परन्तु इस मोर्चे पर कुछ प्रगति के आसार जरूर नजर आ रहे हैं क्योंकि अब 60 दिन के युद्ध विराम की चर्चा चल रही है। इस युद्ध के चलते विश्व के विभिन्न देशों की अर्थ व्यवस्था पर जिस प्रकार का विपरीत असर पड़ रहा है उससे दुनिया के आधे से अधिक भाग के समक्ष ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है और पेट्रोल व डीजल तथा ईंधन गैस के दाम आसमान की तरफ भागने लगे हैं। युद्ध ने पूरे पश्चिम एशिया के क्षेत्रीय स्थायित्व को ही संकट में नहीं डाला है अपितु इसका असर वैश्विक शक्ति सन्तुलन पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है।

इस बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पिछले दिनों की गई चीन यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन को ईरान का हिमायती माना जाता है लेकिन अब लगता है कि ईरान व अमेरिका दोनों ही युद्ध से आजिज आ चुके हैं और कोई शान्तिपूर्ण मार्ग खोज रहे हैं। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि श्री ट्रम्प की युद्ध नीति का उनके अपने देश अमेरिका में ही व्यापक विरोध हो रहा है और दूसरी ओर ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है। अतः दोनों पक्षों की ओर से ही समझौता प्रस्तावों का विनिमय हो रहा है मगर दोनों पक्ष इस बात पर भी अड़े हुए हैं कि समझौते के बाद दोनों को अपने-अपने देश की जनता के समक्ष सिर नीचे करके खड़ा न होना पड़े। इसी वजह से अभी तक के सभी समझौता प्रस्तावों पर मतैक्य कायम नहीं हो सका है।

इस बीच इस खबर का आना कि 60 दिन के युद्ध विराम के प्रस्ताव पर दोनों पक्ष लगभग सहमत हैं , सुखदायी घटना मानी जा सकती है। इस समझौते में सबसे प्रमुख होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग को पूर्व की भांति खोलने का प्रस्ताव है मगर इस मार्ग के आगे अमेरिका ने भी प्रतिरोध लगा दिया है जिसकी वजह से अन्तर्राष्ट्रीय जलमार्ग अवरुद्ध हो रहा है इसलिए अब इन दोनों ही प्रतिरोधों को दूर करना पड़ेगा। इस प्रस्तावित समझौते के बारे में अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान ने परमाणु अस्त्रों के स्तर के संवर्धित यूरेनियम भंडार को छोड़ने का मन बना लिया है मगर ईरान ने फिलहाल इसका खंडन भी कर दिया है। फिर भी इससे यह उम्मीद तो बंध ही रही है कि संवर्धित ईरानी यूरेनियम के मसले पर दोनों पक्षों के बीच किसी सहमति पर पहुंचने के प्रयास किये जा रहे हैं।

ऐसा तो ईरान के पक्ष से ही स्पष्ट है कि उसकी परमाणु हथियार विकसित करने की कोई योजना है, इसकी पुष्टि भी अमेरिकी गुप्तचर विभाग की प्रमुख श्रीमती तुलसी गाबार्ड ने पिछले महीने ही की थी। इस समझौता प्रस्ताव के अनुसार 60 दिनों के युद्ध विराम की अवधि के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग को निर्बाध तरीके से पहले की भांति खोला जायेगा और ईरान को स्वतन्त्र रूप से अपना पेट्रोलियम तेल बेचने की अनुमति होगी। इसके साथ ईरान जलडमरूमध्य मार्ग में बिछाई गई बारूदी जल सुरंगों को हटायेगा जो उसने युद्ध शुरू होने के बाद अपने क्षेत्र की जल सीमा में बिछाई थीं। दूसरी तरफ अमेरिका ईरानी बन्दरगाहों पर लगाये गये अवरोधक प्रतिबन्धों को समाप्त करेगा। जाहिर है कि वर्तमान परिस्थितियों में अमेरिका ने ईरानी बन्दरगाहों से उसके तेल के परिवहन को मुश्किल बना कर रखा हुआ है।

इस प्रस्ताव के प्रावधानों से स्पष्ट है कि दोनों पक्ष लचीला रुख अपनाना चाहते हैं, मगर सार्वजनिक रूप से इसके परिणामों में अपनी विजय भी परिलक्षित दिखाना चाहते हैं। ऐसे वातावरण में विश्व के उन देशों को भी आगे आना चाहिए जो पश्चिम एशिया में शान्ति के पक्षधर हैं और खुद पश्चिम एशियाई देशों को भी समझौता कराने में उत्प्रेरक की भूमिका निभानी चाहिए क्योंकि युद्ध से उनकी हानि भी जबर्दस्त तरीके से हुई है। जहां तक श्री ट्रम्प की यह जिद है कि ईरान अपना संवर्धित यूरेनियम उनके हवाले कर दे तो यह मांग उचित नहीं कही जा सकती, क्योंकि ईरान एक सर्वसत्ता सम्पन्न संप्रभु राष्ट्र है, हां उसे परमाणु कार्यक्रम को रद्द करने का आश्वासन तो देना ही पड़ेगा। भारत की अर्थव्यवस्था पर पश्चिम एशिया संकट का जो दुष्प्रभाव पड़ रहा है उसकी वजह से घरेलू स्तर पर महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है। इसलिए जरूरी है कि यह संकट जल्दी से जल्दी दूर हो।

Aditya Chopra

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