लाइक्स-व्यूज और साइबर क्राइम की दुनिया….

Summary :

डिजिटल युग में आज की तारीख में हर कोई सक्रिय है। मोबाइल पर व्हाट्सएप्प, फेसबुक, (नया नाम मेटा), इंस्टाग्राम, रील मेकिंग, चैटिंग, वीडियो इंटरनेट सब कुछ उपलब्ध है। देश में 60 करोड़ लोग इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। हर तरफ लाइक्स और व्यूज लेने की होड़ सी मची हुई है। इनका मिस यूज भी हो रहा है, लिहाजा दिन-प्रतिदिन साइबर क्राइम भी बढ़ रहा है, जिसे रोकना जरूरी है। यह सच है कि सोशल मीडिया ने आम नागरिक को अपनी बात रखने का ऐसा मंच दिया है जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले तक नहीं की जा सकती थी। आज लाखों…

डिजिटल युग में आज की तारीख में हर कोई सक्रिय है। मोबाइल पर व्हाट्सएप्प, फेसबुक, (नया नाम मेटा), इंस्टाग्राम, रील मेकिंग, चैटिंग, वीडियो इंटरनेट सब कुछ उपलब्ध है। देश में 60 करोड़ लोग इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। हर तरफ लाइक्स और व्यूज लेने की होड़ सी मची हुई है। इनका मिस यूज भी हो रहा है, लिहाजा दिन-प्रतिदिन साइबर क्राइम भी बढ़ रहा है, जिसे रोकना जरूरी है। यह सच है कि सोशल मीडिया ने आम नागरिक को अपनी बात रखने का ऐसा मंच दिया है जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले तक नहीं की जा सकती थी। आज लाखों लोग विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूज़रनेम के माध्यम से अपनी पहचान बनाते हैं। कई बार यही यूज़रनेम वास्तविक नाम के बजाय नकली पहचान, फर्जी प्रोफाइल या भ्रामक पहचान का माध्यम बन जाता है। इसी कारण सरकार समय-समय पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर यूज़रनेम और पहचान संबंधी नियमों को लेकर सख्त रुख अपनाने की बात करती रही है। सरकार का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि साइबर अपराध, धोखाधड़ी, फर्जी प्रचार और समाज विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाना है। आज की तारीख में सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति कुछ ही मिनटों में नया अकाउंट बनाकर किसी भी नाम से सक्रिय हो सकता है। कई बार लोग किसी प्रसिद्ध व्यक्ति, सरकारी अधिकारी, पत्रकार या संस्था के नाम से मिलता-जुलता यूज़रनेम बनाकर लोगों को भ्रमित करते हैं। इससे फर्जी खबरें तेजी से फैलती हैं और आम जनता गलत जानकारी का शिकार हो जाती है।
इसके अलावा नकली पहचान के माध्यम से साइबर ठगी, ऑनलाइन ब्लैकमेल, महिलाओं को परेशान करना, धार्मिक या जातीय तनाव फैलाना और अफवाहें फैलाना भी आसान हो जाता है। ऐसे मामलों में अपराधी की पहचान करना जांच एजेंसियों के लिए कठिन हो सकता है, विशेषकर जब कई फर्जी अकाउंट बनाए गए हों। इसलिए सरकार का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है जितनी वास्तविक जीवन में होती है। यदि किसी यूज़रनेम का उपयोग अपराध, धोखाधड़ी या हिंसा भड़काने के लिए किया जाता है तो संबंधित व्यक्ति तक पहुंचना संभव होना चाहिए। इस कड़ी में मेटा को नोटिस भी सरकार ने दिए हैं। आज का युवा सोशल मीडिया पर वायरल होने की दौड़ में लगा हुआ है। मोबाइल फोन और आसान वीडियो एडिटिंग एप्स ने लगभग हर व्यक्ति को कंटेंट क्रिएटर बनने का अवसर दिया है। रील्स, शॉर्ट वीडियो और सिनेमाई एडिट बनाना एक नया ट्रेंड बन गया है। कई युवा अपनी पढ़ाई, परिवार और स्वास्थ्य की अनदेखी कर घंटों सोशल मीडिया पर बिताने लगे हैं। कुछ लोग खतरनाक स्टंट, झूठे दावे, भ्रामक समाचार या दूसरों की निजी सामग्री का उपयोग करके लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास करते हैं। इससे व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
जमाना तकनीक का है और इसी आधुनिक तकनीक से वीडियो और फोटो को इस प्रकार संपादित किया जा सकता है कि वास्तविकता और कृत्रिम सामग्री में अंतर करना कठिन हो जाए। किसी व्यक्ति के बयान को काट-छांटकर अलग अर्थ देना, फोटो के साथ छेड़छाड़ करना या संदर्भ बदलकर प्रस्तुत करना लोगों को भ्रमित कर सकता है। ऐसी सामग्री से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुक्सान पहुंच सकता है, सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और कई बार कानून-व्यवस्था की स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। यह भी सच है कि आज अनेक युवा सोशल मीडिया के माध्यम से अपना व्यवसाय चला रहे हैं, ऑनलाइन शिक्षा दे रहे हैं, कला और संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। रोजगार के नए अवसर भी प्राप्त कर रहे हैं लेकिन चौंकने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग भी बढ़ रहा है। फर्जी समाचार और अफवाहें फैलाना, साइबर ठगी और ऑनलाइन धोखाधड़ी, महिलाओं और बच्चों का ऑनलाइन उत्पीड़न, नकली निवेश योजनाओं का प्रचार, धार्मिक या सामाजिक तनाव बढ़ाने वाली सामग्री, फर्जी पहचान बनाकर लोगों को गुमराह करना, निजी जानकारी चुराकर ब्लैकमेल करना, परीक्षा, नौकरी या सरकारी योजनाओं के नाम पर धोखाधड़ी के मामले इस कदर बढ़े हैं कि साइबर क्राइम की एक अलग दुनिया बन चुकी है।
मेरा यह मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की भी जिम्मेदारी है कि वे फर्जी अकाउंट, स्पैम, साइबर बुलिंग और कानून-विरुद्ध सामग्री के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई करें। शिकायत निवारण प्रणाली सरल और तेज होनी चाहिए ताकि प्रभावित व्यक्ति समय पर सहायता प्राप्त कर सके। मेरा मानना है कि सोशल मीडिया आधुनिक भारत की एक महत्वपूर्ण शक्ति है। इसका उपयोग समाज को जोड़ने, शिक्षा फैलाने और आर्थिक अवसर बढ़ाने के लिए किया जा सकता है, लेकिन इसका दुरुपयोग समाज में भ्रम, तनाव और अपराध को भी बढ़ा सकता है। यूज़रनेम जैसी सुविधाओं का उद्देश्य पहचान बनाना है, न कि किसी को धोखा देना या कानून से बचना। इसलिए सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों, परिवार, विद्यालय और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है कि डिजिटल माध्यमों का उपयोग जिम्मेदारी, सत्यनिष्ठा और कानून के सम्मान के साथ किया जाए। युवाओं को सारे मामले में ईमानदारी से तकनीक का प्रयोग करना होगा। माता-पिता भी नजर रखे तो साइबर क्राइम का शिकार होने से भी बचा जा सकता है। सबके साझा प्रयासों से ही डिजिटल युग में सुरक्षा संभव है। इस दिशा में विभिन्न कम्पनियां चाहे वो मेटा, टेलीग्राफ या अश्लील कंटेट परोसने वाले कोई भी एप्प हो, सरकार का शिकंजा कसने का एक्शन स्वागत योग्य है।

Kiran Chopra