जनवरी और फ़रवरी 2026 हाल के भारतीय आर्थिक इतिहास के सबसे रोमांचक महीनों में गिने जाएंगे। एक ही रात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐतिहासिक व्यापारिक सफलता हासिल की। अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर लगने वाला टैरिफ लगभग 50 प्रतिशत से घटाकर सीधे 18 प्रतिशत कर दिया और यह फैसला तुरंत प्रभाव से लागू हो गया। दोनों वैश्विक नेताओं के बीच हुई एक सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण फोन बातचीत के बाद यह निर्णायक कदम उठाया गया। इस फैसले ने भारत और अमेरिका दोनों की अर्थव्यवस्था, बाजारों और राष्ट्रीय मनोबल में नई ऊर्जा और जबरदस्त आशा की लहर दौड़ा दी है।
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच मौजूद व्यक्तिगत तालमेल ही इस ऐतिहासिक फैसले की असली वजह बना। इसके साथ ही दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच जनता से जनता और लोकतंत्र से लोकतंत्र तक का गहरा रिश्ता इसकी मजबूत नींव था। राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर सराहना करते हुए उन्हें “मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक” और “एक शक्तिशाली व सम्मानित नेता” बताया और इस नतीजे का श्रेय अपनी दोस्ती को दिया, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने भी राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए 1.4 अरब भारतीयों की ओर से उन्हें धन्यवाद दिया। दोनों नेताओं के आपसी सम्मान, विनम्रता, साझा दृष्टि और निर्णायक नेतृत्व ने तमाम दूरियों को पाटने का काम किया।
इस फैसले का आर्थिक प्रभाव दूरगामी और परिवर्तनकारी है। अमेरिका भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजारों में से एक है और पहले लगने वाले ऊंचे टैरिफ से श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे वस्त्र, परिधान, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन, दवाइयां और ऑटो कंपोनेंट्स की प्रतिस्पर्धात्मकता को नुक्सान पहुंच सकता था। यह अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी अतिरिक्त बोझ जैसा था। अब टैरिफ अनुकूल होने के साथ भारतीय वस्तुएं और भारतीय निर्यातक फिर से बेहतर कीमत तय करने, नए ऑर्डर हासिल करने और मुनाफे का विस्तार करने की स्थिति में हैं।
इसका सबसे बड़ा लाभ उन एमएसएमई इकाइयों को मिलेगा जो भारत के निर्यात इंजन की रीढ़ हैं। यह ‘मेक इन इंडिया’ के लिए एक बड़ा और निर्णायक प्रोत्साहन है। शेयर बाज़ारों ने इस फैसले का ज़ोरदार स्वागत किया है। 3 फ़रवरी को भारतीय शेयर बाज़ार ऐतिहासिक तेज़ी के साथ खुले, जो इस समझौते से मिली राहत और उत्साह को साफ़ तौर पर दर्शाता है। बीएसई सेंसेक्स लगभग 3,656 अंकों (करीब 4.5 प्रतिशत) की छलांग लगाकर करीब 85,323 के स्तर पर खुला, वहीं निफ्टी 50 शुरुआती कारोबार में 1,200 अंकों से ज़्यादा (लगभग 5 प्रतिशत) उछलकर 26,300 के पार पहुँच गया।
सुबह 10:15 बजे तक भी बाज़ार मज़बूती से हरे निशान में बने रहे सेंसेक्स 2,300–2,500 अंकों की बढ़त बनाए हुए था और निफ्टी आराम से 25,800–26,000 के ऊपर कारोबार कर रहा था।
लगभग सभी सैक्टरों में ज़बरदस्त ख़रीदारी देखने को मिली, ख़ासकर निर्यात और विनिर्माण से जुड़े शेयरों में जो निवेशकों के भरोसे और उत्साह को साफ़ तौर पर दिखाता है। यह उछाल हाल के वर्षों की सबसे मज़बूत एकदिनी शुरूआतों में से एक है और इस समझौते की विकास क्षमता पर बाज़ार का सीधा विश्वास है। यह ऐतिहासिक सफलता बीते कुछ वर्षों में भारत की मज़बूत होती व्यापार-कूटनीति का शिखर है। मोदी सरकार ने एक सक्रिय और दूरदर्शी एजेंडा अपनाते हुए, राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए और रणनीतिक फैसलों को मज़बूत बनाते हुए कई बड़े और प्रभावशाली व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिए या आगे बढ़ाए हैं।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, भारत अब तक 37 विकसित देशों को कवर करने वाले 8 मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) कर चुका है। भारत–ईएफटीए टीईपीए (स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन) अक्तूबर 2025 से प्रभावी, जिसमें लगभग 100 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता। भारत-यूके सीईटीए-जुलाई 2025 में हस्ताक्षरित जिससे द्विपक्षीय व्यापार में सालाना 34 अरब डॉलर की वृद्धि की उम्मीद। भारत-ओमान सीईटीए दिसंबर 2025 में अंतिम रूप जिससे भारत के लगभग 98 प्रतिशत निर्यात को ड्यूटी-फ्री पहुंच।
भारत-न्यूज़ीलैंड एफटीए-दिसंबर 2025 में सम्पन्न।
भारत–यूरोपीय संघ एफटीए- जनवरी 2026 में सम्पन्न जिससे 27 देशों के लगभग 24 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त जीडीपी वाले बाज़ार तक तरजीही पहुंच मिली। ये सभी समझौते अमेरिका के साथ हुई इस बड़ी प्रगति के साथ मिलकर भारत के लिए नए बाज़ार खोलते हैं, रोज़गार पैदा करने वाले निवेश को आकर्षित करते हैं और भारत को एक भरोसेमंद वैश्विक साझेदार के रूप में स्थापित करते हैं। यह भी साफ़ संदेश देता है कि चाहे कुछ आदतन नकारात्मक लोग कुछ भी कहें-भारतीय अर्थव्यवस्था “डेड” नहीं है, बल्कि पूरी तरह ज़िंदा है और तेज़ी से आगे बढ़ रही है।
यह एक वैश्विक विकास इंजन है। नकारात्मकता के नवाब, निराशावाद के व्यापारी और संशय के झंडाबरदार शोर मचाते रहेंगे लेकिन भारत की जनता उन्हें लगातार नज़रअंदाज़ कर रही है। असल में यह समझौता निराशावाद पर आशावाद की जीत है। यह दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों (भारत और अमेरिका) के रिश्तों की मज़बूती को दोहराता है, दोनों देशों के नागरिकों के लिए समृद्धि के नए रास्ते खोलता है और निष्पक्ष व्यापार, नवाचार व वैश्विक स्थिरता के साझा लक्ष्यों को नई गति देता है। भारत के निर्यातकों, कामगारों और उद्यमियों के लिए यह एक बेहद बड़ा अवसर है।























