अमेरिका द्वारा भारत पर लगी हुई ऊंची 50 प्रतिशत शुल्क दर घटाकर 18 प्रतिशत कर दिये जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था में चहुंओर लहलहाट आने की अपेक्षा जागृत हो गई है। लगभग पिछले 11 महीने से भारत व अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर वार्ता चल रही थी मगर बीच-बीच में वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता के चलते इसमें व्यवधान पैदा हो रहे थे जिसकी वजह से वार्ता के कई दौर होने के बाद भी अमेरिका शुल्क दरें कम करने के लिए राजी नहीं हो रहा था, उल्टे इसने विगत वर्ष के सितम्बर महीने में रूस से कच्चा तेल खरीदने के नाम पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क दर लागू कर दी थी।
पहले प्रतिस्पर्धी शुल्क दर 25 प्रतिशत थी जो इसके बाद बढ़कर 50 प्रतिशत हो गई थी। मगर विगत रात्रि लगभग 11 बजे अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की कि भारत व अमेरिका में व्यापार समझौता हो गया है जिसमें प्रतिस्पर्धी शुल्क दर को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके कुछ समय बाद ट्रम्प ने यह भी घोषणा की कि भारत रूस से तेल न खरीदने और अमेरिका व वेनेजुएला से इसे खरीदने के लिए सहमत हो गया है अतः अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क दर भी समाप्त की जाती है। श्री ट्रम्प ने कल रात ही प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी से फोन पर बात भी की। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की घोषणा तब की गई है जब भारत में वित्त वर्ष 2026-27 का बजट एक दिन पहले ही वित्त मन्त्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने प्रस्तुत किया था।
बजट में भारतीय अर्थव्यवस्था के आधारभूत आर्थिक मानकों को मजबूत बनाने के साथ ही देश के हर क्षेत्र में स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक उत्पादन बढ़ाने की पुख्ता व्यवस्था की गई थी। अब अमेरिका के साथ व्यापार समझौता होने के बाद भारत की उत्पादन गतिविधियों में भारी उछाल आने की संभावना पैदा हो गई है जिससे वार्षिक स्तर पर विकास वृद्धि दर को भी पंख लगने की उम्मीद पैदा हो गई है। भारत अमेरिका को भारी मात्रा में निर्यात करता है और व्यापार खाता इसके पक्ष में रहता है। समझौते के बाद भारत का अमेरिका को निर्बाध निर्यात फिर से चालू हो जायेगा जिससे अर्थव्यवस्था पर चहुंओर सकारात्मक असर पड़ेगा।
सबसे बड़ा असर भारत की मुद्रा रुपये की कीमत पर होने की संभावना है। दोनों देशों के बीच पिछले 11 महीने से बनी असमंजस की स्थिति के चलते डाॅलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर लगातार नीचे जा रही थी और पिछले छह महीने से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश लगातार घट रहा था। विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में अपने शेयरों को बेच रहे थे और संस्थागत निवेश भी घट रहा था।
विगत सितम्बर महीने से लेकर अब तक विदेशी निवेशक लगभग 12 अरब डाॅलर की धनराशि भारतीय बाजारों से निकाल चुके थे मगर अब इसके उल्टी दिशा में घूमने के आसार पैदा होंगे और भारतीय बाजार में विदेशी निवेश में फिर से डाॅलर की प्रचूरता आयोगी। सबसे ज्यादा असर रुपये की कीमत पर पड़ने की उम्मीद है।
फिलहाल डाॅलर 92 रुपये के आसपास घूम रहा है। विदेशी निवेशकों के भारत में विश्वास बढ़ने की वजह से विदेशी मुद्रा डाॅलर की आवक पुनः सुधरेगी जिससे रुपये की कीमत में बढ़ाैतरी होगी। आर्थिक पंडितों की राय में समझौते की घोषणा यूरोपीय संघ से वाणिज्य समझौता होने के बाद की गई है। इससे भारतीय उत्पादकों को भारी लाभ पहुंचेगा क्योंकि भारतीय उत्पादों की पहुंच अब यूरोप के 27 देशों तक बढ़ने के साथ ही फिर से अमेरिकी बाजारों में बेरोकटोक बढ़ जायेगी। इस प्रकार भारत दोहरे लाभ में चलने लगेगा और इसकी अर्थव्यवस्था नये आयामों को छुएगी। पिछले 11 महीने से भारत-अमेरिका के आपसी सम्बन्ध भी खासे ऊपर-नीचे हो रहे थे।
इसकी मुख्य वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का रवैया ही था। मगर भारत ने इस मौके पर पूरी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का प्रदर्शन किया और डोनाल्ड ट्रम्प के बड़बोलेपन का जवाब नहीं दिया तथा अपना ध्यान सम्बन्धों की मधुरता को कायम रखने पर ही दिया। श्री ट्रम्प ने पिछले वर्ष भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सैनिक संघर्ष को समाप्त कराने का श्रेय भी लेने का प्रयास किया और कई बार कहा कि दोनों देशों के बीच युद्ध विराम उन्हीं के प्रयासों से हुआ मगर भारत के प्रधानमन्त्री ने संसद में केवल इतना कहकर ही धुंध छांटने का काम किया कि पाकिस्तान के मामले में उनकी किसी भी विदेशी नेता से कोई बात नहीं है।
भारत की इस नीति का हालांकि घरेलू मोर्चे पर विरोधी दलों की ओर से भारी विरोध हुआ मगर अन्ततः प्रधानमन्त्री मोदी की यही दूरदर्शिता काम आयी और अमेरिका ने वह फौरी कदम वापस लिया जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच कड़वाहट पैदा होनी शुरू हुई थी। भारत ने श्री ट्रम्प के इस बयान पर अभी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है कि वह रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदेगा और वह इसकी भरपाई वेनेजुएला से तेल खरीद करके करेगा परन्तु इतना जरूर समझा जा रहा है कि पिछले सप्ताह वेनेजुएला की कार्यकारी राष्ट्रपति से श्री मोदी की फोन पर जो बात हुई थी उसमें दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार सम्बन्धों के मजबूत बनाने की सहमति हुई है।
इससे भी यही सिद्ध होता है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर चल रहा है तथा हर मोर्चे पर सन्तुलन बनाते हुए चलना चाहता है। अब अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हो जाने के बाद भारत पूरे वैश्विक आर्थिक मामलों के केन्द्र में आ गया है और यूरोप से लेकर अमेरिका के बाजार इसके उत्पादकों के लिए खुल चुके हैं। इसके साथ ही यह समझौता करके अमेरिका ने यह इशारा भी कर दिया है कि वह एशिया में चीन के मुकाबले भारत को कम महत्व नहीं देता है।
चीन पर अमेरिका की शुल्क दरें 37 प्रतिशत रहेंगी जबकि ब्रिक्स के अन्य देशों में शामिल ब्राजील पर यह दर 50 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका पर 30 प्रतिशत रहेगी। भारत भी ब्रिक्स संगठन का सदस्य है मगर इस पर शुल्क दर सबसे कम 18 प्रतिशत रहेगी। इससे पता चलता है कि डोनाल्ड ट्रम्प भारत के साथ अपने देश के सम्बन्धों को अलग तराजू में रखकर देखते हैं।





















