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हेली के मुकाबले ट्रम्प को बढ़त

अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में दिलचस्प मोड़ आते जा रहे हैं। दुनियाभर की नजरें इस पर लगी हुई हैं। साउथ कैरोलिना में हुए रिपब्लिकन प्राइमरी चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी प्रतिद्वंद्वी भारतवंशी निक्की हेली को हराकर राष्ट्रपति चुनाव में अपनी दावेदारी मजबूत कर ली है। आपराधिक आरोपों के बावजूद ट्रम्प को यहां बहुत बड़ी बढ़त हासिल हुई। साउथ कैरोलाइना निक्की हेली का गृह राज्य है। वह दो बार यहां की गवर्नर भी रही। गृह राज्य में हार से निक्की हेली को झटका जरूर लगा है लेकिन वह अभी भी न उम्मीद नहीं हुई। अब तक हुए सभी पांच मुकाबलों आयोवा, न्यूहैमशायर, नेवादा, यूएस वर्जिन आइलैंड्स और साउथ कैरोलाइना में ट्रम्प ने अपना दबदबा कायम रखा है। यद्य​पि निक्की हेली 5 मार्च को 15 राज्यों में रिपब्लिकन प्राइमरी चुनावों के लिए अपना प्रचार करने निकल पड़ी हैं लेकिन इस बात की संभावना कम ही है कि वह ट्रम्प को पछाड़ पाएंगी। हेली लगातार ट्रम्प पर तीखे हमले कर रही हैं और उसने ट्रम्प की मानसिक हालत पर भी सवाल उठाए हैं। पहले आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे ट्रम्प की उम्मीदवारी पर आशंकाएं जताई जा रही थी कि वह चुनाव लड़ सकेंगे या नहीं लेकिन आपराधिक मामलों का फिलहाल कोई असर ट्रम्प पर दिखाई नहीं दे रहा।
रिपब्लिकन पार्टी के इतिहास में कभी किसी महिला उम्मीदवार ने प्रेसीडैंशियल प्राइमरी नहीं जीती है। यह पार्टी रूढ़िवादी कट्टर दक्षिणपंथी और श्वेत नस्ल की समर्थक मानी जाती है। निक्की हेली मूल रूप से भारतवंशी है और अश्वेत भी है। ​निक्की हेली को भारत-अमेरिका संबंधों का सबसे बड़ा पेरोकार माना जाता है। अमेरिका की राजनीति में दो पार्टियों का ही दबदबा रहा है। हाथी के निशान वाली रिपब्लिकन और गधे के ​निशान वाली डेमोक्रेटिक पार्टी। निक्की हेली का डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी में रहकर उन्हें ही टक्कर देना दिलचस्प है। निकी हेली अमेरिका की पैसा बांटों वर्चस्व बढ़ाओ योजना की आलोचक रही हैं और वह हमेशा विदेश नीति को बदलने का दावा करती आई हैं। निक्की हेली का इतिहास जाने साल 1969 में पंजाब से अजित और राज रंधावा अमेरिका के साउथ कैरोलाइना पहुंचे। 1972 में रंधावा दंपति के घर एक बच्ची पैदा हुई। नाम रखा, निमरत निक्की रंधावा, निक्की की पूरी पढ़ाई-लिखाई साउथ कैरोलाइना में ही हुई। तब तक उनके घरवालों ने कपड़ों का बिजनेस शुरू कर लिया था। ये बिजनेस चल निकला। निक्की पढ़ाई के साथ-साथ फैमिली बिजनेस में भी हाथ बंटाती थी। 1996 में उन्होंने माइकल हेली से शादी की। शादी के बाद निमरत निक्की रंधावा ने निक्की हेली नाम अपना लिया।
क्विक फैक्ट : उनका मिडिल नेम ज्यादा चर्चा में रहा। लोग उन्हें निक्की नाम से पहचानते थे। ये नाम आगे चलकर उनके लिए परेशानी का सबब भी बना। दरअसल, 2018 में सोशल मीडिया पर चर्चा चली कि उन्होंने ‘वाइट अमेरिका’ में आगे बढ़ने के लिए अपना असली नाम छिपाया। उस समय उन्हें बाकायदा सफाई देनी पड़ी थी। बताना पड़ा कि बर्थ सर्टिफिकेट पर उनका नाम निक्की ही है। उन्होंने माइकल हेली से शादी की है इसीलिए निक्की हेली।
साल 2004 में निक्की पहली बार अमेरिका की लोकसभा ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ की मेंबर बनीं। लगातार तीन बरस तक सदन में दाखिल हुई। फिर 2010 में उन्होंने साउथ कैरोलाइना के गवर्नर का चुनाव जीता। 2014 में वो दूसरी बार गवर्नर बनीं। 2016 में उनका नाम अमेरिका की नेशनल पॉलिटिक्स में चर्चा में आया। उस बरस राष्ट्रपति चुनाव होने वाले थे।
हेली ट्रम्प के नस्लभेदी बयानों का खुलकर विरोध करती थी। हालांकि ट्रम्प राष्ट्रपति बन गए। इसके बावजूद ट्रम्प ने हेली को अपनी टीम में जगह दी और उसे संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का राजदूत नियुक्त किया। रिपब्लिकन पार्टी में होने के बावजूद हेली ने कोरोना के दौरान अराजकता और कैपिटल हिल दंगों पर ट्रम्प को बार-बार लताड़ा ​था। हेली फिलहाल लड़ाई नहीं छोड़ रही। वह बार-बार बयान दे रही हैं कि अधिकतर अमेरिकी डोनाल्ड ट्रम्प और राष्ट्रपति जो बाइडेन दोनों को अस्वीकार करते हैं। किसी भी दावेदार को पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए 1215 डेलीगेट के समर्थन की जरूरत होती है। अब तक हेली ने 17 और ट्रम्प को 92 डेलीगेट का समर्थन प्राप्त हो चुका है। सर्वेक्षणों में भी ट्रम्प को बढ़त दिखाई जा रही है। ट्रम्प दरअसल अपने समर्थकों को यह समझाने में कामयाब रहे हैं कि उन्हें राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया जा रहा है। अब तक चुनाव हारा हुआ राष्ट्रपति धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से गायब हो जाता था और उसकी आभा फीकी पड़ती जाती थी। ट्रम्प ऐसे पूर्व राष्ट्रपति हैं जो पिछला चुनाव हार जाने के बावजूद जबर्दस्त राजनीतिक वापसी कर चुके हैं। मानों उनका दामन पूरी तरह पाक साफ हो गया है। ऐसे आसार दिख रहे हैं कि रिपब्लिकन पार्टी की ओर से ट्रम्प ही बाइडेन को चुनौती देंगे। मुकाबला दिलचस्प होगा क्योंकि पहले से ही गोलबंद अमेरिकी समाज में ध्रुवीकरण अब तेजी से हो रहा है।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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