लोकतन्त्र में द्विदलीय प्रणाली

Summary :

वर्तमान राजनीतिक दौर में जिस प्रकार विभिन्न क्षेत्रीय दल टूट कर बिखर रहे हैं उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि देश की समूची सामाजिक, राजनीतिक चेतना में आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है और आर्थिक मोर्चे पर पूरा भारत एकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है जिससे क्षेत्रीय दलों की राजनीति धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है क्योंकि विभिन्न विकासोन्मुख नीतियों का केन्द्रीकरण होता जा रहा है। यह परिस्थिति उन हालात से पूरी तरह अलग है जो स्वतन्त्रता के बाद थीं। अंग्रेज जो भारत छोड़ कर गये थे वह विभिन्न क्षेत्रीय अंचलों में बंटा हुआ था, जिसमें कहीं रजवाड़े…

वर्तमान राजनीतिक दौर में जिस प्रकार विभिन्न क्षेत्रीय दल टूट कर बिखर रहे हैं उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि देश की समूची सामाजिक, राजनीतिक चेतना में आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है और आर्थिक मोर्चे पर पूरा भारत एकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है जिससे क्षेत्रीय दलों की राजनीति धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है क्योंकि विभिन्न विकासोन्मुख नीतियों का केन्द्रीकरण होता जा रहा है। यह परिस्थिति उन हालात से पूरी तरह अलग है जो स्वतन्त्रता के बाद थीं। अंग्रेज जो भारत छोड़ कर गये थे वह विभिन्न क्षेत्रीय अंचलों में बंटा हुआ था, जिसमें कहीं रजवाड़े राज करते थे तो कहीं ब्रिटिश सरकार की रेजीडेंसियों की हुकूमत थी। पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने का काम सरदार वल्लभभाई पटेल ने आजादी मिलने से पहले ही कर दिया था। फिर भी कुछ इलाके स्वतन्त्र रह गये थे जिनमें मुख्य रूप से हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर व भोपाल रियासतें थीं। इसकी वजह यह थी कि अंग्रेज आजादी देते समय देशी रियासतों को यह अधिकार देकर गये थे कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में से किसी एक मुल्क में अपना विलय कर लें और चाहें तो स्वतन्त्र रहें। इतने बदहाल भारत को सरदार पटेल ने एक सूत्र में पिरोया था।
यही भारत 26 जनवरी, 1950 को गणतन्त्र बना और इसके प्रत्येक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के एक वोट का अधिकार मिला और 1952 में इस देश में पहले आम चुनाव हुए, परन्तु तब तक विभिन्न अंचलों में बंटे हुए भारत में बाकायदा राज्यों का गठन नहीं हुआ था। यह कार्य 1956 में जाकर पूरा हुआ और भारत में कुल 15 राज्यों का भाषाई आधार पर गठन हुआ। मगर हैरानी करने वाली बात यह थी कि 1952 के चुनावों से पहले भारत में तीन सौ से भी ज्यादा राजनीतिक दलों का पंजीकरण हो चुका था। इससे पता चलता है कि आजाद भारत में किस तरह आंचलिक व क्षेत्रीय दलों ने वहां के लोगों में स्थानीय अपेक्षाओं को बढ़ा रखा था। मगर 15 राज्यों के गठन के बाद 1957 के चुनावों में इसमें कमी आयी फिर भी विभिन्न राज्यों के कुछ आंचलिक क्षेत्रों में छोटे-छोटे दलों का प्रभाव बना रहा परन्तु जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते रहे वैसे-वैसे ही क्षेत्रीय आकांक्षाएं भारत की राष्ट्रीय सरकारों की तरफ से भी पूरी होने लगीं और औद्योगिक विकास का तेजी से विकेन्द्रीकरण भी होने लगा। जिसने राजनीति के चरित्र को भी बदलने का काम किया और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का राष्ट्रीय आकांक्षाओं में समन्वीकरण होता चला गया जिसने क्षेत्रीय दलों को कमजोर भी करना शुरू किया परन्तु भारत इतनी विविधताओं वाला देश है कि इसके हर 20 किलोमीटर पर बोली बदल जाती है और पानी भी बदल जाता है अतः सांस्कृतिक आधार पर आंचलिक क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपनी जमीन तलाशने लगे किन्तु यह प्रक्रिया बहुत लम्बी नहीं चल सकी क्योंकि 1962 के बाद से उत्तर भारत में हिन्दू संस्कृति की ताकत के आधार पर विपक्ष की पार्टी भारतीय जनसंघ ने जनमानस में अपनी पैठ बढ़ानी शुरू की जिसके चलते 1967 के चुनावों में यह पार्टी उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में शक्तिशाली बनकर उभरी और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली व पंजाब जैसे राज्यों में इसका दबदबा बनना शुरू हुआ।
जनसंघ के बढ़ते प्रभाव ने क्षेत्रीय दलों को कमजोर करना शुरू किया और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस व स्वतन्त्र पार्टी और संयुक्त सोशलिसट पार्टी के साथ इसका विस्तार तेजी के साथ हुआ। इसके बाद का इतिहास स्व. इन्दिरा गांधी की कांग्रेस की समाजवादी नीतियों की विजय से लेकर इमरजेंसी लगाने और विपक्षी दलों को मिलाकर जनता पार्टी के गठन व उसके विघटन का इतिहास है और फिर जनता पार्टी के बिखरने का भी इतिहास है जिससे जनसंघ के नये नामकरण भारतीय जनता पार्टी की शुरूआत होती है लेकिन इसके बाद का इतिहास 1984 में इन्दिरा जी की हत्या के बाद कांग्रेस को मिले अभूतपूर्व लोकसभाई बहुमत के बाद 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने का है और इसके बाद जातिगत आधार व सामाजिक सामुदायिक समीकरणों के आधार पर नये क्षेत्रीय दलों के गठन का इतिहास है। परन्तु लोकतन्त्र का चरित्र राजनीतिक बदलाव का भी होता है जो समकालीन सामाजिक समीकरणों पर भी निर्भर करता है। अतः हमने देखा किस प्रकार 1996 के आते-आते अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन के चलते अधिसंख्य हिन्दू समाज ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को ऊपर रखते हुए भारतीय जनता पार्टी को पूरे देश में लोकसभा की सर्वाधिक सीटें जीतने वाली पार्टी बना दिया। मगर जातिगत आधार पर और क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर बने दलों ने भी अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए साम्प्रदायिक आधार पर सामाजिक समीकरण वोटों की खातिर गढ़ने शुरू किये और प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को खोखला करना शुरू किया। इसकी वजह से एेसे क्षेत्रीय दलों को अपने-अपने राज्यों में सफलता भी मिली। परन्तु ये क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में सुशासन देने में असफल रहे और अपने सामाजिक समीकरणों के आधार पर अपने वोटबैंक का ही तुष्टीकरण करते रहे जिसकी वजह से राष्ट्रीय विकास के क्रम में इनका हिस्सा गिरता रहा और आम जनता की निगाह में ये कबायली राजनीति करने वाले माने जाने लगे।
भारत के आर्थिक रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ जाने का कारण एेसे दलों के पास सुनिश्चित व सर्वग्राह्य आर्थिक नीतियों का अभाव खटकने लगा जिसका तोड़ इन्होंने वोटबैंक के तुष्टीकरण को बनाया। अतः वर्तमान समय में जब सत्ता के स्थायीकरण का दौर शुरू हुआ तो भारतीय जनता पार्टी ने विभिन्न प्रदेशों में इनका स्थान अपनी राष्ट्रीय एकीकरण की नीतियों की वजह से लेना शुरू किया। यही वजह है कि बिहार से लेकर हरियाणा व प. बंगाल तक में इस पार्टी की वहां हुए विधानसभा चुनावों में भारी जीत हुई है और क्षेत्रीय दल हाशिये पर चले गये हैं। मगर लोकतन्त्र में विपक्ष का स्थान भी खाली नहीं रह सकता है अतः हम देख रहे हैं कि धीरे-धीरे कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय दलों द्वारा खाली किये गये स्थान को भरने की कोशिश कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में हमने देखा कि किस प्रकार कांग्रेस पार्टी को 99 सीटें मिलीं। इसका एक मतलब यह भी है कि क्षेत्रीय दलों के पास कभी भी कोई राष्ट्रीय विमर्श नहीं रहता। अतः भारत की भविष्य की राजनीति साफ इशारा कर रही है कि आने वाले समय में इस देश में भी अन्य लोकतान्त्रिक देशों की भांति दो पार्टी प्रणाली विकसित हो सकती है। इस दिशा में एक ही समय में सभी प्रादेशिक व राष्ट्रीय चुनावों का एक साथ होना भी महत्वपूर्ण होगा, जिससे भारत का लोकतन्त्र और परिपक्व होगा।

Aditya Chopra

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