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मध्य प्रदेश में भी समान नागरिक संहिता

आजादी के पश्चात् देश में कई सरकारें आईं लेकिन वह समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने से परहेज करती रही।

आजादी के पश्चात्  देश में कई सरकारें आईं लेकिन वह समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने से परहेज करती रही। बार-बार यही कहा गया कि अभी उचित समय नहीं आया। समान नागरिक संहिता भारतीय जनता पार्टी के चुनावी एजैंडे में हमेशा से ही रहा है। राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता भाजपा के तीन मुख्य एजैंडे रहे हैं। अब अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण जारी है। जम्मू-कश्मीर  से अनुच्छेद 370 को हटाया जा चुका है। अब समान नागरिक संहिता ही ऐसा मुद्दा है जिसे लागू किया जाना बाकी है। अभी तक देश में केवल एक राज्य गोवा में समान नागरिक संहिता लागू है। वर्ष 1961 में गोवा सरकार समान नागरिक संहिता के साथ बनी थी। अब भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। भारत में इसे लागू करने की जरूरत 1985 की एक याचिका श्रीमती जॉर्डन डेगे बनाम एसएस चोपड़ा मामले से हुई थी। श्रीमती जॉर्डन ईसाई थीं जबकि एसएस चोपड़ा सिख। इनके तलाक की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता लागू करने की पहली बार जरूरत जाहिर की थी। इसके बाद ऐसी ही कई याचिकाएं अदालतों में आईं और काफी चर्चित हुईं। 
अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने समान नागरिक संहिता की वकालत करते हुए राज्य में इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए एक समिति बनाने की घोषणा की है। उनका कहना है कि भारत में अब समय आ गया है कि एक समान नागरिक संहिता लागू की जाए। कोई व्यक्ति एक से ज्यादा शादी क्यों करे, एक देश में दो विधान क्यों चलें, यह एक ही होना चाहिए। इससे पहले गुजरात, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, असम और उत्तराखंड की भाजपा सरकारें भी समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा कर चुकी हैं। केन्द्र सरकार तीन तलाक जैसे विवादित मुद्दे को पहले ही खत्म कर चुकी है। समान नागरिक संहिता में देश के प्रत्येक नागरिक के लिए  एक समान कानून होता है चाहे वह ​िकसी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता का अर्थ धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर पूरे देश में एक समान कानून लागू करने से है। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक, जमीन-जायदाद के बंटवारे और  उत्तराधिकार गोद लेने जैसे सामाजिक मुद्दे सभी एक कानून के अन्तर्गत आ जाते हैं। किसी धर्म के आधार पर कोई अलग कोर्ट या अलग व्यवस्था नहीं होती लेकिन भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां सभी धर्मों के लिए अलग-अलग नियम हैं। सम्पत्ति, विवाह, तलाक के नियम हिन्दुओं, मुस्लिमों, ईसाइयों के लिए अलग-अलग हैं। यह सवाल बार-बार उठा है कि जब अापराधिक मामलों में सभी समुदायों के लिए एक कानून का पालन होता है तब सिविल मामलों में सभी के लिए  अलग-अलग कानून क्यों है? कानूनों में बदलाव होते रहे हैं। अगर हिन्दू बिल नहीं लाया जाता तो न दहेज विरोधी कानून पास हो पाता और न ही सती प्रथा जैसी कुरीति का अंत हो पाता।
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। संविधान बनाते समय ही इसका जिक्र कानून में कर दिया गया था। संविधान में यूनिफार्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता की चर्चा अनुच्छेद 44 में की गई है। राज्य के नीति-निर्देशक तत्व से संबंधित इस अनुच्छेद में कहा गया है कि राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। समान नागरिक संहिता के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे समाज में एकरूपता लाने में मदद मिलेगी। समान नागरिक संहिता लागू हो जाने से विवाह, गोद लेने की व्यवस्था, तलाक के बाद महिलाओं को उचित भरण-पोषण देने में समानता लाई जा सकेगी। संविधान के अनुच्छेद 44 में नागरिक संहिता की चर्चा की गई है। इससे साफ है कि संविधान निर्माता यह चाहते थे कि देश में यूनिफार्म सिविल कोड लागू हो। संविधान में मूल अधिकारों में वि​धि के शासन की अवधारणा विद्यमान है, लेकिन इन्हीं अवधारणाओं के बीच लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियां भी व्याप्त हैं। विधि के शासन के अनुसार सभी नागरिकों हेतु एक समान विधि होनी चाहिए, लेकिन समान नागरिक संहिता का लागू न होना एक प्रकार से विधि के शासन और संविधान की प्रस्तावना का उल्लंघन है।
जब भी इस मुद्दे पर आगे बढ़ा जाता है तो मुस्लिम समुदाय इसके विरोध में उतर आता है। जमकर राजनीति की जाती है और तर्क दिया जाता है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन करता है। जिसमें कहा गया है कि संविधान ने देश के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि इस कानून को लागू किया जाए। गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस कानून की जमकर वकालत करते हुए कहा है कि अब इसे लागू करने का वक्त आ गया है। परिवार उत्तराधिकार के विषय संविधान की समवर्ती सूची में आता है। इसलिए राज्य सरकारों को भी यह अधिकार प्राप्त है कि वे अपने राज्यों के नागरिकों के लिए एक समान कानून बना सकती है। वर्तमान में मौजूद सभी व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक पक्षपात की समस्या है। समान नागरिक संहिता महिलाऔ और धार्मिक अल्पसंख्यकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगी साथ ही इसकी एकरूपता से देश में राष्ट्रवादी भावना को बल मिलेगा। इसलिए समान नागरिक संहिता को लागू किया जाना बहुत जरूरी है। उससे कई विवाद अपने आप हल हो जाएंगे। इसके लागू होने से नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता, पूजा, इबादत, खानपान और धार्मिक परम्पराओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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