मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता

Summary :

मध्य प्रदेश विधानसभा ने समान नागरिक संहिता विधेयक को मंजूरी दे दी है। इस तरह उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद समान नागरिक संहिता लागू करने वाला मध्य प्रदेश चौथा राज्य बन गया है। अब राज्य में राम से लेकर रहीम तक सभी के लिए एक समान कानून लागू होगा और तुष्टिकरण और पर्सनल लॉ के युग का अंत होगा। इस विधेयक के जरिये अब कोई भी व्यक्ति पहली पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरा विवाह नहीं कर पाएगा। तीन तलाक और निकाह हलाला को पूरी तरह से गैर कानूनी और दंडनीय बना दिया गया है। तलाक केवल कोर्ट…

मध्य प्रदेश विधानसभा ने समान नागरिक संहिता विधेयक को मंजूरी दे दी है। इस तरह उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद समान नागरिक संहिता लागू करने वाला मध्य प्रदेश चौथा राज्य बन गया है। अब राज्य में राम से लेकर रहीम तक सभी के लिए एक समान कानून लागू होगा और तुष्टिकरण और पर्सनल लॉ के युग का अंत होगा। इस विधेयक के जरिये अब कोई भी व्यक्ति पहली पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरा विवाह नहीं कर पाएगा। तीन तलाक और निकाह हलाला को पूरी तरह से गैर कानूनी और दंडनीय बना दिया गया है। तलाक केवल कोर्ट के जरिये ही मान्य होगा। लिव-इन में रह रहे जोड़ों को एक माह के भीतर रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण कराना होगा। विधेयक को राज्यपाल के जरिये राष्ट्रपति की मंजूरी के​ लिए भेजा जाएगा। कानून लागू होने के बाद शादी का रजिस्ट्रेशन, नौकरी के रिकार्ड और सम्पत्ति से जुड़े कई नियम बदल जाएंगे। समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किए जाने से मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा किया गया वादा भी पूरा हो गया। भारतीय जनता पार्टी के जनसंघ काल से ही तीन चुनावी मुद्दे रहे। इनमें श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 आैर समान नागरिक संहिता। राम मंदिर का निर्माण हो चुुका है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किया जा चुका है।
केन्द्र की मोदी सरकार ने ट्रिपल तलाक को भी खत्म कर दिया है। अब भाजपा शासित राज्य एक के बाद एक समान नागरिक संहिता कानून लागू करने की ओर अग्रसर हैं। समान नागरिक संहिता (यूनिवर्सल सि​िवल कोड) का मुद्दा कोई नया नहीं है। आजादी के बाद से ही इसको लेकर विवाद होते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत पर जोर दिया है। 1835 में ब्रिटिश शासन के दौरान पहली बार भारतीय कानूनों में एकरूपता लाने का विचार सामने आया था। अंग्रेजों ने आपरा​िधक और प्रशासनिक कानूनों में तो एकरूपता स्थापित की लेकिन विवाह उत्तराधिकार और धार्मिक मामलों को समुदायों के पर्सनल लॉ के अधीन रखा। शाह बानो से लेकर सायरा बानो तक के मामलों के बाद भी समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग उठी थी लेकिन तत्कालीन केन्द्र की सरकारों ने मुस्लिम वोट बैंक की खातिर कोई कदम आगे नहीं बढ़ाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता में आते ही समान नागरिक संहिता को राजनीति नहीं राष्ट्र नीति का विषय बताया था और कहा था कि जब एक घर दो कानून से नहीं चल सकता तो एक देश कैसे चल सकता है।
समान नागरिक संहिता का अर्थ है, देश के हर नागरिक पर एक समान कानून लागू होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो। अभी देश में अलग-अलग मजहबों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं, लेकिन समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद सभी मजहबों के लोगों को एक जैसे कानून का पालन करना पड़ेगा। हमारे देश में अभी धर्म और परंपरा के नाम पर अलग-अलग नियमों को लागू करने की छूट है, लेकिन यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेने और संपत्ति के बंटवारे जैसे विषयों में सभी नागरिकों के लिए नियम एक-समान होंगे। वैसे इसके लागू होने से नागरिकों के खानपान, पूजा-इबादत, वेशभूषा आदि धार्मिक परंपराओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुस्लिम समाज पुरजोर विरोध करता रहा है। जब 1951 में डाॅ. बी.आर. अंबेडकर और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू समाज के लिए हिंदू कोड बिल लाने की कोशिश की थी, तब भी उसके खिलाफ आवाजें थीं। साथ ही केवल एक धर्म विशेष के लिए ऐसा कानून लाने पर सवाल भी उठाए गए थे। यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करने वालों का तर्क है कि इसके द्वारा सभी धर्मों पर हिंदू कानून लागू कर दिया जाएगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे अपने अधिकारों का हनन और धार्मिक परंपराओं पर हमला बताया।
संविधान के अनुच्छेद 44 में देश के सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून बनाने की बात की गई है। सरकार से अपेक्षा की गई है कि वह पंथ, क्षेत्र और भाषा से संबंधित बंटवारा करने वाले आधारों की परवाह किए बिना सभी के ​िलए एक जैसा कानून बनाए लेकिन इस पवित्र मंशा को हऊवा बना दिया गया। एक समान कानून लागू करने की पहल तो मोदी सरकार के शासन में ही हुई। हालांकि समय-समय पर संविधान निर्माताओं और सुप्रीम कोर्ट ने यह महसूस किया कि मुस्लिम महिलाओं के तलाक आैर भरण-पोषण से जुड़े मुद्दों का संबंध पूजा पद्धति से नहीं बल्कि इसका संबंध इंसानियत से है। इसलिए मुस्लिम महिलाओं से भी इंसाफ होना चाहिए। मध्य प्रदेश के यूसीसी विधेयक में लैंगिक समानता को प्रमुख आधार माना गया है। सम्पत्ति, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और पारिवारिक अधिकारों से जुड़े मामलों में महिलाओं काे समान कानूनी दर्जा देने की दिशा में प्रावधान किए गए हैं। गुजरात और उत्तराखंड की ही तरह मध्य प्रदेश में भी आदिवासी समाज को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। क्योंकि उनकी परम्पराएं बहुत अलग हैं। एक समान कानून लागू करने के लिए मध्य प्रदेश की पहल सराहनीय है।

Aditya Chopra

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