पाकिस्तान समय-समय पर दावा करता है कि वहां स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारे और सिख धार्मिक यादगार पूरी तरह सुरक्षित हैं तथा वहां सिख समुदाय को अपने धार्मिक स्थलों के दर्शन और पूजा-अर्चना की पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान स्वयं को सिख विरासत का संरक्षक बताने का प्रयास करता है। लेकिन हकीकत में अनेक ऐसे प्रश्न सामने आते हैं जिनका उत्तर पाकिस्तान के पास नहीं है। सिख इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी परंतु अपनी आस्था और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। इन्हीं महान विभूतियों में शहीद भाई तारु सिंह जी का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने जबरन धर्म परिवर्तन स्वीकार करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। परिणामस्वरूप मुगल अत्याचारियों ने उनकी खोपड़ी सिर से अलग कर दी, बावजूद इसके भाई तारु सिंह जी अपनी सिक्खी पर अडिग रहे। उनका बलिदान आज भी धार्मिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का अद्वितीय प्रतीक माना जाता है। इसी प्रकार शहीद भाई मनी सिंह जी ने भी धर्म और सत्य की रक्षा के लिए अपना रोम रोम कटवा लिया परन्तु अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
यही कारण है कि इन शहीदों से जुड़े स्मारकों और ऐतिहासिक स्थलों का महत्व पूरी दुनिया के सिख समुदाय के लिए अत्यंत भावनात्मक और आध्यात्मिक है किंतु अनेक वर्षों से यह आरोप सामने आते रहे हैं कि पाकिस्तान में कुछ ऐसे ऐतिहासिक स्थलों तक श्रद्धालुओं की नियमित और स्वतंत्र पहुंच नहीं है। विभिन्न रिपोर्टों और सिख संगठनों द्वारा समय-समय पर यह भी चिंता व्यक्त की गई है कि कुछ स्थानों पर अवैध कब्जों, स्थानीय विवादों अथवा प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण श्रद्धालुओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि किसी पवित्र स्थल तक श्रद्धालु स्वतंत्र रूप से पहुंच ही न सकें, तो केवल संरक्षण के दावे अपने आप में पर्याप्त नहीं माने जा सकते। यदि पाकिस्तान वास्तव में सिख विरासत का संरक्षक होने का दावा करता है, तो उसे केवल चुनिंदा गुरुद्वारों का सौंदर्यीकरण कर अंतर्राष्ट्रीय प्रचार करने के बजाय उन सभी ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा, पुनर्स्थापना और निर्बाध धार्मिक पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए। भाई तारु सिंह जी, भाई मनी सिंह जी और अन्य अनेक शहीदों का बलिदान इसी सत्य का प्रमाण है। इसलिए उनकी स्मृतियों से जुड़े प्रत्येक ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण केवल एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है।
क्या दिल्ली भाजपा में लौट रहा है पंजाबी नेतृत्व का स्वर्णकाल
दिल्ली भाजपा की नई प्रदेश टीम में 4 से अधिक पंजाबी और सिख नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है। दिल्ली की राजनीति में पंजाबी समाज का प्रभाव लंबे समय से निर्णायक रहा है। मगर काफी समय तक भाजपा ने पंजािबयों की अनदेखी की जिसका खामियाजा पार्टी को सत्ता से दूर रहकर भुगतना पड़ा। जिसके बाद पार्टी ने अपनी सोच में बदलाव करते हुए दिल्ली की कमान वीरेन्द्र सचदेवा के रूप में देकर पंजाबियों को गौरवांवित किया और उसके बाद से दिल्ली में भाजपा ने सभी चुनावों में न सिर्फ शानदार प्रदर्शन किया, बल्कि लम्बे अंतराल के बाद दिल्ली मंे फिर से कमल खिल उठा। उसी सोच को आगे बढ़ाते हुए शायद अब कमान फिर से पंजाबी समुदाय को देते हर्ष मल्होत्रा की नियुक्ति के साथ प्रदेश टीम में अनेक पंजाबियों को स्थान दिया गया है।
यदि भाजपा वास्तव में इस समाज के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत करना चाहती है, तो यही रणनीति संगठन के निचले स्तर तक भी दिखाई देनी चाहिए। इससे न केवल दिल्ली में संगठन मजबूत होगा बल्कि पंजाब विधानसभा चुनावों में भी पार्टी को राजनीतिक लाभ मिल सकता है। शायद इसी क्रम में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का चेयरमैन पंजाब के नेता हरजीत सिंह ग्रेवाल को बनाया गया। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग और पंजाबी अकादमी उपाध्यक्ष के रिक्त पदों को जल्द भरने की सूचना मिल रही है। हो सकता है इस बार आयोग का चेयरमैन मुस्लिम के बजाए जैन या किसी अन्य समाज से लिया जाए। वहीं पंजाबी अकादमी के उपाध्यक्ष की नियुक्ति भी जल्द की जा सकती है। भाजपा में प्रमुख चेहरे हैं जिन्हें जिम्मेवारी मिल सकती है जिसमें सरदार कुलवंत सिंह बाठ का नाम सबसे ऊपर है जो लंबे समय तक दिल्ली भाजपा में वरिष्ठ उपाध्यक्ष और सक्रिय संगठनकर्ता रहे हैं तथा पंजाब की राजनीति में भी उनकी भूमिका सक्रिय रही है। उनकी पत्नी को भी पार्टी ने पार्षद बनाया था।
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी में भी बतौर वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेवारी संभाल चुके हैं। पंजाब जैनकों के चेयरमैन भी रहे। इसी प्रकार इम्प्रीत सिंह बख्शी संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके हैं, जंगपुरा विधानसभा से विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के निकट सहयोगियों में माने जाते हैं, इसलिए हो सकता है कि पार्टी उन्हें जिम्मेवारी सौंपे। वहीं तेजिंदर सिंह बग्गा भी वर्षों से पार्टी के लिए सक्रिय रहे हैं और हरि नगर विधानसभा से चुनाव लड़ चुके हैं। इनके अलावा भी कई ऐसे सिख चेहरे हैं जो संगठन और सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं। देखना होगा कि भाजपा नेतृत्व इन लंबित नियुक्तियों में किस पर भरोसा जताता है।
मानवाधिकारों की चेतना से ही सशक्त होगा भारत
लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि ऐसे नागरिकों से सशक्त बनता है जो अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझते हों। संविधान प्रत्येक नागरिक को अनेक मौलिक अधिकार प्रदान करता है, लेकिन इन अधिकारों का वास्तविक महत्व तभी है जब समाज में उनके प्रति जागरूकता हो और उनका सम्मान किया जाए। यही कारण है कि विद्यालयों में मानवाधिकार और संवैधानिक मूल्यों पर संवाद आज समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन चुका है। गुरु नानक पब्लिक स्कूल राजौरी गार्डन के प्रबन्धकों ने ‘‘मानवाधिकार लोकतंत्र की आधारशिला’’ विषय पर प्रभावशाली सेमिनार करवाकर उसमें दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को आमंत्रित किया।
स्कूल के मैनेजर जगजीत मानते हैं कि आज समाज में बढ़ती असहिष्णुता, साइबर अपराध, भेदभाव और सामाजिक तनाव जैसी चुनौतियों के बीच मानवाधिकारों पर संवाद पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि कानून केवल दंड देने का माध्यम नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा का आधार भी है। आने वाली पीढ़ी को यदि संविधान की भावना, न्याय के सिद्धांत और मानवाधिकारों के मूल्यों से जोड़ा जाए तो यह केवल व्यक्तियों का नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र का भविष्य मजबूत करेगा।
पाकिस्तानियों के सिक्खी प्रेम दावों की असल हकीकत
Summary :
पाकिस्तान समय-समय पर दावा करता है कि वहां स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारे और सिख धार्मिक यादगार पूरी तरह सुरक्षित हैं तथा वहां सिख समुदाय को अपने धार्मिक स्थलों के दर्शन और पूजा-अर्चना की पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान स्वयं को सिख विरासत का संरक्षक बताने का प्रयास करता है। लेकिन हकीकत में अनेक ऐसे प्रश्न सामने आते हैं जिनका उत्तर पाकिस्तान के पास नहीं है। सिख इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी परंतु अपनी आस्था और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। इन्हीं महान विभूतियों में शहीद भाई तारु सिंह जी…


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