महात्मा गांधी जिन्होंने अनशन को प्रसिद्ध किया था, ने इसके बारे बताया था कि यह कोई सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है, यह आध्यात्मिक और नैतिक अहिंसक हथियार है। उनका प्रयास अन्याय को पराजित करने के लिए विरोधी की अंतरात्मा को जगाना है। आज़ादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी जी ने17-18 बड़े उपवास रखे थे और कई कम अवधि के उपवास थे। उनका सबसे प्रसिद्ध अनशन आज़ादी के बाद कोलकाता में था। हिन्दू-मुसलमान दंगों को रोकने के लिए उन्होंने 1 सितम्बर 1947 को वहां अपना अनशन शुरू कर दिया था। अगले ही दिन से दोनों तरफ़ के दंगाइयों ने उनके पैरों पर अपने-अपने हथियार रखने शुरू कर दिए। तीसरे दिन महात्मा गांधी जी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया था। इस पर लार्ड माउंटबेटन ने कहा था, “जो काम (दंगे रोकना) पंजाब में मेरे50000 सैनिक नहीं कर सके,वह एक निहत्थे व्यक्ति ने कर दिखाया”।
इस देश ने सदैव उन लोगों की इज्जत की है जो निःस्वार्थ दूसरों के लिए अपना बलिदान देने के लिए तैयार हैं। जयप्रकाश नारायण ने भी गांधी जी की तरह अवज्ञा आंदोलन चलाया था। 59 वर्षीय सोनम वांगचुक न गांधी हैं और न ही जयप्रकाश नारायण,पर बड़ी देर के बाद उन्होंने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया है, क्योंकि वह भी दूसरों के लिए कष्ट सह रहे हैं। उनका मज़ाक़ में कहना था कि ‘अगर मैं मर गया तो भूत बन कर वापिस आऊंगा”! हम नहीं चाहते कि सोनम वांगचुक “भूत बन कर” लौटें। उन जैसे लोगों की देश को बहुत जरूरत है।
सोनम वांगचुक, उनका अनशन, जन्तर-मंतर पर प्रदर्शन, संसद की तरफ़ मार्च और युवाओं पर बर्बर लाठीचार्ज देश और विदेश में चर्चा का विषय बन चुका है। लंदन में भी भारतीय छात्र प्रदर्शन कर चुके हैं। बेहतर होता कि धर्मेन्द्र प्रधान खुद लाल बहादुर शास्त्री की तरह इस्तीफ़ा दे देते । सी-वोटर सर्वेक्षण के अनुसार 66% देशवासी चाहते हैं कि धर्मेन्द्र प्रधान को नीट पेपर लीक और सीबीएसई विवाद के कारण इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। इससे एकदम तो शिक्षा व्यवस्था सही नहीं होगी, पर यह संदेश तो छाएगा कि नेतृत्व लोगों की शिकायतों के प्रति संवेदनशील है।
नीट पेपर लीक के बाद12 से अधिक युवा आत्महत्या कर चुके हैं। धर्मेन्द्र प्रधान को हटाने के लिए सरकार को मजबूर नहीं किया जा सकता लेकिन युवाओं का संघर्ष उनकी समस्याओं को सैंटर स्टेज पर लाने में सफल रहा है। सोनम वांगचुक का योगदान बहुत है। गांधी जी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने वांगचुक के बारे सही कहा है कि “लम्बे समय के बाद उन्होंने समाज की चेतना को जगाया है”। उनकी इस गांधीवादी क्रिया में एक और सुखद संदेश भी छिपा है कि हम सब कुछ खो नहीं बैठे। रोज़ दलबदल करते नेताओं से अलग देश में अभी भी सोनम वांगचुक जैसे लोगों मौजूद हैं जो दूसरों के लिए जान देने को तैयार हैं।
अनुमान है कि देश की जनसंख्या का 22% , 18-29 आयु के बीच है। इस यूथ में बहुत हताशा है। पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन तो मात्र लक्षण है, समस्या बहुत गहरी है। हमारी शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है और आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत बड़ी समस्या है। पर हमारा सारा ध्यान सांसदों को तोड़ने पर लगा हुआ है। लोग देख रहे हैं कि वह किसी एक पार्टी के लिए वोट देते हैं, पर लालच या दबाव में उनके प्रतिनिधि विपक्ष से जाकर मिल जाते हैं। इससे राजनीति के प्रति निराशावाद बढ़ रहा है। ऐसा प्रभाव मिलता है कि जैसे राजनीति देश को एक तरफ़ छोड़ कर अपनी ही अलग दिशा में भटक रही है। चुनावी राजनीति पर ही प्रश्न चिन्ह लग रहा है। हम पांचवीं या छठी अर्थव्यवस्था हैं, पर हमारा विकास बराबर नौकरियां पैदा नहीं कर रहा। हम जॉब-लैस ग्रोथ देख रहे हैं। प्रति व्यक्ति आय में हम नम्बर 140 पर हैं। यही भी कारण है कि इतने पढ़े-लिखे युवा जंतर-मंतर पर इकट्ठा हैं।
अफ़सोस की बात है कि यह सरकार सीधे संवाद करने में विश्वास नहीं रखती। एक तरफ़ा संवाद होता है। किसान आंदोलन के दौरान भी राजहठ देखने को मिला था। परिणाम हुआ कि आख़िर में क़ानून वापिस लेने पड़े। इसी तरह जो युवा प्रदर्शन कर रहे हैं, से संवाद नहीं किया जा रहा। केवल मंत्री जेपी नड्डा से 10 मिनट की बातचीत हुई है। 1984 में लद्दाख की मांगों को लेकर सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांगयाल अनशन पर बैठ गए थे। अनशन के 16वें दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद दिल्ली से लेह गईं और उन्हें अनशन तोड़ने के लिए मनाने में सफल रहीं। उन्हें जूस पिलाया और स्थिति को सम्भाल लिया। यह नेतृत्व होता है जो हर बात को प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाता। अपने ही लोगों से संवाद करने से इज्जत कम नहीं होती। मुझे विश्वास है कि अगर अब भी सरकार आंदोलनकारियों से बात करे तो स्थिति को शांत किया जा सकता हैं। जो अप्रिय दृश्य हम संसद के नज़दीक देख कर हटे हैं, वह न देखने पड़ते। सरकारी संवेदनशीलता दिखाने की बहुत जरूरत है।
हमारे देश में जो सरकार का विरोध करता है उसे बदनाम करने का प्रयास किया जाता है। उसके ख़िलाफ़ मीडिया या सोशल मीडिया से अभियान चलाया जाता है। एंटी नेशनल करार दिया जाता है। जिस प्रकार जंतर-मंतर पर युवाओं ने जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है, को आयना दिखाया है उससे उनकी भी आंखें खुल जानी चाहिए। उन्हें भी अब सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि जनता सब कुछ देख रही है। यह भी समझ लेना चाहिए कि सोशल मीडिया के युग में कुछ नहीं छिपाया जा सकता। पर मैं राहुल गांधी और कांग्रेस के दूसरे नेताओं के प्रधानमंत्री निवास के बाहर हाई सिक्योरिटी ज़ोन पर धरना देने से सहमत नहीं हूं। पहले कांग्रेस का कॉकरोच जनता पार्टी के प्रति रवैया उदासीन था। उसे आप का अभियान समझा गया। लाठीचार्ज के बाद वह तेज हो गए जो विपक्षी काम भी है, पर प्रधानमंत्री निवास के बाहर धरना अनुचित था। एकदम जो फ़ोकस दिल्ली में सोमवार की घटनाओं पर था वह राहुल गांधी पर चला गया। सरकार को राहुल गांधी का धन्यवाद करना चाहिए।
संसद भवन के आसपास सोमवार के जो विजुअल देखने को मिल रहे हैं उनसे दिल दहल जाता है। युवाओं पर बुरी तरह से लाठीचार्ज किया गया। पीछे भाग-भाग कर पीटा गया। एक लड़की आईसीयू में है। अस्पतालों में दर्जनों युवा भर्ती किए गए हैं। बीबीसी की रिपोर्टर ने यह बताया है, “पुलिस से बचने के प्रयास में जब प्रदर्शनकारी दहशत में भाग रहे थे तो कई ज़मीन पर गिर गए… महिलाएं रो रही थीं … सोशल मीडिया ऐसे वीडियो से भरा हुआ है जहां पुलिस प्रदर्शनकारियों जिनमें महिलाएं भी थीं, को पीट रही थी और कई ज़मीन पर बेहोश पड़ी थीं”। प्रदर्शनकारियों की तरफ़ से भी पथराव किया गया है, पर इस लाठीचार्ज के बाद मामला और भड़क गया है। मामला पेपर लीक से आगे बढ़ गया है। अब तो यह मायने नहीं रखता कि किसने आंदोलन शुरू किया था या अब कौन नेतृत्व कर रहा है। कोई कर भी रहा या नहीं? मायने यह रखता है कि देश की राजधानी में देश का युवा अपनी बात कहने आया था, पर बात सुनने की जगह उस पर लाठी बरसाई गई। एक लोकतांत्रिक सरकार के शासन में ऐसा नही होना चाहिए। यह युवा जायज सवाल खड़े कर रहे हैं। अगर आप समझते हैं कि वह ग़लत है तो प्यार से समझाइए, लाठी से नहीं।
लेकिन जंतर-मंतर से जो युवा इकट्ठे हुए हैं, को देख कर आशा भी होती है। आशा इस बात से कि हमारे पास कितने प्रतिभाशाली युवा हैं। अभिजीत दीपके जो खुद अनशन पर बैठ गए हैं, बॉस्टन में पढ़ रहे हैं। तीन युवा जो भी अनशन पर बैठे हैं, नेहा, अमितोज और मनीष कुमार, तीनों पीएचडी स्कालर हैं। जंतर-मंतर पर ऐसे प्रतिभाशाली युवा भरे पड़े हैं। सब देश की हालत और अपने भविष्य को लेकर चिन्तित हैं। इस देश में तो सरकारी चपरासी की नौकरी के लिए एमबीए तक लाइन में लग जाते हैं। इसीलिए चिन्ता भी होती है कि इनका बनेगा क्या? इनके लिए अच्छी नौकरी कहां से आएगी? शिक्षा महंगी हो रही है। हर साल कोटा से आत्महत्या की दर्दनाक खबरें मिलती हैं। क्या इस पर संसद में राजनीति से ऊपर उठ कर सार्थक चर्चा होगी? क्या सरकार इस पर ऑल पार्टी मीटिंग बुलाएगी ताकि समाधान निकल सके और युवाओं को आभास हो कि कोई उनकी भी सुन रहा है?जब तक शिक्षा के क्षेत्र में सुधार नहीं होता देश सही प्रगति नहीं करेगा। शिक्षा पर हमारा निवेश दूसरे विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है। अमेरिका अपनी जीडीपी का 5.43%शिक्षा पर खर्च करता है जब कि हम केवल 4.12% ही खर्च करते हैं।
क्या युवाओं की आवाज सुनी जाएगी या यह उनकी पुकार अनसुनी कर दी जाएगी? हर बात वोटिंग और नम्बरों की नहीं होती। देखना यह है कि इससे आप बनाते क्या हो?जो आंदोलन शांतिमय था उस पर लाठीचार्ज किया गया,पत्थर बरसाए गए। संसद पर मार्च को रोक दिया गया, पर संसद का तो धर्म बनता है कि इस पर चर्चा करें क्योंकि जो प्रदर्शन कर रहे हैं, चाहे आप उनसे सहमत हों या असहमत, वह आख़िर में हमारे ही बच्चे हैं, अपना ही यूथ है।
अपने महाबल से सरकार के लिए इनके आंदोलन को असफल करना मुश्किल नहीं होगा, पर इसके पीछे जो भावना और बेचैनी है, वह कैसे ख़त्म होगी?
यह हमारे ही बच्चे हैं, अपना ही यूथ है
Summary :
महात्मा गांधी जिन्होंने अनशन को प्रसिद्ध किया था, ने इसके बारे बताया था कि यह कोई सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है, यह आध्यात्मिक और नैतिक अहिंसक हथियार है। उनका प्रयास अन्याय को पराजित करने के लिए विरोधी की अंतरात्मा को जगाना है। आज़ादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी जी ने17-18 बड़े उपवास रखे थे और कई कम अवधि के उपवास थे। उनका सबसे प्रसिद्ध अनशन आज़ादी के बाद कोलकाता में था। हिन्दू-मुसलमान दंगों को रोकने के लिए उन्होंने 1 सितम्बर 1947 को वहां अपना अनशन शुरू कर दिया था। अगले ही दिन से दोनों तरफ़ के दंगाइयों ने उनके…



Download Android App
Download iOS App



