पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका व इजराइल के बीच पिछले तीन महीनों से भी अधिक समय से चल रहे युद्ध के कारण जितना कुप्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है उतना शायद दुनिया के किसी अन्य देश की अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ा। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकता की आपूर्ति 85 प्रतिशत से भी अधिक खाड़ी के देशों से ही करता है और इन देशों में इसके एक करोड़ के लगभग नागरिक अपनी रोजी–रोटी चलाते हैं, जिसकी वजह से वे भारत में भारी विदेशी मुद्रा भेजते हैं। युद्ध के छिड़ जाने से जिस तरह से पश्चिम एशिया के खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को ईरान ने अपना निशाना बनाया उससे लगभग इन सभी देशों की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होने लगी, क्योंकि ये सभी देश कच्चे तेल का उत्पादन करने उसे दुनियाभर में सप्लाई करके अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाते हैं। विगत 28 फरवरी को युद्ध के शुरू होने के बाद ईरान ने अपने इलाके के होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग को अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक पोत परिवहन के लिए बन्द कर दिया जिसके परिणामस्वरूप पूरी दुनिया में खलबली मच गई और व्यापारिक माल सप्लाई की शृंखला अवरुद्ध हो गई, मगर लगता है कि तीन महीने बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को सद्बुद्धि आई और उन्होंने युद्ध को समाप्त करने की दिशा में बढ़ना शुरू किया।
बीते रविवार को उन्होंने अमेरिका व ईरान के बीच समझौता होने की घोषणा की और कहा कि इस समझौते पर आगामी 19 जून को जिनीवा में दोनों देशों के बीच हस्ताक्षर होंगे। इस समझौते के तहत आगामी 60 दिनों तक युद्धविराम पूर्ण रूप से लागू रहेगा। समझौते के बारे में कहा जा रहा है कि इसमें ईरान इस बात पर राजी हो गया है कि वह भविष्य में कभी परमाणु बम नहीं बनायेगा और यूरेनियम को हथियार श्रेणी तक के स्तर पर परिशोधित नहीं करेगा। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य का समुद्री मार्ग अंतर्राष्ट्रीय आवागमन के लिए खोल दिया जायेगा। बदले में ईरान पर लगे विभिन्न आर्थिक प्रतिबंध चरण बद्ध तरीके से समाप्त कर दिये जायेंगे और विदेशों में जमा उसकी सम्पत्ति पर उसके अधिकार को मान्यता दी जायेगी। ईरान पर पिछले 15 वर्षों से भी अधिक समय से अमेरिका ने विभिन्न आर्थिक प्रतिबन्ध लगा रखे हैं जिनके चलते ईरान का विश्व व्यापार में हिस्सा लगातार घटता जा रहा था और इसकी अर्थव्यवस्था नीचे की तरफ जा रही थी। ताजा युद्ध के चलते इस देश में महंगाई की दर 77 प्रतिशत हो चुकी है और इसकी मुद्रा रसातल में पहुंच चुकी है। इसके बावजूद ईरान अमेरिका जैसी विश्व शक्ति के आगे नहीं झुका और उसने युद्ध में उसका कड़ा मुकाबला किया, परन्तु युद्ध में उसका पूरा राष्ट्रीय आधारभूत ढांचा तहस-नहस हो चुका है, जिसकी भरपाई के लिए उसने तीन सौ अरब डालर की राशि की पुरजोर मांग की है, क्योंकि युद्ध ईरान ने अपनी तरफ से नहीं शुरू किया था, बल्कि यह अमेरिका व इजराइल ने उस पर थोपा था।
ईरान यह भी चाहता है कि इजराइल जिस तरह लेबनान देश पर आक्रमण कर रहा है वे भी पूरी तरह बन्द होने चाहिए, हालांकि यह कहा जा रहा है कि समझौते में लेबनान स्थित उग्रवादी संगठन हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइली आक्रमणों को भी बन्द करने की बात है मगर इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं बताई जा रही है, क्योंकि इस समझौते में इजराइल को पक्ष नहीं बनाया गया है, इसलिए सबसे बड़ा खतरा यह पैदा हो रहा है कि इजराइल इस समझौते को स्वीकार करेगा या नहीं। रविवार को समझौते की घोषणा होने के बाद जिस तरह की खबरें आ रही हैं उनके अनुसार इजराइल ने साफ कर दिया है कि वह एक स्वतन्त्र देश है। अतः इस समझौते को मानना उसकी मजबूरी नहीं है, जबकि अमेरिका उसकी मदद करने के लिए ही युद्ध में कूदा था और ट्रम्प ने कहा था कि उनका उद्देश्य ईरान की समूची शासन व्यवस्था को बदलने का है।
इस क्रम में युद्ध के शुरू होते ही ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की अमेरिकी-इजराइली आक्रमणों में हत्या भी कर दी गई थी। इसके साथ ही ईरान की सरकार के कई अन्य उच्च पदस्थ नेता भी मारे गये थे, मगर ईरान में किसी प्रकार का व्यवस्था परिवर्तन नहीं हुआ और मृत नेताओं के स्थान पर नये नेता बैठते गये। इसके बाद ट्रम्प ने कहना शुरू किया कि युद्ध का लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है, लेकिन इस मोर्चे पर ईरान पहले ही कह चुका था कि उसका हथियार बनाने का कोई इरादा नहीं है और वह परमाणु ऊर्जा का उपयोग शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही करना चाहता है। उसने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु अप्रसार सन्धि पर भी हस्ताक्षर किये हुए हैं। इससे पता चलता है कि अमेरिका का उद्देश्य ईरान के अपार तेल भंडारों पर कब्जा करना था, जिसमें वह इस देश के लोगों के संगठित विरोध की वजह से नाकामयाब रहा, क्योंकि ईरान ने अपनी प्रक्षेपास्त्रों की सैन्य शक्ति के बल पर ही अमेरिका व इजराइल को छकाने में सफलता प्राप्त की। इसके साथ ही रूस व चीन के साथ भी उसके सम्बन्ध प्रगाढ़ बने रहे और इनके परोक्ष भरोसे पर वह अमेरिका जैसी विश्व शक्ति से लगातार लोहा लेता रहा।
कहा जा रहा है कि अगले साठ दिनों के भीतर समझौते के बिन्दुओं की विस्तृत रूपरेखा तैयार की जायेगी, जिससे पश्चिम एशिया में स्थायी शान्ति कायम रह सके, मगर इसके लिए जरूरी है कि इजराइल को भी शान्ति के लिए मनाया जाए, क्योंकि समझौते की घोषणा होने के बाद इस देश के रक्षामन्त्री और प्रधानमन्त्री कह रहे हैं कि वे लेबनान में हथियाई गई जमीन नहीं छोड़ेंगे और सीरिया व फिलिस्तीन से अपनी सेनाओं को नहीं हटायेंगे, जबकि पश्चिम एशिया में स्थायी शान्ति के लिए क्षेत्र के सभी देशों के बीच सह अस्तित्व की भावना जगाना बहुत जरूरी है। भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान-अमेरिका समझौते का स्वागत करते हुए साफ किया है कि पश्चिम एशिया की शान्ति और स्थायित्व में ही वैश्विक भाईचारे का राज छिपा हुआ है, जहां तक जंग का सवाल है तो यह सिर्फ समस्याएं ही पैदा करती है समाधान तो बातचीत की मेज पर बैठकर ही निकलता है। उम्मीद करनी चाहिए कि इजराइल को भी सद्बुद्धि आयेगी और वह ट्रम्प द्वारा किये गये समझौते का पालन करेगा।
अमेरिका-ईरान समझौता !
Summary :
पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका व इजराइल के बीच पिछले तीन महीनों से भी अधिक समय से चल रहे युद्ध के कारण जितना कुप्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है उतना शायद दुनिया के किसी अन्य देश की अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ा। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकता की आपूर्ति 85 प्रतिशत से भी अधिक खाड़ी के देशों से ही करता है और इन देशों में इसके एक करोड़ के लगभग नागरिक अपनी रोजी–रोटी चलाते हैं, जिसकी वजह से वे भारत में भारी विदेशी मुद्रा भेजते हैं। युद्ध के छिड़ जाने से जिस तरह से…


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