खाद्य पदार्थों में मिलावट, नकली ब्रांड और घटिया गुणवत्ता के मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। मुनाफाखोरी और व्यापार की प्रतिस्पर्धा के कारण मिलावट का यह खेल बेधड़क चल रहा है। दाल, दूध, मावा, घी, मसाले, आटा, फल-सब्जियां सहित खाने-पीने की लगभग हर चीज में मिलावट है। वहीं, कंपनियों के उत्पाद भी गुणवत्ता के पैमाने पर खरे नहीं उतर रहे हैं। स्वास्थ्य व खाद्य विभाग में भ्रष्टाचार इतने चरम पर है कि वे मिलावटखोरी पर लगाम कसने में नाकाम नजर आ रहे हैं। इसका खामियाजा मिलावटी चीजों को खा रहे आमजन को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि इनमें मौजूद हानिकारक रसायन तरह-तरह की बीमारियों का कारण बन जाते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि खाद्य पदार्थों में मिलावट गंभीर समस्या हो गई है। इन मिलावटी खाद्य पदार्थों के प्रयोग से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। खाद्य पदार्थों में अवांछित पदार्थों की मिलावट के चलते इंसानों के शरीर में धीमा जहर पहुंच रहा है। मिलावटी पदार्थों से मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है तथा शरीर विभिन्न रोगों के प्रति सुग्राही हो जाता है। जीवन रक्षक दवा से लेकर खानपान में मिलावट की लगातार आने वाली खबरें विचलित करती हैं कि क्या खाएं और क्या न खाएं। संसद में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक, खाने का तेल, चॉकलेट-बिस्किट और खाने की दूसरी डिब्बा बंद चीजें नकली और डुप्लीकेट बनाई जा रही हैं। बाजार में बिक रहे खाने के सामान में मिलावट है या डुप्लीकेट बनाकर बेचा जा रहा है इसकी जांच सरकारी एजेंसी भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई करती है।
पिछले दिनों राजस्थान से अलीगढ़ लाया जा रहा सैकड़ों किलो घी बरामद हुआ। हापुड़ में करीब 22 लाख का नकली शहद पकड़ा गया। यूपी के बहराइच में नकली मसाले की फैक्ट्री पकड़ी गई। खाद्य विभाग की छापेमारी में 830 किग्रा हल्दी पाउडर, 400 किग्रा धनिया पाउडर, 93 किलो मिर्च पाउडर, धनिया भूसी 960 किग्रा व 65 किग्रा रंग बरामद किया। बीते दिनों जयपुर में गोल्यावास स्थित एक फर्म पर कार्रवाई कर 1300 किलो खाद्य सामग्री जब्त की गई। सोमनाथ में किडनी-लीवर को नुक्सान पहुंचाने वाला यूरिया, डिटर्जेंट व कास्टिक सोडा मिला तीन हजार लीटर दूध बरामद होने की खबरें मीडिया में तैरती रहीं।
अहम सवाल यह है कि आखिर लोभी मनुष्य के पतन की कोई सीमा भी है? चंद रुपयों के मुनाफे के लिये हम अपना दीन-ईमान बेचने के लिये कैसे तैयार हो जाते हैं? पहले लोगों में नैतिकता का भाव होता था। समाज में धारणा थी कि दूसरों के लिये कुआं खोदने वाला खुद के लिये खाई खोद रहा होता है। लेकिन आखिर समाज में ऐसा क्या हुआ कि लोगों में दुनिया की रचना करने वाले का भय व लोक कल्याण का भाव खत्म हो गया। हर दौर में अच्छे-बुरे लोग होते ही हैं। आज तो हर व्यक्ति मुनाफे से रातों-रात धनी हो जाना चाहता है,अब चाहे किसी की जान भी जाए, उसकी बला से। निस्संदेह, ये घटनाएं किसी सभ्य के माथे पर कलंक जैसी ही हैं।
हम अक्सर सुनते हैं कि फलों को तुरत-फुरत पकाने वाले रसायनों का जमकर प्रयोग किया जा रहा है। हरी सब्जी व फलों को घातक रसायन से चमकदार बनाया जा रहा है। दरअसल, तुरंत फसल लेने के लिये ऐसे घातक रसायन प्रयोग किए जा रहे हैं, जिन पर तमाम सभ्य समाजों में पूर्ण प्रतिबंध है। लेकिन हमारे देश में ऐसा नियामक तंत्र विकसित ही नहीं हो पाया है, जो ऐसे मामलों में तुरत-फुरत जांच करे और तत्काल मिलावटखोरों को सजा दिलाए। विडंबना यह भी है कि हमारे समाज में स्वयं सेवी संगठन या जागरूक लोग इस गंभीर संकट के प्रति संवेदनशील नहीं हैं।
शासन-प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि हर शहर में मिलावटी सामान की जांच करने वाली लैब की सहज उपलब्धता क्यों नहीं है? जिन विभागों के अधिकारियों के पास जांच-पड़ताल का दायित्व होता है, वे चुप क्यों रहते हैं? मिलावट रोकने के लिए कानून तो है, मगर उस पर अमल नहीं होता। त्यौहारों के दिनों में स्वास्थ्य विभाग कुछ दुकानों पर छापे मारकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेता है। कुछ छोटे हलवाइयों पर कार्रवाई होती है, मगर बड़ी मछलियां साफ बच निकलती हैं। क्या इन अधिकारियों की खामोशी में चांदी के जूते की चोट शामिल होती है? यही वजह है कि मिलावट करने वालों में खौफ ही नहीं है। ज्यादातर मामलों में सरकारी तंत्र केवल खानापूर्ति करता ही नजर आता है। इसके अलावा फूड टेस्टिंग के लिए प्रयोगशालाएं भी पर्याप्त नहीं हैं, जिसके कारण हजारों की तादाद में आने वाले सैम्पलों की कई महीनों तक जांच ही नहीं हो पाती। इस बीच मिलावटी और मिस ब्रांडेड खाद्य पदार्थ बेरोकटोक बाजार में बिकने के लिए आ जाते हैं। अधिकतर मामलों में दोष सिद्ध होने पर केवल जुर्माना वसूल कर ही इतिश्री कर ली जाती है।
हम जानते हैं कि जब से देश में सीसीटीवी कैमरों का प्रयोग बढ़ा है, लाखों सच सामने आए हैं। अन्यथा ये सच कभी प्रकाश में न आ पाते। ऐसी ही कोई कारगर तकनीक मिलावट रोकेगी। जयपुर के खाद्य सुरक्षा विभाग ने पिछले दिनों पैकेज्ड फूड आइटम्स पर लिखी एक्सपायरी डेट मिटाने वाले अत्याधुनिक उपकरण बरामद किए। तो ऐसे में एक्सपायरी डेट देखकर सामान खरीदने वाला आम आदमी क्या करेगा?
बुराइयों के फलने-फूलने की एक वजह यह है कि जनता निष्क्रिय है। उपभोक्ताओं का एक संगठन बनाकर लोग तय करें कि वे अपने क्षेत्र में मिलावट नहीं होने देंगे। प्रत्येक व्यापारी का दायित्व है कि वह न तो मिलावट करे और न ही इस कार्य में किसी की मदद करे। जनता भी मिलावटी पदार्थ को खरीदने से बचने के साथ-साथ मिलावटखोर की तुरंत शिकायत करें। वहीं संबंधित विभागों और अधिकारियों को भी सजग रहना होगा। नियमित रूप से जांच, जागरूकता अभियान और उचित कार्रवाई कर दोषी लोगों पर कठोर कानूनी कार्रवाई करनी होगी। निश्चय ही अनैतिक रूप से मुनाफा कमाने वाले लोग सख्त सजा के हकदार हैं।
देश में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम-2006 लागू है, जिसमें जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान है। इसके बावजूद मोटे मुनाफे के लालच में मिलावट का यह धंधा-धड़ल्ले से फलफूल रहा है। गांव हों या शहर मिलावटखोरों को कानून या सजा का कोई भय दिखाई नहीं देता। जिम्मेदार अधिकारी इस सारे गोरखधंधे की कमजोर कडि़यों को हम सबसे बेहतर तरीके से जानते हैं। खाद्य सुरक्षा के मानकों को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया तय करता है। कागजों में तो सारे प्रावधान हो जाते हैं लेकिन क्रियान्वयन नहीं हो पाता।
विशेषज्ञ कहते हैं कि खाद्य पदार्थों में प्रचलित उच्च स्तर की मिलावट चिंता का कारण बन रही है। यह एक लगातार मिलने वाली समस्या रही है। भोजन जीवन की बुनियादी आवश्यकता है, इसे देखते हुए मिलावटी उत्पादों के हानिकारक प्रभावों को रोकने के लिए सभी तरह के उपाय करना ज़रूरी है। देश में मिलावटखोरी रोकने के लिए मौजूदा कानून को और सख्त बनाये जाने की जरूरत है। अन्यथा अस्पतालों में मिलावटी खाद्य पदार्थों से लीवर-किडनी खराब करवाने वाले मरीजों की लंबी कतारें हमारे समाज की हकीकत बनी रहेंगी। खाद्य पदार्थों में हानिकारक रसायनों की मिलावट का मसला कई बार संसद में भी उठ चुका है लेकिन कोई ठोस समाधान निकलकर नहीं आया है। मिलावटखोरों को मौत की सजा के प्रावधान वाला विधेयक भी लंबित है। ऐसे में सरकार को मिलावट को रोकने के लिए ठोस नीति बनाकर उसका उचित क्रियान्वयन कराने की जरूरत है।
मिलावटखोरों को मिले कड़ी सजा
Summary :
खाद्य पदार्थों में मिलावट, नकली ब्रांड और घटिया गुणवत्ता के मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। मुनाफाखोरी और व्यापार की प्रतिस्पर्धा के कारण मिलावट का यह खेल बेधड़क चल रहा है। दाल, दूध, मावा, घी, मसाले, आटा, फल-सब्जियां सहित खाने-पीने की लगभग हर चीज में मिलावट है। वहीं, कंपनियों के उत्पाद भी गुणवत्ता के पैमाने पर खरे नहीं उतर रहे हैं। स्वास्थ्य व खाद्य विभाग में भ्रष्टाचार इतने चरम पर है कि वे मिलावटखोरी पर लगाम कसने में नाकाम नजर आ रहे हैं। इसका खामियाजा मिलावटी चीजों को खा रहे आमजन को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि इनमें मौजूद…


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