लाल किले की प्राचीर से पहली बार ‘वंदे मातरम्’ के स्वर गूंजे तो इसके साथ ही एक नया राजनीतिक विवाद भी खड़ा हो गया। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस, विशेषकर सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन को बीच में ही रुकवा दिया। रिपोर्टों के मुताबिक नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत के गायन के दौरान का एक वीडियो प्रसारित हुआ, जिसमें कुछ अव्यवस्था दिखाई दे रही थी। वीडियो में सोनिया गांधी भी असहज नजर आ रही थीं। इसी के आधार पर यह दावा किया गया कि उन्होंने राष्ट्रगीत का गायन बीच में रोकने के लिए कहा था।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस नेतृत्व पर तीखा प्रहार करते हुए कहा -यह पाप माफ नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा-कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का गायन हो रहा था। इसी दौरान कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष से गायन रोकने को कहा। हम सभी यह दृश्य टेलीविजन पर देखते रहे। शाह ने आगे कहा-सोनिया जी देश की 140 करोड़ जनता आपको देख रही है। आपने जो पाप किया है, उसे देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी। वंदे मातरम् जैसे राष्ट्रगीत को अधूरा छोड़ने की कल्पना भी कोई कैसे कर सकता है?कांग्रेस के लोगों को शर्म आनी चाहिए। उन्होंने कांग्रेस से माफी की मांग करते हुए कहा कि यदि उसमें जरा भी शर्म बाकी है तो उसे हाथ जोड़कर ‘बंकिम बाबू की अमर आत्मा’ से क्षमा मांगनी चाहिए।
विशेष रूप से जेनरेशन-ज़ेड के लिए यह पहल महत्वपूर्ण है। वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी इस पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा ऐसे दौर में बड़ा हुआ है जहां तकनीक, सोशल मीडिया और वैश्विक संस्कृति उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। उनके लिए राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के बीच का अंतर जानना भी उतना स्वाभाविक नहीं है, जितना पिछली पीढ़ियों के लिए था। ऐसे में ‘वंदे मातरम्’ को सार्वजनिक राष्ट्रीय आयोजनों में प्रमुखता मिलना उन्हें भारत के स्वतंत्रता संग्राम, उसके राष्ट्रीय प्रतीकों और उनके ऐतिहासिक महत्व से जोड़ने का एक माध्यम बन सकता है।
दरअसल, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के बीच का अंतर महज शब्दों का अंतर नहीं है। दोनों का अपना अलग इतिहास, संदर्भ और राष्ट्रीय महत्व है। दुर्भाग्य से तकनीक की तेज रफ्तार और बदलती जीवनशैली के बीच नई पीढ़ी का अपने राष्ट्रीय प्रतीकों से भावनात्मक परिचय उतना गहरा नहीं रह गया है। ऐसे में इस अंतर को समझना और समझाना आवश्यक है। यह भी स्वीकार करना होगा कि मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले राष्ट्रवाद को न तो सार्वजनिक विमर्श में इतनी प्रमुखता हासिल थी और न ही वह सरकारों के राजनीतिक एजेंडे का इतना मुखर हिस्सा था। राष्ट्रबोध को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श भी अपेक्षाकृत सीमित रहा।
इसका एक कारण हमारे पारिवारिक संस्कारों में भी दिखाई देता है। भारतीय परिवारों में बच्चों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि उन्हें अपने माता-पिता और परिवार के लिए क्या करना है, अपने भविष्य को कैसे संवारना है और अपने व्यक्तिगत जीवन में कैसे आगे बढ़ना है। लेकिन देश के प्रति उनके दायित्व, राष्ट्र के प्रति उनकी जिम्मेदारी और नागरिक के रूप में उनकी भूमिका पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।
नतीजा यह है कि राष्ट्र हमारे दैनिक जीवन का भावनात्मक हिस्सा तो है लेकिन उसके प्रति नागरिक कर्त्तव्य हमारी सामूहिक चेतना का उतना मुखर हिस्सा नहीं बन पाया है। शायद यही वजह है कि ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान के बीच का अंतर भी आज कई लोगों के लिए महज एक सामान्य जानकारी का प्रश्न बनकर रह गया है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं लेकिन ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता दिवस के राष्ट्रीय उत्सव में उसका सम्मानजनक स्थान मिलना उस व्यापक उद्देश्य की ओर एक कदम है, जिसकी आज पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है नई पीढ़ी को केवल अपने अधिकारों से नहीं बल्कि अपने राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्यों से भी परिचित कराना। इस लिहाज से मोदी सरकार को राष्ट्रवाद को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाने के लिए श्रेय दिया जाना चाहिए। ‘वंदे मातरम्’ को उसका उचित सम्मान और स्थान दिलाने की पहल इसी दिशा में उठाया गया एक और महत्वपूर्ण कदम है।
अब वर्तमान पर लौटें। भारतीय संसद ने राष्ट्रीय गौरव के अपमान की रोकथाम (संशोधन विधेयक, 2026) यानी ‘वंदे मातरम् विधेयक’ पारित किया है। इसके तहत राष्ट्रगीत को वही कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है जो अब तक राष्ट्रगान को प्राप्त था। इस नए कानून के अस्तित्व में आने से पहले लागू कानून के तहत राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकना या राष्ट्रगान गा रही किसी सभा में व्यवधान डालना दंडनीय अपराध था। ऐसा करने पर तीन वर्ष तक के कारावास, जुर्माने अथवा दोनों का प्रावधान था। हालांकि ये प्रावधान राष्ट्रगीत के मामले में लागू नहीं होते थे।
इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश में कहा गया कि इस वर्ष 15 अगस्त को पहली बार लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ का गायन किया जाएगा। मंत्रालय ने यह भी निर्देश दिया कि सभी सरकारी और आधिकारिक समारोहों में राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रगीत की सभी छह कड़ियों का गायन किया जाए। मंत्रालय द्वारा जारी प्रारंभिक प्रोटोकॉल में स्पष्ट किया गया कि राष्ट्रपति के आगमन, राष्ट्रीय ध्वज फहराने और राज्यपालों के संबोधन सहित सभी आधिकारिक समारोहों में राष्ट्रगीत का गायन किया जाएगा। नए कानून के लागू होने से पहले आधिकारिक समारोहों में केवल राष्ट्रगान बजाया या गाया जाता था। हालांकि राष्ट्रवाद की इस पहल पर राजनीति हावी हो गई। विपक्ष ने सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करार दिया और आरोप लगाया कि यह समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने का प्रयास है।
विवाद केवल राष्ट्रगीत को अनिवार्य किए जाने तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल भी उठा कि आखिर ‘वंदे मातरम्’ की कितनी कड़ियां गाई जानी चाहिए केवल दो या सभी छह? इतिहास में दर्ज तथ्य यह है कि संविधान सभा ने स्पष्ट रूप से कहा था कि राष्ट्रगीत की केवल पहली दो कड़ियां ही गाई जानी चाहिए। इसके विपरीत, मौजूदा सरकार ने सभी छह कड़ियों के गायन को अनिवार्य किया है।
संसद में हुई बहस ने इस विवाद को धार्मिक रंग भी दे दिया। मुस्लिम समुदाय से आने वाले कुछ सांसदों ने सरकार पर ‘धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन’ करने का आरोप लगाया। एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इसे और स्पष्ट शब्दों में रखते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ में देवी-देवताओं की आराधना का भाव है। उनका तर्क था कि ‘जन गण मन’ का गायन राष्ट्र की तस्वीर सामने रखता है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ एक प्रार्थना है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रगीत का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ने के बाद सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र में आशंका जताई थी कि इसकी कुछ पंक्तियां मुसलमानों को असहज कर सकती हैं। स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर ने भी स्वीकार किया था कि मातृभूमि के प्रतीक के रूप में दुर्गा की छवि को मुसलमानों के लिए स्वीकार करना कठिन हो सकता है। दरअसल, ‘वंदे मातरम्’ पर होने वाली अधिकांश आपत्तियां इसकी तीसरी से छठी कड़ी को लेकर रही हैं। इन कड़ियों में मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों के रूप में चित्रित किया गया है और उनका स्पष्ट आह्वान किया गया है। जहां नेहरू सांप्रदायिक सौहार्द के मद्देनजर गीत का दायरा सीमित कर उसे पहली दो कड़ियों तक रखने के पक्ष में थे, वहीं मोहम्मद अली जिन्ना चाहते थे कि धार्मिक संदर्भों के कारण पूरे गीत को ही अस्वीकार कर दिया जाए।
पहली दो कड़ियों को व्यापक स्वीकार्यता मिली लेकिन राष्ट्रगीत के बाद के हिस्से को लेकर विवाद बना रहा। परिणामस्वरूप 1937 में राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किए गए संस्करण में बाद की कड़ियों को शामिल नहीं किया गया। इसके बावजूद मोदी सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को उसके पूर्ण स्वरूप में अपनाने का निर्णय लिया है। साथ ही यह निर्देश दिया गया है कि नेहरू और कांग्रेस द्वारा अपनाए गए संक्षिप्त स्वरूप के बजाय इसकी सभी छह कड़ियों का गायन किया जाए। कागज पर यह व्यवस्था पूरी तरह उचित प्रतीत होती है लेकिन व्यवहार में एक ही समारोह में दो-दो बार दोनों गीतों के लिए सावधान मुद्रा में खड़े रहना कुछ हद तक बोझिल हो सकता है। इससे न तो राष्ट्रगीत की गरिमा कम होती है और न राष्ट्रगान के महत्व पर कोई प्रश्न उठता है। फिर भी सरकार इस व्यवस्था पर पुनर्विचार कर सकती है।
एक अधिक सहज व्यवस्था यह हो सकती है कि सभी आधिकारिक समारोहों की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ से हो और समापन राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ किया जाए। इससे दोनों राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा भी बनी रहेगी और एक ही समारोह में दोनों का दोहरा गायन करने की आवश्यकता भी नहीं होगी। राष्ट्रगीत को उसका उचित स्थान मिलना निस्संदेह स्वागत योग्य है। अब आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक बहस का विषय न बनने दिया जाए बल्कि उसे इतिहास, नागरिक कर्त्तव्य और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ते हुए अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
वन्दे मातरम् पर विवाद क्यों !
Summary :
लाल किले की प्राचीर से पहली बार ‘वंदे मातरम्’ के स्वर गूंजे तो इसके साथ ही एक नया राजनीतिक विवाद भी खड़ा हो गया। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस, विशेषकर सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन को बीच में ही रुकवा दिया। रिपोर्टों के मुताबिक नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत के गायन के दौरान का एक वीडियो प्रसारित हुआ, जिसमें कुछ अव्यवस्था दिखाई दे रही थी। वीडियो में सोनिया गांधी भी असहज नजर आ रही थीं। इसी के आधार पर यह दावा किया गया कि उन्होंने राष्ट्रगीत का गायन बीच में…


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