युद्ध और आम नागरिक

एक तरफ जहां पश्चिम एशिया में ईरान-इजराइल व अमेरिका युद्ध को लेकर भयंकर हाहाकार मचा हुआ है और पूरी दुनिया भीषण आर्थिक झंझावतों से जूझने के कगार पर पहुंच गई है तो भारत में संसद का सत्र चालू है जिसमें इस मामले को लेकर विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर बयान दे चुके हैं कि भारत कभी भी युद्ध के पक्ष में नहीं रहा है और वह हर मामले का शान्तिपूर्ण हल चाहता है परन्तु युद्ध की विभीषिका इतनी प्रबल होती है कि चाहे-अनचाहे वह दुनिया के विभिन्न शान्ति प्रिय देशों को भी अपनी चपेट मे लेने की क्षमता रखती है। अतः भारत में पश्चिम एशिया के युद्ध के जो विपरीत प्रभाव पड़ रहे हैं उसे हम सब देख रहे हैं। इस मामले में अभी तक सबसे बड़ा बुरा असर ईंधन गैस की सप्लाई पर पड़ा है और पूरे देश में इसकी किल्लत महसूस की जाने लगी है परन्तु इसके लिए सीधे सत्तारूढ़ सरकार को दोषी बता देना भी कदापि उचित नहीं है क्योंकि भारत 80 प्रतिशत से अधिक ईंधन गैस की आपूर्ति आयात द्वारा ही करता है।
पश्चिम एशिया का युद्ध अब एेसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां युद्ध के सभी नियम धराशायी हो रहे हैं और ईरान व इजराइल तथा अमेरिका एक-दूसरे की ताकत को खत्म कर देने की कोशिश में सभी नैतिक मानदंडों को ताक पर रख रहे हैं जिसकी वजह से पूरे विश्व में पेट्रोलियम कच्चे तेल की सप्लाई रुक जाने के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। इस मामले में सबसे पहले यह समझना होगा कि यह लड़ाई पूरी तरह गैर संवैधानिक व नियम विरुद्ध है जो अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प की जिद की वजह से शुरू हुई है। श्री ट्रम्प ने युद्ध शुरू करते हुए अपना लक्ष्य बताया था कि वह ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं। इस क्रम में उन्होंने ईरान पर हमला करके उसके सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या तक कर दी परन्तु ईरान में वहां की राष्ट्रवादी जनता ने इसे अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला माना और वह ईरान की सत्ता पर काबिज दूसरी पंक्ति के नेताओं के पीछे चलने लगी। इसके बाद ईरान ने इस युद्ध में अपनी पूरी सामरिक शक्ति व सामर्थ्य को झोंकते हुए पूरे खाड़​ी व पश्चिम एशियाई इलाकों के विभिन्न देशो में स्थापित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमला करना शुरू किया और अपने नियन्त्रण में होर्मुज के जलडमरू मध्य के समुद्री मार्ग को एक हथियार बनाना शुरू किया जिससे पूरी दुनिया का 20 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल का दुनिया के विभिन्न देशों को यातायात किया जाता है। अब इस जलडमरू मध्य से ईरान केवल कुछ गिने-चुने देशों के जहाजों को छोड़ कर अन्य देशों के जहाजों को गुजरने नहीं दे रहा है और चेतावनी दे रहा है कि यदि एेसा करने का प्रयास किन्हीं अन्य देशों ने किया तो उसके गंभीरतम परिणाम होंगे।
युद्ध में जब एेसा मुकाम आता है तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक व रणनीतिक समीकरण बदलने लगते हैं। अतः हम आज जो कुछ भी होर्मुज जलडमरू मध्य में देख रहे हैं वह केवल युद्ध के दुष्परिणाम ही हैं। जहां तक खाड़ी व अरब देशों का सवाल है तो वे भी इस युद्ध में अमेरिका के सहयोगी बने रहने का परिणाम भुगत रहे हैं। मगर इस युद्ध से केवल कच्चे तेल के भाव ही प्रभावित हों एेसा नहीं है क्योंकि होर्मुज जलडमरू मध्य वाणिज्यिक पोतों का मुख्य मार्ग है जिसकी वजह से विभिन्न देशों मे अन्य सामान की सप्लाई भी प्रभावित होती है यही वजह है कि भारत में केवल ईंधन गैस की किल्लत होने से ही इसके महानगरों के होटलों व रेस्टोरेंटों के व्यापार में भारी गिरावट दर्ज हो रही है। इतना ही समुद्री व्यापारिक मार्गों के अवरुद्ध होने की वजह से अन्य वस्तुओं पर भी परोक्ष रूप से प्रभाव पड़ रहा है।
अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत इस संकट का मुकाबला किस प्रकार करे? जहां तक कच्चे तेल का सवाल है तो भारत ने रूस से इसका आयात बढ़ा दिया है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की आपूर्ति करने के लिए विश्व के दूसरे उत्पादक देशों के साथ अनुबन्ध करने शुरू कर दिये हैं। इसके साथ यह भी समझना जरूरी है कि इस अनचाहे संकट का हम भारतवासी किस प्रकार मुकाबला करें जिससे हमारे कष्ट कम से कम हो सकें। इस सन्दर्भ में हमारी संसद के चल रहे सत्र का महत्व बहुत अधिक हो जाता है क्योंकि पूरी संसद समवेत स्वर में कह सकती है कि मौजूदा सरकार को केवल अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च रखते हुए एेसी नीति का अनुसरण करना चाहिए जिससे आम भारतीयों को कम से कम कष्ट भोगना पड़े। बेशक भारत में बहुदलीय राजनीतिक प्रशासनिक व्यवस्था है परन्तु इसका मुख्य ध्येय केवल आम नागरिक का बहुआयामी विकास ही है। यह कार्य तभी हो सकता है जब हम अपनी लोकतान्त्रिक प्रणाली का उपयोग संकटकालीन परिस्थितियों में सर्वदलीय मतैक्य स्थापित करने के लिए करें। इस काम में सरकार को ही सबसे पहले आगे बढ़कर आना होगा और विपक्षी दलों को विश्वास में लेना होगा और साथ ही विपक्षी दलों को भी अपने तात्कालिक राजनीतिक लाभों को दरकिनार करते हुए आम नागरिक के साथ खड़ा होना होगा लेकिन हमने देखा कि लोकसभा में कल इसके अध्यक्ष के विरुद्ध रखे गये अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान किया जो ध्वनिमत से ही गिर गया।
आज सदन में इस अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस का जायजा लेते हुए अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने लगभग 28 मिनट का वक्तव्य दिया जिसमें उन्होंने सदन की प्रतिष्ठा व मान-मर्यादा को नियमानुसार बनाये रखने का संकल्प दोहराया। हमारी संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली पर अंगुली उठाने की गुंजाइश इसलिए नहीं बनती है क्योंकि हमने जिस संविधान के तहत इस प्रणाली की स्थापना की है उसमें सभी प्रकार के मतों को समाहित करने का सामर्थ्य है बशर्तें वे केवल अहिंसक मार्ग के हों। अतः असली सवाल उस राष्ट्रबोध का है जिसके तहत समूची प्रजातान्त्रिक व्यवस्था नतमस्तक रहती है। इस राष्ट्रबोध में भारत का आम नागरिक सबसे पहले आता है जिसकी वजह से भारत गणतन्त्र कहलाता है। अतः संसद का कर्त्तव्य बनता है कि वह इसी आम आदमी की कठिनाइयों के निवारण के लिए राजनीतिक हितों को फिलहाल तिलांजिली देकर उसे सशक्त करने के बारे मंे सोचें।

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