कांग्रेस व भाजपा में रस्साकशी

Summary :

यदि वस्तुगत तरीके से देखा जाये तो राजस्थान के पालिका या स्थानीय निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी कांग्रेस पार्टी के बीच जबर्दस्त रस्साकशी रही है जिसमें भाजपा का पलड़ा झुका हुआ रहा है परन्तु कांग्रेस पार्टी ने भी जमकर चुनौती देने की कोशिश की है। राज्य की दस नगर निगमों में से चार में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला है जो जयपुर, उदयपुर, कोटा व भीलवाड़ा हैं जबकि कांग्रेस को बीकानेर नगर निगम में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ है और जोधपुर, अलवर, अजमेर व पाली नगर निगमों में दोनों पार्टियां बहुमत से दूर रही हैं जिससे…

यदि वस्तुगत तरीके से देखा जाये तो राजस्थान के पालिका या स्थानीय निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी कांग्रेस पार्टी के बीच जबर्दस्त रस्साकशी रही है जिसमें भाजपा का पलड़ा झुका हुआ रहा है परन्तु कांग्रेस पार्टी ने भी जमकर चुनौती देने की कोशिश की है। राज्य की दस नगर निगमों में से चार में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला है जो जयपुर, उदयपुर, कोटा व भीलवाड़ा हैं जबकि कांग्रेस को बीकानेर नगर निगम में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ है और जोधपुर, अलवर, अजमेर व पाली नगर निगमों में दोनों पार्टियां बहुमत से दूर रही हैं जिससे मेयर पद की चाबी निर्दलीयों के हाथ में आ गई है।

मगर मुख्यमन्त्री श्री भजन लाल शर्मा के गृह स्थान भरतपुर नगर निगम में निर्दलीयों ने बाजी मारी है। नगर के कुल 65 वार्डों में भाजपा को केवल 20 ही मिल पाये और कांग्रेस 7 पर विजयी रही जबकि निर्दलीयों ने 36 स्थान जीते। सबसे ज्यादा दिलचस्प नतीजे जोधपुर नगर निगम के रहे जो कि कांग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमन्त्री श्री अशोक गहलौत का गढ़ है।
इस नगर निगम की कुल 80 सीटों में से कांग्रेस व भाजपा को बराबर-बराबर 44-44 सीटें मिलीं। जोधपुर भाजपा नेता व केन्द्रीय मन्त्री गजेन्द्र सिंह शेखावत का भी गृहनगर है। जयपुर नगर निगम की कुल 150 सीटों में से भी भाजपा को किनारे पर 78 सीटों के साथ ही बहुमत मिला जबकि यह मूल रूप से शहरी पार्टी मानी जाती है।

पाली नगर निगम में तो भाजपा कांग्रेस से पिछड़ गई और इसे कुल 65 वार्डों में से 21 ही मिले जबकि कांग्रेस ने 29 वार्ड हथिया लिये। यह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री मदन राठौड़ का गृहनगर है। इसी प्रकार भाजपा की कद्दावर नेता व पूर्व मुख्यमन्त्री श्रीमती वसुन्धरा राजे के गृहनगर झालावाड़ की नगर परिषद को कांग्रेस ने कब्जा लिया और यहां के कुल 45 स्थानों में से भाजपा को केवल 13 स्थान ही मिले जबकि कांग्रेस ने 29 स्थान जीत कर बहुमत प्राप्त किया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ये चुनाव काफी उलटफेर वाले रहे हालांकि कुल मिलाकर प्रदेश के सभी नगर निगमों व पालिका वार्डों में भाजपा की ही बढ़त रही मगर कांग्रेस भी कदम-कदम पर इसे टक्कर देती हुई आगे बढ़ी।

राज्य के कुल 309 नगर निकायों के 10244 वार्डों में से भाजपा को 4179 स्थान मिले जबकि कांग्रेस को 3673 स्थान मिले वहीं निर्दलीयों को भी 2273 वार्ड मिले और अन्य पार्टियों के खाते में शेष स्थान आये। सबसे रोचक परिणाम बीकानेर जिले की नोखा नगर पालिका का रहा जहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बहुमत हासिल किया। राज्य के 47 मध्यम दर्जे के शहरों की नगर परिषदों में से भाजपा के हिस्से में 12 व कांग्रेस के हिस्से में छह परिषदें आईं और आम आदमी पार्टी के हिस्से में एक नगर परिषद आई। राज्य की कुल 252 नगर पालिकाओं में भी कमोबेश यही क्रम रहा और भाजपा ने 70 पर अपना कब्जा किया जबकि कांग्रेस ने 39 पर विजय प्राप्त की।

अतः इन परिणामों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि चुनावों में किसी एक पार्टी की हवा बह रही थी जबकि अवधारणा यही रहती है कि प्रदेश में जिस पार्टी की भी सरकार होती है स्थानीय निकाय चुनाव में उसी की लहर चलती है। दरअसल विपक्षी पार्टी कांग्रेस भाजपा पर यह आरोप लगा कर अपने पक्ष में हवा बना रही थी कि हार के डर से भाजपा निकाय चुनाव कराने में देरी कर रही है। मगर भाजपा की बढ़त ने उसके इस प्रचार को हल्का तो साबित कर दिया है परन्तु कड़े संघर्ष को देखेते हुए लगता है कि कहीं न कहीं जमीन पर कांग्रेस के इस विमर्श ने काम भी किया है।

निकाय चुनाव नियमानुसार हालांकि बिना राजनीतिक पहचान के लड़े जाते हैं मगर प्रत्याशियों द्वारा अपनी राजनीतिक पहचान के अनुसार चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबन्ध नहीं होता जिसकी वजह से इन निकायों में दल-बदल कानून भी लागू नहीं होता। इसे देखकर कहा जा सकता है कि जिन निकायों में कांग्रेस या भाजपा में से किसी का बहुमत नहीं आया है उनमें पलड़ा सत्तारूढ़ पार्टी की तरफ झुक जायेगा। कांग्रेस ने यह आरोप भी लगाया कि भाजपा ने मनमाने ढंग से निकाय क्षेत्रों का परिसीमन किया।

वैसे गौर से देखा जाये तो शुरू से ही राजस्थान जनसंघ या भाजपा के लिए मुफीद राज्य रहा है। 1952 में देश में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए थे तो अखिल भारतीय स्तर पर जनसंघ के तीन लोकसभा सांसद चुनाव जीते थे जिनमें पार्टी के संस्थापक डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी बंगाल से शामिल थे। उनके अलावा एक और प्रत्याशी जनसंघ के टिकट पर ही बंगाल से चुनाव जीता था। जो तीसरा सांसद जनसंघ का चुना गया था वह राजस्थान की ही भीलवाड़ा सीट से था परन्तु जब 1956 में स्व. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कांग्रेस से निकल कर अपनी अलग स्वतन्त्र पार्टी बनाई तो पूर्व देशी रियासतों के अधिकतम रजवाड़ों ने इस पार्टी की सदस्यता ले ली जिससे इसके बाद स्वतन्त्र पार्टी ही प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी बनती चली गई।

केवल मेवाड़ (उदयपुर) के महाराणा भगवन्त सिंह जनसंघ के पाले में रहे मगर यह इलाका राजस्थान राज्य के शिखर पुरुष व कांग्रेस के नेता स्व. मोहन लाल सुखाड़िया की कर्मभूमि था जिसकी वजह से जनसंघ का सितारा नहीं चमक सका। मगर 1974 में स्वतन्त्र पार्टी का स्व. चौधरी चरण सिंह की पार्टी लोकदल में विलय हो गया जिसके बाद राज्य की राजनीति में करवट आई और जनसंघ ने स्वतन्त्र पार्टी का जनाधार कब्जाना शुरू किया। इसके बाद से भाजपा ने राज्य में आगे बढ़ना शुरू किया और यह शुरू में शहरी पार्टी बनकर बाद में गांवों में भी अपनी पैठ बनाने लगी। अब स्थिति यह है कि गांवों में भी यह पार्टी कांग्रेस का जनाधार खोखला करने लगी है जिसकी वजह से छोटे-छोटे कस्बों तक में इसकी पकड़ मजबूत है।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.