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घड़ी चोर इमरान खान

पड़ोसी देश पाकिस्तान में जो कुछ भी घट रहा है वह इस बात का पक्का सबूत है कि मजहब की बुनियाद पर तामीर किये गये मुल्कों में कभी भी लोकतन्त्र पुख्ता नहीं हो सकता और हुकूमत पर काबिज होने के लिए ऐसे मुल्कों में लोगों को आपस में ही लड़ाने की सियासत होती है।

पड़ोसी देश पाकिस्तान में जो कुछ भी घट रहा है वह इस बात का पक्का सबूत है कि मजहब की बुनियाद पर तामीर किये गये मुल्कों में कभी भी लोकतन्त्र पुख्ता नहीं हो सकता और हुकूमत पर काबिज होने के लिए ऐसे मुल्कों में लोगों को आपस में ही लड़ाने की सियासत होती है। सवाल पैदा होता है कि जब पाकिस्तान को 1947 में सिर्फ मुसलमानों के लिए ही बनाया गया था तो फिर इस मुल्क में ऐसी सियासत क्यों नहीं पनपी जिसके केन्द्र में अवाम का भला हो ? बल्कि पाकिस्तान में इसका उल्टा यह हुआ है कि इसकी हुकूमत से लेकर सम्पत्ति पर केवल कुछ गिने-चुने खानदानों का ही कब्जा है और मुल्क की जनता के नसीब में गरीबी है। अवाम को जाहिल और धर्मांध बनाये रखने के लिए सभी मुस्लिम सियासी जमातों ने अब तक जो कारनामे किये हैं उसी का नतीजा है कि यह मुल्क आज हाथ में भीख का कटोरा लिये पूरी दुनिया के सामने घूम रहा है। इससे बड़ी शर्म और बेगैरती की बात और क्या होगी कि इसके साबिक वजीरे आजम इमरान खान पर सरकारी खजाने (तोशाखाने) से दूसरे मुल्कों से मिली सौगातों को सस्ते दाम पर खरीद कर महंगे दाम पर बेच कर मुनाफा कमाने का आरोप लग रहा है। वह अदालत-दर-अदालत  पेशियों से भाग रहा है और इसके खिलाफ अपनी पार्टी के कारकुनों को उकसा कर पुलिस के खिलाफ हिंसा कर रहा है।
कहने को तो इमरान खान 2018 में हुए चुनावों में राष्ट्रीय एसेम्बली के चुनावों में जीत कर पाकिस्तान का वजीरे आजम बना था मगर इसके बाद इसने जो तरीके अपनाएं और अपने देश की जनता को मजहब की अफीम पिला कर बेहोश रखने की नीति बनाई उससे पाकिस्तान की आने वाली नस्लें भी बरबादी के कगार पर पहुंच गईं। पिछले साल अप्रैल महीने में ही जब पाकिस्तान की राष्ट्रीय एसेम्बली में इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ तो इसने वजीरे आजम का औहदा छोड़ने से न सिर्फ इन्कार किया बल्कि अपने मुल्क के सुप्रीम कोर्ट तक को भी पशेमान करने के इन्तजाम बांधे और एसेम्बली के अध्यक्ष के साथ मिल कर अविश्वास प्रस्ताव को दरकिनार करने की साजिश रची। मगर सुप्रीम कोर्ट ने आधी रात को अपने दरवाजे खोल कर पाकिस्तान के आधे-अधूरे लोकतन्त्र को पटरी पर डालने का इन्तजाम किया। इसके बाद से ही इमरान खान कोशिश कर रहा है कि जैसे भी हो पाकिस्तान में जल्दी से जल्दी चुनाव हों जिससे अपनी हुक्मरानी के दौर में उसने पाकिस्तान की आर्थिक व्यवस्था का दिवाला निकालने का जो इंतजाम किया था उसका नतीजा नये वजीरे आजम शहबाज शरीफ को भुगतना पड़े। भला किसी बा-शऊर मुल्क में ऐसा हो सकता है कि जहां उसके पूर्व प्रधानमन्त्री को कोई अदालत तलब करे और वह अपनी अदालत के बाहर ही अपने समर्थकों से घिरा रह कर ही चन्द हाथ के फासले से ही अदालत को मुंह चिढ़ाता रहे और अदालत के अहाते में जाकर जज के सामने पेश न हो। पाकिस्तान में एेसा बार-बार हो रहा है।
 पिछली 14 मार्च को जब लाहौर पुलिस इमरान खान को गिरफ्तार करने के लिए उसके जमान पार्क स्थित निवास पर गई तो पूरे लाहौर को ही उसकी पार्टी तहरीके इंसाफ के कारकुनों ने जंग का मैदान बना दिया जिससे 18 मार्च को उसकी अदालत में पेशी न हो सके। बाद में अदालत को ही हुक्म देना पड़ा कि उसकी गिरफ्तारी न की जाये और 18 मार्च को इमरान खुद अदालत में पेश हों। 18 मार्च को इस्लामाबाद की अदालत के सामने जब उसकी पेशी होनी थी तो फिर से यही नाटक हुआ और अदालत को हुक्म देना पड़ा कि वह 30 मार्च को अदालत में पेश हों। जब पाकिस्तान का चुनाव आयोग इमरान खान को तोशाखाने से महंगी हाथ घड़ी की खरीद-फरोख्त के मामले में चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा चुका है तो शक की गुंजाइश कहां बचती है ? अमानत में खयानत का यह सीधा-सादा मामला है। हमने पहले भी देखा है कि पाकिस्तान की अदालतों को किस तरह दहशतगर्द डराते-धमकाते रहे हैं और वकील उनके खिलाफ मुकदमें लड़ने से घबराते रहे हैं। मगर 2018 के चुनावों में ‘बल्ला घुमाओ-भारत हराओ’ का नारा हवा में लहरा कर चुनाव जीतने वाली इमरान खान की तहरीके इंसाफ पार्टी ने सिवाय भारत के खिलाफ जहर उगल कर पाकिस्तानी अवाम को मुफलिसी के सिवाय कुछ और नहीं दिया और यहां तक हालात बना दिये कि इमरान खुद सऊदी अरब के राजकुमार की कार का ड्राइवर भी बन गया मगर उसके हाथ कुछ नहीं लग सका। अब इमरान खान अपने ही मुल्क के कानूनों की धज्जियां उड़ा रहा है और बुजदिली दिखाते हुए गिरफ्तारी से बच रहा है। इससे इस मुल्क की दहशतगर्द तंजीमों के हौंसले बुलन्द हो रहे हैं और वे कुछ इलाकों में अपनी हुकूमत का ऐलान तक कर रहे हैं। 
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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