कमर्शियल एलपीजी सिलैंडरों की कीमतों में 993 रुपए की भारी-भरकम वृद्धि और आने वाले दिनों में पैट्रोल, डीजल की कीमतों में बढ़ौतरी की आशंका से सभी क्षेत्रों में चिंताएं गहरी हो गई हैं। राजधानी दिल्ली में कमर्शियल सिलैंडर की कीमत 3000 से ऊपर हो गई है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से पैदा हुए गम्भीर संकट के बावजूद दो महीने से पैट्रोल और तेल की कीमतों को थाम कर रखा हुआ है और सरकार इनकी उपलब्धता के वैकल्पिक रास्ते निकालने में जी-जान से जुटी हुई है। आम जनता पर महंगाई का बोझ कम से कम पड़े इसलिए घरेलू रसोई गैस की कीमत नहीं बढ़ाई गई है। अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर जिस तरह की परिस्थितियां पैदा हुई हैं उससे रोजाना इस्तेमाल की जरूरत की वस्तुओं की सप्लाई बाधित होने से महंगाई का झटका लगना तय था। अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों के लिए विमानों के ईंधन और थोक डीजल के मूल्यों में भी बढ़ौतरी कर दी गई। पश्चिम एशिया से एलपीजी सप्लाई बाधित होने के कारण अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एलपीजी की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है।
रिफाइनिंग कम्पनियों द्वारा एलपीजी उत्पादन बढ़ाए जाने और अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि से कार्गो प्राप्त किए जाने के बावजूद घरेलू स्तर पर एलपीजी की बिक्री पर विपणन कम्पनियों का घाटा अभी भी ऊंचा बना हुआ है। यदि मौजूदा घाटे का स्तर पूरे वित्त वर्ष तक बना रहा तो सरकारी तेल विपणन कम्पनियों को एलपीजी की बिक्री पर लगभग 80 हजार करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत 125 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा रही है। पैट्रोल और डीजल की बिक्री पर क्रमशः 14 रुपए प्रति लीटर और 18 रुपए प्रति लीटर नुक्सान होने का अनुमान है। उर्वरक क्षेत्र भी सल्फर और अमोनिया की कीमतों में वृद्धि से महत्वपूर्ण लागत दबाव का सामना कर रहा है। कमर्शियल गैस की कीमतों में भारी-भरकम बढ़ौतरी से रेस्तरां, ढाबों, खान-पान सेवाओं, बेकरियों और क्लाऊड किचनों में परेशानी की लहर दौड़ गई है। सबसे ज्यादा संकट तो स्ट्रीट फूड का धंधा करने वालों पर आ खड़ा हुआ है। स्ट्रीट फूड का नेटवर्क इतना बड़ा है जो हर दिन करोड़ों भारतीयों को भोजन उपलब्ध कराता है। छोटे-छोटे व्यवसाय करने वालों के पास लम्बे समय तक लागत बढ़ने के झटकों को झेलने के लिए संसाधन नहीं होते। गैस संकट के चलते रेस्तरां मालिक पहले ही इधर-उधर भटक रहे हैं। कई रेस्तरां और ढाबे वालों ने अपना काम अस्थाई रूप से बंद कर िदया है आैर सड़क किनारे रेहडि़यां लगाने वालों की हालत तो बहुत ज्यादा खराब है। केन्द्र सरकार गैस की सप्लाई निर्बाध जारी रखने की हर सम्भव कोशिश कर रही है लेकिन उपभोक्ताओं के िलए हर मद 5 या 10 रुपए महंगी हो चुकी है।
भारत में मध्यम और िनम्न आय वर्ग के लोग महंगाई के दौर में अपनी मांग घटा देते हैं। इसका प्रभाव सब्जी व्यापारी, डेयरी विक्रेता और अन्य खानपान की वस्तुओं पर पड़ रहा है। छोटे व्यवसाय प्रभावित हुए तो उनमें काम करने वाले लोगों का रोजगार भी प्रभावित होगा। पैट्रोल आैर डीजल की कीमतों की बात करें तो कुछ देशों ने खुदरा कीमतों में वृद्धि कर दी है। केन्द्र सरकार ने तेल कम्पनियों की रक्षा करने के लिए पैट्रोल आैर डीजल पर विशेष उत्पाद शुल्क कम कर दिया है। यदि अमेरिका आैर ईरान युद्ध फिर भड़क उठता है तो कीमतें बढ़ाना विवशता ही हो जाएगा। एशिया के कुछ देशों और अन्य कई देशों में कर ढांचा इस तरह का बनाया गया है कि जब भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो वहां तेल पर उत्पाद शुल्क कीमतों के अनुपात में कम कर दिया जाता है। जब कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं तो उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया जाता है। इससे आम उपभोक्ता पर कीमतों का दबाव नहीं आता। वर्तमान परिस्थितियों में अब यह जरूर हो गया है कि उत्पाद शुल्क नीतियों को अधिक निश्चित और पूर्वानुमान योग्य बनाया जाए।
भारत में अभी 60 दिन का रिजर्व पैट्रोल है। शुरूआत में उम्मीद थी कि युद्ध जल्दी खत्म होगा और तेल कम्पनियां अपने पुराने मुनाफे से स्थितियां सम्भाल लेगी लेकिन अब जबकि संकट लम्बा खिंचता दिख रहा है तो पैट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का तूफान आ सकता है। सरकार पहले से ही एलपीजी और उर्वरक सब्सिडी का बोझ उठा रही है। ऐसे में पैट्रोल-डीजल पर घाटा सहना सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ा सकता है। वित्त मंत्रालय की मासिक रिपोर्ट में कई तरह की आशंकाएं व्यक्त की गई हैं। वित्त मंत्रालय का कहना है िक केवल तेल और गैस के भंडारण तक ही सरकारें सीमित न रहें, बल्कि प्रमुख आवश्यक कच्चे माल के भंडार भी बनाए जाएं। संकट काल में हमेशा यह देखा गया है कि कई देश महत्वपूर्ण कच्चे माल और वस्तुओं के उत्पादन में अपने प्रभुत्व को हथियार बना सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सप्लाई चेन के प्रभावित होने से आयातित यूरिया की कीमत 950 डॉलर प्रति टन हो गई है, जो िपछले वर्ष अप्रैल में 390 डॉलर प्रति टन थी। आयातित अमोनिया की कीमत 775 डॉलर प्रति टन के स्तर पर पहुंच गई है, जो पिछले साल 365 डॉलर प्रति टन थी। चिप की कीमत में पिछले साल की तुलना में 560 गुणा बढ़ौतरी हो चुकी है। वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के मुताबिक युद्ध से पहले वर्ष 2026 में वैश्विक विकास की दर 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था जिसे मार्च में 3.1 प्रतिशत कर दिया गया। अब यह विकास दर 2.5 प्रतिशत तक रहने का अनुमान है। वहीं वैश्विक विकास दर 5.4-6.0 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। भारत इससे अछूता नहीं रह सकता है। हालांकि वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश की घरेलू अर्थव्यवस्था के मानक मजबूत दिख रहे हैं। इस कारण देश की विकास दर मजबूत बनी रहेगी। फिलहाल मुद्रास्फीति की कहानी गहरी हो चुकी है और उपभोक्ताओं का व्यवहार तेजी से बदल रहा है। वैसे तो भारत बड़े से बड़े संकट को झेल चुका है। सीधे-सीधे अब चौतरफा महंगाई का असर आम लोगों की थाली आैर हर चीज पर पड़ रहा है। देश की बड़ी आबादी रोजी और रोजगार से जूझ रही है जो अपने आप में बड़ी चुनौती है।





















