हमारी संसद को क्या हुआ है ?

Summary :

भारत ने स्वतन्त्रता के बाद जब संसदीय लोकतन्त्र अपनाया तो इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि इस व्यवस्था में एेसा शासन तन्त्र खड़ा किया जा सकता था जिसके तहत देश के प्रत्येक नागरिक की सत्ता में भागीदारी उसके द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों के माध्यम से तय की जा सकती थी और चुनी गई सरकार को सीधे जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकता था। इस प्रणाली की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें जो भी सरकार बहुमत के आधार पर गठित होती है उसमें अल्पमत में रहने वाले सदस्यों की भी भागीदारी रहती है। हमारी संसद और विधानसभाओं…

भारत ने स्वतन्त्रता के बाद जब संसदीय लोकतन्त्र अपनाया तो इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि इस व्यवस्था में एेसा शासन तन्त्र खड़ा किया जा सकता था जिसके तहत देश के प्रत्येक नागरिक की सत्ता में भागीदारी उसके द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों के माध्यम से तय की जा सकती थी और चुनी गई सरकार को सीधे जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकता था। इस प्रणाली की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें जो भी सरकार बहुमत के आधार पर गठित होती है उसमें अल्पमत में रहने वाले सदस्यों की भी भागीदारी रहती है। हमारी संसद और विधानसभाओं में यह नियम बेवजह ही नहीं बनाया गया है कि सरकार द्वारा लाये गये हर विधिक कार्य तथा विधेयकों पर तत्सम्बन्धी चुने हुए सदनों में बहस कराई जायेगी और उन पर विपक्षी सांसदों के विचार भी जाने जायेंगे।
विपक्ष सरकारी विधेयकों की तसदीक करते हुए उन्हें जनहित की कसौटी पर कसेगा और तदनुसार अपनी राय सरकार को देगा। विपक्षी सदस्यों को इन विधेयकों में संशोधन रखने का भी अधिकार दिया गया। यह सब इसीलिए किया गया जिससे जनता द्वारा सत्ता व विपक्ष के सभी प्रतिनिधियों की राय शासन चलाने मंे समाहित हो सके। क्योंकि विपक्ष के सांसदों व विधायकों का चुनाव भी आम जनता अपने एक वोट के अधिकार से करती है और सत्ता पक्ष के विधायकों व सांसदों का भी अतः चुने हुए सदनों में सभी दलों व पक्ष विपक्ष के सदस्यों को एक समान अधिकार दिये गये। मगर हम देख रहे हैं कि आज इस प्रणाली को लागू हुए सात से अधिक दशक बीत जाने के बाद लोकसभा में सत्ता व विपक्ष के बीच गतिरोध बना हुआ है जिससे देश का यह सबसे बड़ा प्रत्यक्ष सदन चल नहीं पा रहा है।
एेसा स्वतन्त्र भारत में पहली बार हो रहा है कि लोकसभा में न तो विपक्ष के नेता को बोलने दिया जा रहा है और न ही सदन के नेता व प्रधानमन्त्री को। सत्ता और विपक्ष इस स्थिति को अपनी – अपनी राजनीतिक सुविधानुसार व्याख्यायित कर रहे हैं परन्तु देश वासियों तक जो सन्देश पहुंच रहा है वह बहुत गंभीर है। यह सन्देश यह है कि क्या भारत में संसदीय लोकतन्त्र असफल हो रहा है क्योंकि अब सत्ता व विपक्ष के मतभेद इस सीमा तक पहुंच गये हैं कि दोनों एक–दूसरे से वार्तालाप करने की मुद्रा में ही नहीं हैं। जबकि लोकतन्त्र का दूसरा अर्थ संवाद या वार्तालाप ही होता है। इस व्यवस्था में बड़ी से बड़ी समस्या का हल संवाद की मार्फत ही ढूंढ लिया जाता है।
स्वतन्त्र भारत के संसदीय इतिहास में एेसे कई मौके आये हैं जब संसद में गतिरोध की स्थिति पैदा हुई है परन्तु इस पर केवल संवाद की मार्फत ही पार पाने में यह देश सफल रहा है। संसदीय प्रणाली को सुचारू रखने के लिए ही केन्द्र की सरकार में पृथक रूप से संसदीय कार्यमन्त्री होते हैं जिनका मुख्य कार्य यही होता है कि जब संसद का सत्र चले तो सत्ता और विपक्षी सांसदों मंे सामंजस्य इस प्रकार बना रहे कि लोगों के मुद्दे व जनहित के मसलों पर सरकार व विपक्ष के बीच आमने –सामने सीधे बातीचत हो सके। जाहिर है कि संसद में यह बातचीत या वार्तालाप बहस के रूप में ही होती है और इसके लिए प्रत्येक सदन की अपनी नियमावली होती है। बहस इसी नियमावली के तहत होती है। मगर वर्तमान में संसद का बजट सत्र चल रहा है और लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बिना बहस कराये ही ध्वनिमत से पारित करा दिया जाता है। हालांकि इससे पहले 2004 मंे भी एेसा ही हुआ था जब केन्द्र मंे सत्ता बदल होकर डाॅ. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार का गठन हुआ था। फर्क सिर्फ यह था कि उस समय सदन में डॉ. मनमोहन सिंह सदन में जवाब देने के लिए खड़े हुए थे मगर विपक्ष ने उन्हें अपना भाषण पूरा करने नहीं दिया था। मगर इस बार तो विपक्ष की ओर से एेसी परिस्थितियों का निर्माण कर दिया गया कि प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जवाब देने सदन मंे आ ही नहीं सके लेकिन इससे पहले विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी के लिए भी सत्ता पक्ष ने विभिन्न नियमों का हवाला देकर एेसे हालात बना दिये कि वह अपना भाषण शुरू ही नहीं कर सके। संसद कभी भी जिद पकड़ लेने से नहीं चलती है। राहुल गांधी राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भारत -चीन के बीच पूर्व में हुए सैनिक संघर्ष पर बोलना चाहते थे और इस सन्दर्भ में अवकाश प्राप्त भारतीय थल सेना अध्यक्ष जनरल नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक के एक पत्रिका में प्रकाशित कुछ अंशों का हवाला देना चाहते थे। उन्हें सीधे इस पत्रिका के अंशों का हवाला देने की अनुमति लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने नहीं दी। वक्त का तकाजा था कि विपक्ष के सबसे बड़े नेता होने की वजह से राहुल गांधी कान घुमा कर पकड़ते और अपनी बात इस तरह कहते कि संसदीय नियम का पालन भी हो जाता और उनकी बात भी आ जाती।
इस बारे मंे लोकसभा के संसदीय इतिहास मंे विपक्षी नेताओं के सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हुए हैं। परन्तु एक जिद पकड़ लेने से संसद में जो गतिरोध पैदा हुआ वह अभी तक जारी है। दूसरी तरफ सरकार की ओर से भी राहुल गांधी के वक्तव्य के बारे में जरूरत से ज्यादा संजीदगी दिखाई गई। क्योंकि जनरल नरवणे स्वयं ही कई टीवी व अन्य साक्षात्कारों में कह चुके हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान चीन भारत की एक इंच भूमि पर भी कब्जा नहीं कर पाया। बेशक संसदीय प्रणाली में संसद चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार पर ही होती है और संसद पर पहला अधिकार विपक्ष का ही होता है मगर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि सत्तापक्ष केवल मूकदर्शक बनकर बैठा रहे। राष्ट्रपति के अभिभाषण मंे संशोधन प्रस्ताव लाने का अधिकार भी सदस्यों के पास रहता है और वे सरकार को सुझाव दे सकते हैं कि उनके विचार से अभिभाषण में और कौन- कौन से विषय जोड़े जा सकते थे। इसकी वजह यह है कि राष्ट्रपति पद पर बैठने के बाद किसी एक दल के व्यक्ति नहीं होते हालांकि उनका चुनाव दलगत आधार पर ही होता है मगर आसन ग्रहण करते ही वह ‘अराजनैतिक’ व्यक्ति हो जाते हैं और संसद के संरक्षक की भूमिका ले लेते हैं। देश के किसी भी राजनैतिक दल की चुनी हुई सरकार उनकी अपनी सरकार होती है अतः यह परंपरा रही है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित होता है। लेकिन हमारे सामने लोकसभा व राज्यसभा दोनों के उदाहरण है।
एक तरफ लोकसभा जहां ठप्प है वहीं दूसरी तरफ राज्यसभा मंे कामकाज सामान्य रूप से ही जारी रहा हालांकि विपक्ष ने इस सदन मंे राष्ट्रपति अभिभाषण पर प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिये गये भाषण का बायकाट किया। यदि राज्यसभा में एेसा न किया जाता तो इससे विपक्ष की साख पर कोई बट्टा नहीं लगता क्योंकि इस सदन के सभापति उपराष्ट्रपति होते हैं । लेकिन इस दौर में संसद में नये–नये उदाहरण प्रस्तुत हो रहे हैं जिनसे आम लोगों में निराशा पैदा हो सकती है। यह स्थिति लोकतन्त्र के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। इसे देख कर लगता है कि कहीं इस बार राष्ट्रीय बजट भी बिना बहस के ही लोकसभा में पारित न करना पड़े। 2004 मंे भी एेसा हो चुका है। फर्क सिर्फ यह था कि उस समय भाजपा विपक्ष में थी और इसके नेता श्री लालकृष्ण अडवाणी थे।

Team Desk