क्या है सिख की असल परिभाषा? - Latest News In Hindi, Breaking News In Hindi, ताजा ख़बरें, Daily News In Hindi

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क्या है सिख की असल परिभाषा?

सन् 1699 में जब गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिख पंथ की सिरजना की तो उन्होंने सिख के लिए जो मापदण्ड तय किये थे आज शायद बहुत कम सिख ऐसे होंगे जो उन पर पूरा उतरते हों अन्यथा ज्यादातर को तो सिखों की मर्यादा तक की जानकारी सही से नहीं होगी। गुरु गोबिन्द सिंह जी के द्वारा तैयार खालसा केवल सिर पर दस्तार सजाने, सिर और मुंह पर दाड़ी रखने से नहीं बनता। गुरु जी ने साफ कहा था ‘‘रहत प्यारी मुझको, सिख प्यार ना ही’’ भाव जो वेशभूषा से भले ही सिख दिखता हो पर अगर वह सिखी के मापदण्ड को पूरा नहीं करता, रहत मर्यादा का पालन नहीं करता तो वह सिख कहलाने के लायक ही नहीं है। सिख में सबसे पहले निम्रता, त्याग, बलिदान, दूसरों का मददगार, दूसरों के धन दौलत पर निगाह ना रखने वाला, अमृतपान करके नितनेम की बा​िणयांे का पाठ करने वाला, पराई स्त्री को मां-बहन-बेटी की नजर से देखने का नजरिया होना चाहिए जो शायद मुठ्ठी भर सिखांे में ही हो सकता हैं। यहां तक कि बहुत से जत्थेदार, धर्म गुरु, ग्रन्थी, प्रचारक, सेवादार भी ऐसे दिख जायंेगे जो इन पर पूरी तरह से स्वयं ही नहीं चलते तो वह दूसरों को क्या ही शिक्षा देते हैं और यह भी कहा जा सकता है कि इसलिए ही इनके द्वारा दी गई शिक्षा का शायद असर भी आम सिख पर नहीं होता। बहुत से ऐसे कीर्तनीए हैं जो खुलकर गुरबाणी बेचने की बात करते हैं। जब से धर्म में राजनीति हावी हुई है तब से सिखी का पैमाना दिन-प्रतिदिन गिरता चला जा रहा है। राजनीतिक लोगों को केवल अपनी राजनीति से मतलब होता है फिर भले ही धार्मिक कार्यों में कोई भी चूक हो जाए उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसका ताजा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला जब सोशल मी​िडया पर एक वीडियो वायरल हुई जिसमें साफ तौर पर देखा गया कि किसी राजनीतिक पार्टी के लोग गुरुद्वारा साहिब में नतमस्तक होने पहुंचे तो उनके ज्यादातर साथी बिना सिर ढके ही दिखाई दिये और उनके साथ एक सिख जो शायद उस गुरुद्वारा साहिब का कोई पदाधिकारी होगा या फिर राजनीतिक पार्टी का नुमाईंदा, उसने उन्हें मर्यादा समझाकर सिर ढकने को भी नहीं कहा। आज जब गुरुद्वारों में शादी ब्याह या उससे पहले होने वाले कार्यक्रम होते हैं और उनमें सिख युवा या महिला केशों की बेअदबी किये हुए होते हैं।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन इकबाल सिंह लालपुरा का कहना है कि 325 साल तो इसी तरह से बीत चुके हैं पर अगर हर सिख एक संकल्प कर ले कि आने वाले 25 साल बाद जब खालसा पंथ का 350वां स्थापना दिवस मनाएं तो उस समय वह पूर्ण गुरसिख बनकर मनाएं, उससे पहले अपने अन्दर की खामियों को समाप्त करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। गुरुद्वारा साहिब की कमेटियों में प्रबन्ध की बागडोर बिना किसी लोभ-लालच के उन्हें सौंपी जानी चाहिए जो वाक्य में ही इसके हकदार हों और सिखी के मापदण्ड को पूरा करते हों। जब प्रबन्धक सिख रहत मर्यादा का पालन करते होंगे तो भूलकर भी जत्थेदार, ग्रन्थी, सेवादार, प्रचारक की नियुक्ति में चूक नहीं कर सकते और जब सभी धार्मिक लोग सेवा भावना के साथ सिख रहत मर्यादा का पालन करते हुए अपनी ड्यूटी को निभायेंगे तो सिखी स्वयं ही प्रफुलित होती दिखेगी। समाजसेवी दविन्दरपाल सिंह पप्पू का मानना है कि आज सिखी की जो दुर्दशा हो रही है उसे देखकर बहुत दुख होता है। इसके लिए सभी को मिलकर अरदास करनी चाहिए कि परमात्मा हमंे आपसी प्यार बख्शे और हम मतभेद भुलाकर, प्रेम भाव के साथ गुरु साहिबान के दिखाए रास्ते पर चल सकें।
सिख के लिए दस्तार का महत्व
किसी भी सिख के सिर पर सजी दस्तार उसके लिए शरीर के अभिन्न अंग का स्थान रखती है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिख सजाते समय केशों की संभाल हेतु सिर पर पगड़ी बांधना अनिवार्य किया। हालांकि उस समय मुगल हकूमत का शासन था और किसी भी व्यक्ति को सिर पर कपड़ा रखने की सख्त मनाही हुआ करती थी। पगड़ी केवल राजा महाराजा ही पहना करते। गुरु साहिब ने इसी के चलते हर सिख को पगड़ी बांधकर राजा-महाराजा की तरह शान से जीने की प्रेरणा दी। सिखों के लिए पगड़ी का विशेष महत्व है और यह सिख के लिए स्वाभिमान का प्रतीक भी है। किसी शायर ने भी कहा है कि ‘‘टोपी भले ही सोने की क्यों ना हो पगड़ी के साथ कोई मुकाबला नहीं’’ हो सकता। मगर आज हालात यह बन चुके हैं कि ज्यादातर सिखों के बच्चे सिर पर पगड़ी के स्थान पर टोपियां पहनने लगे हैं और कुछ एक तो वह भी नहीं पहनकर नंगे सिर ही बाजारों में घूमते दिख जायेंगे और कुछ तो और भी दो कदम आगे चलकर आफिस, शादी ब्याह में भी ऐसे ही जाने लगे हैं। अब इसमें कमी माता पिता की कही जाएं या फिर धर्म के ठेकेदारों की जो बच्चों को दस्तार का महत्व ही नहीं समझा पाए। कुछ एक संस्थाएं हैं जो अपनी जिम्मेवारी को निभाते हुए समय-समय पर बच्चों में दस्तार के प्रति जागरुकता लाने हेतु कार्यक्रम करते रहते हैं। उन्हीं में से एक है सिख यूथ फाउंडेशन। संस्था के मुखी हरनीक सिंह व उनकी टीम के द्वारा बच्चों को रोजाना शाम को गुरुद्वारा राजौरी गार्डन में पंजाबी सिखलाई से लेकर, कीर्तन, गुरमत आदि की क्लासें दी जाती हैं और माह में एक बार दस्तार सिखलाई की भी क्लास होती है। इसके पीछे कमेटी के अध्यक्ष हरमनजीत सिंह, महासचिव मनजीत सिंह खन्ना का भी भरपूर सहयोग है जिनके कारण यह संभव हो पाया है। अगर सिख यूथ फाउंडेशन की तरह हर सिंह सभा गुरुद्वारा मंे इस तरह की क्लासें बच्चों को दी जाएं तो निश्चित तौर पर बच्चों में दस्तार के प्रति जागरुकता आएगी और जब उन्हें दस्तार का महत्व पता चल जायेगा तो वह भूलकर भी दस्तार के स्थान पर टोपी नहीं पहन सकते।
भागसर के खुले भाग्य
राजस्थान के श्री गंगानगर के पास एक छोटा सा गांव है भागसर। पूरे गांव में एक ही सिख परिवार का निवास है और उनके द्वारा ही गांव में गुरुद्वारा सुशोभित कर गुरु महाराज का प्रकाश किया जाता है। इस परिवार के अलावा पूरे गांव में कोई भी पगड़ीधारी दिखाई ही नहीं देता। बीते दिनों सनातन धर्म से सिख धर्म में प्रवेश कर गुरु तेग बहादुर जी और सिखी का प्रचार देश ही नहीं यूरोप के देशों में भी करने वाली अनुराधा कौर खालसा जब इस गांव में पहुंची और गुरु तेग बहादुर जी और साहिबजादों की लासानी शहादत की दास्तान जब गांव वासियों को बताई तो उनके प्रचार से प्रभावित होकर 82 के करीब लोग जिनमें महिलाओं  की गिनती अधिक थी स्वयं आगे आकर अमृतपान करने को तैयार हो गई। इतना ही नहीं इसकी वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो भिवानी के भी कुछ गैर सिख परिवार सिख सजने को तैयार हो गये हैं। अब सवाल यह बनता है कि जो काम अनुराधा कौर खालसा बिना किसी संसाधन या कमेटी के कर सकती हैं तो करोड़ों रुपये धर्म प्रचार पर खर्च करने वाली कमेटियां आज तक क्यों नहीं कर पाई या यह कहा जाए कि उनका वास्तव में इस ओर ध्यान हीं नहीं है। देश के अनेक शहरों में शिरोम​िण गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी ने बकायदा प्रचार के लिए सैन्टर बनाकर प्रचारक नियुक्ति किये हुए हैं, जिन्हें लाखों रुपये बकायदा तनख्वाह दी जाती है। फिर भी ऐसे परिणाम क्यों नहीं निकलकर आए। इस पर विचार करने की आवश्यकता है पर जो भी हो अनुराधा कौर खालसा की बदौलत ही सही भागसर गांव के भाग्य खुल गये और वह परिवार जो सिखी से पूरी तरह अंजान थे आज पूर्ण सिख मर्यादा के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जो संस्थाएं वाक्य में ही सिखी का प्रचार करने की सोच रखती हैं उन्हें इस महिला वकील की मदद लेकर प्रचार को बढ़ाना चाहिए ताकि भागसर वालों की तरह देश के अन्य लोगों के भी भाग्य खुल सकें।

– सुदीप सिंह

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