मध्य पूर्व एशिया में इस युद्ध को समाप्त करने की पहल के संबंध में “एमनेस्टी इंटरनेशनल” व अन्य शांतिप्रिय नेताओं ने भारतीय प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई है कि वे आगे आएं और अमेरिका, इजराइल व ईरान पर दबाव बनाएं और शांति की पहल करें।
जहां दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ी है, वहीं आज तक लोगों की समझ में यह नहीं आया कि आखिर इस युद्ध को ईरान पर क्यों थोपा गया। हाल ही में, जिस प्रकार से अमेरिका ने ईरान के सबसे बड़े तेल भंडारण, अर्थात् खार्ग टापू पर हमला करके उसके हॉर्मुज जलडमरू पर क़ब्ज़ा करने की बात कही है और सात देशों से अपनी नौसेना भेजने को कहा है, उससे इस ज्वलंत युद्ध के रुकने के कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं! ईरान पर, खाड़ी के जहाजों पर हमला करने का आरोप लगा है, जिससे “होर्मुज जल-डमरू-मध्य” को प्रभावी रूप से बंद करने की नौबत आ गई है। यह एक अहम रास्ता है जिससे दुनिया की लगभग 20% तेल और गैस की आपूर्ति होती है। ओमान के दुक्म कमर्शियल बंदरगाह व एमिरात के फुजैराह टर्मिनल सहित प्रमुख तेल व गैस केंद्रों पर हमले हुए हैं। “एलएनजी” (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) सुविधाएं, तेल व गैस की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था व जीवन-यापन की लागत पर पड़ने वाले असर के बारे में चेतावनियां जारी की गई हैं। पिछले दिनों सैन्य विशेषज्ञाें ने कुछ बड़े ही डरावने विचार व्यक्त किए, जिनमें ट्रंप और नेतन्याहू की ओर से बात आई कि वे ईरान के ऊपर एटम बम दागने की धमकी दी है। गैस के अभाव में लिप्त देश और मानवतावादी लोग पूछ रहे हैं कि आखिर जब उसके पास एटम बम नहीं है तो इज़राइल ने ईरान पर हमला क्यों किया और यह युद्ध कब समाप्त होगा?अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू करने के उपरांत 28 फरवरी, 2026 को ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता, अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के साथ, पूरे मध्य-पूर्व में संघर्ष शुरू हो गया है। ईरान ने इज़राइल व खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों पर हमले की जवाबी कार्रवाई जारी रखी है। ये हमले अब दोनों ओर से गैर-सैन्य लक्ष्यों तक फैल गए हैं, जिनमें नागरिक स्थल व ऊर्जा संयंत्र शामिल हैं। अमेरिका-इज़राइल ने ईरान पर हमला किया था, जिसमें उन्होंने राजधानी तेहरान व पूरे देश में ईरानी मिसाइल के बुनियादी ढांचे, सैन्य ठिकानों व नेतृत्व को निशाना बनाया है। ईरान के सर्वोच्च नेता, अयातुल्ला अली खामेनेई, जो 1989 से देश का नेतृत्व कर रहे थे, हमलों की पहली लहर के दौरान शहीद कर दिए गए। इज़राइली सेना ने बताया कि इस्लामिक आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के दर्जनों वरिष्ठ अधिकारी मारे गए। खामेनेई की मृत्यु के बाद उनके बेटे, मोजतबा खामेनेई को उनका उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया, जिनके बारे में भी अटकलें हैं कि पता नहीं, जीवित हैं या नहीं। 13 मार्च को अमेरिकी रक्षा सचिव, पीट हेगसेथ ने कहा कि नए हमलों में मोजतबा खामेनेई “घायल हो गए हैं, टांगों से मजबूर हो गए व संभवतः उनका चेहरा बिगड़ गया है”। उन्होंने इशारा किया कि हाल के हफ्तों में वे सार्वजनिक रूप से देखाई नहीं दिए। तेहरान ने हेगसेथ के दावे को खारिज कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने कहा कि “नए सर्वोच्च नेता के साथ कोई समस्या नहीं है”। ऐसा ही उन्होंने आयतुल्लाह खामेनेई के ऊपर जान लेवा हमले के बाद कहा था, मगर वे बाद में मृत घोषित किए गए। अमेरिका-इज़राइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े प्रमुख स्थलों को निशाना बनाना जारी रखा है। यह भी समझ से बाहर है कि जब पिछले वर्ष अमेरिका ने ईरान पर भयंकर हमला कर उसके एटमी कारखानों को पूर्ण रूप से ध्वस्त करने की बात कही थी और ईरान का मानना था कि वह एटम बम बना ही नहीं रहे तो अब उसपर ताबड़तोड़ हमले क्यों, जिनमें हजारों बेगुनाह ईरानी शहरी मारे गए, जिन में एक प्राइमरी स्कूल की बच्चियां भी हैं? ईरान ने कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है। हाल के दिनों में इन दोनों ने ईरानी तेल रिफाइनरियों पर हमले तेज़ किए हैं। अमेरिका ने खार्ग द्वीप पर ध्यान केंद्रित किया, जहां एक बड़ा टर्मिनल है जिसे ईरान की “आर्थिक जीवनरेखा” माना जाता है। अमेरिका स्थित समूह “ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स इन ईरान” ने बताया कि ईरान में 3,040 लोग मारे गए हैं, जिनमें 1,122 सैन्यकर्मी व 1,319 नागरिक शामिल हैं, जिनमें 206 बच्चे थे। 599 अन्य मौतें “अवर्गीकृत नागरिक व सैन्य” थीं। अभी संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत ने कहा कि 1,300 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं। ईरान ने अमेरिका-इज़राइल पर 28 फरवरी को दक्षिणी ईरान में आईआरजीसी बेस के पास एक लड़कियों के स्कूल पर हमला करने का आरोप लगाया और कहा कि लगभग 110 बच्चों सहित 168 लोग मारे गए। अमेरिका ने कहा कि वह इस घटना की जांच कर रहा है, जबकि इज़राइल ने कहा कि उसे उस इलाके में किसी भी सैन्य अभियान की जानकारी नहीं है। विशेषज्ञों के वीडियो विश्लेषण से पता चलता है कि एक अमेरिकी “टॉमहॉक मिसाइल” स्कूल के पास एक सैन्य अड्डे पर गिरी थी, व बीबीसी की रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि की है। रक्षा सचिव पीट हेगसेथ को अब डेमोक्रेट्स की ओर से अमेरिका की संभावित संलिप्तता को लेकर सवालों का सामना करना पड़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों के लिए ईरान में पहुंच सीमित है व देश में इंटरनेट कनेक्टिविटी पूरी तरह से प्रतिबंधित है। अपने क्षेत्र के बाहर, 4 मार्च को श्रीलंका के तट के पास हिंद महासागर में एक अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा, एक ईरानी युद्धपोत को डुबो दिया गया था। इसमें कम से कम 87 लोग मारे गए थे। ईरानी स्कूल के पास मौजूद मिलिट्री बेस पर मिसाइल गिरी। वीडियो एनालिसिस से पता चला कि “रात दिन में बदल गई।” तेहरान की तेल सुविधाओं पर हवाई हमलों की वजह से “काली बारिश” हो रही है। ईरान ने इज़रायल के हमलों को “बिना किसी उकसावे के, गैर-कानूनी व नाजायज़” बताया है व इसके जवाब में बड़े पैमाने पर मिसाइल हमले किए हैं। 15 मार्च तक, इज़रायली अधिकारियों ने बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद से मिसाइल हमलों में 12 नागरिक मारे गए हैं। जिन देशों में भी हमले हुए हैं वहां अमेरिकी मिलिट्री बेस हैं, कतर, बहरीन, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात व कुवैत। 14 मार्च तक, अमरीकन सेना के 13 जवान मारे जा चुके थे। ईरान पर आरोप है कि उसने अपने हमलों का दायरा दूसरे लक्ष्यों तक बढ़ा दिया है, जिनमें तेल सुविधाएं, जहाज़ व आम नागरिकों से जुड़े स्थान हैं, जैसे दुबई के होटल शामिल हैं। उत्तरी इराक में एक कुर्द मिलिट्री बेस पर ड्रोन हमले में एक फ्रांसीसी सैनिक मारा गया। इराक में ही पीएमएफ (“पॉपुलर मोबिलाइज़ेशन फोर्सेज”), जिसे पिछले दशक में ‘इस्लामिक स्टेट समूह’ से लड़ने के लिए बनाया गया था, बताया कि उसके 27 सदस्य मारे गए हैं। ईरान-इराक में “इस्लामिक प्रतिरोध’ आईआरआई के बैनर तले काम करने वाले मिलिशिया, आतंकी समूहों का समर्थन करता है, जो “पीएमएफ” का हिस्सा हैं। अंततः यह कहा जा सकता है, कि यह युद्ध अंतर्राष्ट्रीय हो गया है और इसे तृतीय विश्व युद्ध के रूप में देखा जा रहा है। एक ओर विश्व को “ग्लोबल विलेज” व “वसुदेव कुटुम्बकम” का आह्वान है व दूसरी ओर अमेरिका-इज़राइल, दूसरे देशों के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पना चाहते हैं। किसी भी प्रकार से युद्ध समाप्त होना अनिवार्य है। सभी देशों को नागरिक सुरक्षा व अपने देश को अन्य देशों से बचाने का प्रयास करना चाहिए।






















