एक युद्ध यह भी

Summary :

पूरी दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध की ओर लगा हुआ है। खबरिया चैनल दिनभर अमेरिका, इजराइल और ईरान के मध्य हमलों के वार-पलटवार की ब्रेकिंग न्यूज चलाते रहते हैं। युद्ध की आंच घरों की रसोई तक पहुंचने की आशंका मात्र से ही आम आदमी भी तनाव में है लेकिन दक्षिण एशिया में भारत के दो पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी युद्ध चल रहा है लेकिन उस पर किसी का ध्यान नहीं है। दोनों पड़ोसी देशों में तनाव 21 फरवरी से ही बढ़ा हुआ है। जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में हमले कर…

पूरी दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध की ओर लगा हुआ है। खबरिया चैनल दिनभर अमेरिका, इजराइल और ईरान के मध्य हमलों के वार-पलटवार की ब्रेकिंग न्यूज चलाते रहते हैं। युद्ध की आंच घरों की रसोई तक पहुंचने की आशंका मात्र से ही आम आदमी भी तनाव में है लेकिन दक्षिण एशिया में भारत के दो पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी युद्ध चल रहा है लेकिन उस पर किसी का ध्यान नहीं है। दोनों पड़ोसी देशों में तनाव 21 फरवरी से ही बढ़ा हुआ है। जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में हमले कर तालिबान से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया था। पाकिस्तान के हवाई हमलों के बाद अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार ने भी जवाबी कार्रवाई की थी। इसके बाद दोनों देशों की सीमा पर लगातार झड़पें, ड्रोन हमले और गोलाबारी की घटनाएं हो रही हैं। इस युद्ध में पिछले 48 घंटों में लगभग 300 रॉकेट दागे गए हैं। पाकिस्तानी हमलों के जवाब में बेगुनाह अफगानिस्तानी नागरिक मारे जाने के बाद तालिबान ने पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ड्रोन हमले कर 14 पाकिस्तानी सैनिक मार डाले। पाकिस्तान और तालिबान कभी एक-दूसरे के सहयोगी रहे हैं लेकिन अब दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं। दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सम्पत्तियों जिनमें टैंक, हथियार और चौकियां श​ामिल हैं, को नुक्सान पहुंचा रहे हैं। तालिबान के उदय में पाकिस्तान की बहुत बड़ी भूमिका रही है। तालिबान-पाकिस्तान संबंधों की जड़ें शीतयुद्ध के उत्तरार्ध में जाती हैं, जब पाकिस्तान ने अमेरिका और सऊदी अरब के समर्थन से अफगानिस्तान पर सोवियत कब्जे का विरोध करने के लिए मुजाहिदीन लड़ाकों को हथियारबंद करने और उन्हें ट्रेनिंग देने में भूमिका निभाई थी। तब पाकिस्तान की खुफिया एजैंसी आईएसआई ने अफगान मामलों में अपनी भागीदारी को और गहरा किया जिससे आतंकवादी नेटवर्क को बढ़ावा मिला और तालिबान पूरी तरह से विकसित हुआ। पाकिस्तान ने आतंकवाद की खेती कर जो बोया था आज उसी को काट रहा है।
जब 1990 के दशक के मध्य में तालिबान पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों के मदरसों से उभरा तो पाकिस्तान ने ही उसे राजनीतिक मान्यता, सैन्य समर्थन और रसद संबंधी सहायता प्रदान की। इस्लामाबाद तालिबान को अफगानिस्तान में “रणनीतिक गहराई” हासिल करने के लिए एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में देखता था।
यह भारतीय प्रभाव का मुकाबला करने के उद्देश्य से बनाया गया एक पुराना सैन्य सिद्धांत था। दो दशकों से अधिक समय तक तालिबान ने पाकिस्तान को क्षेत्रीय राजनीति में मजबूती प्रदान की, जिसमें आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी युद्ध का दौर भी शामिल है, जब इस्लामाबाद ने एक जटिल दोहरा खेल खेला, सार्वजनिक रूप से अमेरिकी अभियानों का समर्थन करते हुए मुल्ला उमर और बाद में हैबतुल्लाह अखंदजादा जैसे तालिबान नेताओं को शरण दी
2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। पाकिस्तान लंबे समय से तालिबान को अफगान राजनीति में शामिल करने के लिए पैरवी कर रहा था, इस उम्मीद में कि काबुल में एक मित्रवत शासन सीमा पर स्थिरता लाएगा और उसे भारत का मुकाबला करने के लिए अधिक मजबूती प्रदान करेगा लेकिन इसके बजाय जो हुआ वह पाकिस्तान की उम्मीदों के विपरीत था। सत्ता में आने के बाद तालिबान ने अपनी स्वतंत्रता का दावा करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में काम करने के बजाय, तालिबान नेतृत्व ने राष्ट्रवादी भावना प्रदर्शित की और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) जैसे घातक आतंकवादी समूहों पर कार्रवाई करने से इन्कार कर दिया, जो पाकिस्तानी धरती पर हमलों के लिए जिम्मेदार थे। इस्लामाबाद को तालिबान से टीटीपी की गतिविधियों पर अंकुश लगाने की उम्मीद थी लेकिन तालिबान ने वैचारिक और जनजातीय संबंधों के कारण टीटीपी लड़ाकों को पनाह दी। टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई करने से इन्कार करना पहला बड़ा मतभेद बन गया लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा यह था कि तालिबान अब पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में काम करने से इन्कार कर रहा था और एक स्वतंत्र,संप्रभु शक्ति के रूप में उभरना चाहता था,जो पाकिस्तान के लिए एक नया अनुभव था। ता​लिबान ने पाकिस्तान की तुलना में भारत के साथ गहरे संबंध बनाना बेहतर समझा। अफगानिस्तान पर जब-जब संकट आया, चाहे प्राकृतिक आपदाएं हों, भोजन संकट हो या फिर महामारी, भारत ने गर्मजोशी के साथ अफगानिस्तान की सहायता की। भारत ने अफगानिस्तान के नवसृजन में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उनकी संसद, सड़कें, पुल और रेलवे नेटवर्क परियोजनाएं भी भारत ने ही बना कर दी हैं। जब अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्तान में मौजूद थीं तब अमेरिका विरोधी तालिबान समूहों को पाकिस्तान ने शरण दी और तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) को जमकर संरक्षण दिया। अफगानिस्तान आैर तालिबान दोनों ही अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा निर्धारित करने वाली डूरंड लाइन को स्वीकार नहीं करते। उनका तर्क है कि पख्तून बहुल क्षेत्र विभाजित करने वाली यह रेखा तर्कहीन आैर बेतुकी है। दोनों देशों के बीच अविश्वास का भाव मौजूद है। पाकिस्तानी सेना के अध्यक्ष जनरल मुन​ीर समझते रहे कि अफगानिस्तान के पास न वायु शक्ति है और न ही सैन्य ताकत।
उन्होंने तालिबान को बहुत हल्के में लिया। मुनीर यह भूल गए कि तालिबान की खासियत गुरिल्ला युद्ध की रणनीति और दशकों से कई मोर्चों पर युद्ध लड़ने का अनुभव है। पाकिस्तान ने अवैध अफगान प्रवासियों के खिलाफ बदले की कार्रवाई शुरू की और उन्हें निकालना शुरू किया तो तनाव बढ़ गया। जहां तक भारत का स्टैंड है भारत ने अफगानिस्तान पर हमलों को लेकर पाकिस्तान को खूब खरी-खोटी सुनाई है। भारत स्वतंत्र और अखंड अफगानिस्तान के पक्ष में है और उसने साफ कहा है कि अफगानिस्तान की क्षेत्रीय अखंडता का पूरी तरह से सम्मान किया जाना चा​हिए। पाकिस्तान और तालिबान में एक गुप्ता अघोषित गठबंधन था वह अब खुली शत्रुता में बदल गया। भारत के लिए पाक-अफगान युद्ध जोखिम भरा भी है। पाकिस्तान की कार्रवाई नई दिल्ली के साथ तालिबान के बढ़ते संबंधों को रोकने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
तालिबान के लिए पाकिस्तान अब वह अपरिहार्य सहयोगी नहीं रहा जो कभी था। पाकिस्तान के लिए तालिबान अब वह लचीला प्रॉक्सी नहीं रहा जिसे उसने पाला पोसा था। हालांकि तालिबान पाकिस्तान के साथ संघर्ष में कभी भी हावी नहीं हो सकता लेकिन वे लगातार परेशानी का सबब बन सकते हैं। पाकिस्तान को अपने कुछ सैन्य और खुफिया संसाधनों को भारत के साथ अपनी सीमा से हटाना पड़ सकता है। तालिबान के साथ झड़पें ऐसे समय में हो रही हैं जब पाकिस्तान बलूचिस्तान और पीओके में बढ़ती अशांति से जूझ रहा है। इन सभी कारकों से पाकिस्तान की सैन्य और खुफिया क्षमताओं पर दबाव पड़ सकता है। तालिबान-पाकिस्तान संघर्ष ट्रंप की पाकिस्तान से खनिज निकालने की योजना के लिए भी अच्छे संकेत नहीं हैं। लगातार अशांति के कारण यह योजना अव्यावहारिक या लागू करने में कठिन हो जाएगी।

Aditya Chopra

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