कहां जा रहे हैं हमारे मुस्लिम विश्वविद्यालय!

Summary :

एक समय था कि भारत के मुस्लिम विश्वविद्यालयों की देश, विदेश में ज़बरदस्त धाक थी, बड़े-बड़े विद्वान व विदूषी, खेलकूद की दुनिया के बड़े नाम, अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में भारत का नाम रौशन करने वाले यहां से शिक्षित होकर जाया करते थे। चाहे वह एएमयू (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) हो, जामिया मि​िलया इस्लामिया हो या उस्मानिया यूनिवर्सिटी हो व मौलाना आज़ाद नैशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हो। आज के दौर में इन सभी शिक्षा संस्थाओं का निरंतर पतन हो रहा है। इन संस्थाओं से निकले भारत और विश्व को गौरवान्वित करने वाले कुछ नाम हैं: भारत रत्न डा. जाकिर हुसैन (भारतीय…

एक समय था कि भारत के मुस्लिम विश्वविद्यालयों की देश, विदेश में ज़बरदस्त धाक थी, बड़े-बड़े विद्वान व विदूषी, खेलकूद की दुनिया के बड़े नाम, अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में भारत का नाम रौशन करने वाले यहां से शिक्षित होकर जाया करते थे। चाहे वह एएमयू (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) हो, जामिया मि​िलया इस्लामिया हो या उस्मानिया यूनिवर्सिटी हो व मौलाना आज़ाद नैशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हो। आज के दौर में इन सभी शिक्षा संस्थाओं का निरंतर पतन हो रहा है।
इन संस्थाओं से निकले भारत और विश्व को गौरवान्वित करने वाले कुछ नाम हैं: भारत रत्न डा. जाकिर हुसैन (भारतीय राष्ट्रपति), लियाकत अली खान (प्रथम पाकिस्तानी राष्ट्रपति), एयर वाइस मार्शल अय्यूब खान (पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति), पी.वी. नरसिंह राव (पूर्व प्रधानमंत्री), जयपाल रेड्डी (पूर्व मंत्री), आरिफ़ मुहम्मद खान (बिहार राज्यपाल), भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान (पश्तून नेता), अनवारा तैमूर (पूर्व असम मुख्यमंत्री), सआदत हसन मंटो, इस्मत चुगताई (उपन्यासकार), जांनिसार अख्तर जावेद अख्तर, शाहरुख खान, रौशन अब्बास (फिल्म जगत), मेजर ध्यान चंद, लाला अमरनाथ, वीरेंद्र सहवाग, जफर इकबाल (खेल जगत) एस. वाई. कुरैशी (पूर्व इलेक्शन कमिश्नर), डा. ख्वाजा इफ्तेखार अहमद (भारतीय अन्तर्धार्म सद्भाव संगठन), अंजना ओम कश्यप (पत्रकारिता), डायना हेडन (पूर्व विश्व सुंदरी) आदि, मगर अब इस प्रकार की हस्तियां कम ही दिखती हैं। हाल ही में एएमयू में कुछ ऐसी घटना घटी जिससे सभी शर्मसार हुए। यहां की एक प्रोफेसर के साथ कथित धार्मिक भेदभाव को लेकर शिक्षा मंत्री को एक पत्र लिखा गया। एक हिंदू प्रोफेसर, रचना कौशल के साथ दशकों तक उत्पीड़न और भेदभाव का आरोप लगाया गया है कि यूनिवर्सिटी के एक वरिष्ठ अकादमिक अधिकारी ने कथित तौर पर उनसे कहा, “तुम हिंदू हो, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जाओ।” यह एक ऐसी टिप्पणी है, जो भारत जैसे बहु-धार्मिक, संवैधानिक लोकतंत्र में बेहद सांप्रदायिक और पूरी तरह से अस्वीकार्य है। इसके लिए केंद्रीय जांच की मांग की गई है और उदासीनता का आरोप भी है, जहां तक राष्ट्रीय भावना को ठेस पहुंचाने की बात है तो आज तक यहां भारत का विभाजन करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना का पोर्ट्रेट अभी भी स्थापित है, जिसे 15 अगस्त, 1947 को ही नोच फेंकना चाहिए था। प्रोफेसर कौशल, जो 1998 से एएमयू में पॉलिटिकल साइंस की टीचर हैं और एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त शिक्षाविद हैं, लगातार निराधार आरोपों, धमकियों और संस्थागत दुश्मनी का सामना करती चली आई हैं।
पिछले साल सितंबर से वाइस-चांसलर, नईमा गुलरेज़ खातून से बार-बार शिकायत करने के बावजूद कोई सार्थक या सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई है, बल्कि मामले को दबा दिया गया। वर्तमान कुलपति महोदया के कार्यकाल के दौरान यूनिवर्सिटी में तीन जघन्य हत्याएं हुई हैं जिससे छात्रों और कर्मचारियों के बीच डर और असुरक्षा का माहौल बन गया है।
ऐसे घटनाक्रम नेतृत्व और शासन की गंभीर विफलता को दर्शाते हैं और संस्थान की अकादमिक और नैतिक स्थिति को गंभीर रूप से नुक्सान पहुंचाते हैं, जो इसके संस्थापक सर सैयद अहमद खान के दृष्टिकोण के साथ विश्वासघात है, ऐसे दूषित वातावरण में न्यू एजुकेशन पॉलिसी को कार्यान्वित करना लगभग असंभव है। प्रोफेसर रचना कौशल के मामले में हाल ही में गठित दो सदस्यीय समिति को एक “दिखावटी” और “आंखों में धूल झोंकने वाला” कदम माना गया है। विश्वविद्यालय पर आरोप है कि आईडीसी और आईसीसी जैसी आंतरिक समितियां न्याय देने में बार-बार विफल रही हैं और कई मामलों में पीड़ितों के बजाय अपराधियों का पक्ष लिया है। इस संदर्भ में शिक्षा मंत्रालय से एक स्वतंत्र तीन या पांच सदस्यीय जांच समिति गठित करने का आग्रह किया है जिसमें अधिकतर बाहर के सदस्य होने की बात कही गई है ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके और न्याय प्रक्रिया में विश्वास बहाल किया जा सके। इन परिस्थितियों में कुलपति महोदया को विश्वविद्यालय को बख्शना चाहिए, क्योंकि उनसे बेहतर विकल्प मौजूद हैं। इसी प्रकार से जामिया मि​िलया इस्लामिया विश्विद्यालय में भी आए दिन सांप्रदायिक समस्याएं होती रहती हैं। कई बार यहां पर विद्यार्थियों को दीपावली जैसे पर्व को मनाने की इजाज़त नहीं दी जाती, उनको इसकी बाउंड्री के बाहर दीपावली मनानी पड़ती है, जो भारत की सर्वधर्म के सद्भाव की परंपरा के बिल्कुल विपरीत है, हालांकि किसी भी विश्वविद्यालय का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता, मगर जब इसके परिसर में एक मस्जिद है तो यहां एक मंदिर, गुरुद्वारा और चर्च भी होना चाहिए। एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि इसके अल्पसंख्यक स्टेटस के कारण यहां प्रायः ग़ैर मुस्लिमों के दाखिलों के साथ बेईमानी और धांधली की जाती है। इससे यहां वास्तव में अल्पसंख्यक छात्रों के साथ अन्याय है, क्योंकि ये बहुसंख्यक वर्ग के विद्यार्थियों से महरूम रहते हैं, जिसके कारण जहां वे उनसे बहुत कुछ सीख सकते थे उससे वंचित रह जाते हैं। इसके अतिरिक्त यहां के कुलपति ने बिना किसी कारण के या “लिलल्लाही बुग्स” (बेवजह नफ़रत) के कारण एंट्री बंद कर रखी है। इनको इस बात का भी डर है कि अंदर आने पर सभी लोग लेखक को यहां की अनियमितताओं के बारे में बताएंगे को उनकी गद्दी खतरे में पड़ सकती है। जहां तक मानू (मौलाना आज़ाद नैशनल उर्दू यूनिवर्सिटी) का प्रश्न है, उसमें भी अनियमितताओं की झड़ी सी लगी है। आजकल वहां 200 में से 50 एकड़ भूमि का पचड़ा चल रहा है। मानू में छात्राओं के यौन शोषण और सरकारी फंडों के डकारने की शिकायतें भी होती रही हैं, मगर विश्वविद्यालय के सरकारी दफ्तरों में प्रगाढ़ “गिव एंड टेक” सम्बन्धाें के कारण कोई एक्शन नहीं होता है। इसे तुरंत रुकना चाहिए, वर्ना देश का भविष्य और भावी पीढ़ियां बर्बाद होती रहेंगी।

Team Desk