कौन होगा उत्तराखंड का नया सीएम?

Summary :

‘मैं चला भी गया तो ऐ दुनिया वालों तुझे मेरी खुलुस कम न होगी यह उखड़ती-टूटती सांसें मुझसे बिछड़ कर भी बस तेरी ही रहेंगी’ दिसंबर की ठिठुरती सर्दी में उत्तराखंड की सर्द सियासत यकबयक ‘अंकिता भंडारी हत्याकांड’ जैसे बिसरा दिए गए मामले से फिर से सुलग पड़ी है। इस मामले से जुड़ा रोज एक नया ऑडियो क्लिप वायरल हो रहा है जिसकी जद में सत्ता पक्ष के कई बड़े नेता आ गए हैं। नैतिकता व शुचिता की दुहाई देने वाली इस सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के समक्ष ‘फेस सेविंग’ का संकट उत्पन्न हो गया है, उत्तराखंड सकते में है…

‘मैं चला भी गया तो ऐ दुनिया वालों तुझे मेरी खुलुस कम न होगी
यह उखड़ती-टूटती सांसें मुझसे बिछड़ कर भी बस तेरी ही रहेंगी’

दिसंबर की ठिठुरती सर्दी में उत्तराखंड की सर्द सियासत यकबयक ‘अंकिता भंडारी हत्याकांड’ जैसे बिसरा दिए गए मामले से फिर से सुलग पड़ी है। इस मामले से जुड़ा रोज एक नया ऑडियो क्लिप वायरल हो रहा है जिसकी जद में सत्ता पक्ष के कई बड़े नेता आ गए हैं। नैतिकता व शुचिता की दुहाई देने वाली इस सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के समक्ष ‘फेस सेविंग’ का संकट उत्पन्न हो गया है, उत्तराखंड सकते में है और युवाओं का गुस्सा सैलाब बनकर कभी भी सड़क पर फूट सकता है। उत्तराखंड भाजपा की गुटबाजी भी खुलकर सतह पर आ गई है, वायरल ऑडियो मामले से एक बड़ा नाम जो सामने आया है, वह नाम है भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम का जो इत्तफाक से उत्तराखंड के भाजपा प्रभारी हैं। दुष्यंत गौतम से मुख्यमंत्री धामी की गहरी छनती है, एक यह वजह भी है कि धामी को गाहे-बगाहे हर बार हर विषम परिस्थितियों में हाईकमान से अभयदान मिलता रहा है, अगर इस बार आला कमान ने मंतव्य दिखाया तो फिर तो धामी की रुखसती पक्की समझिए। कथित तौर पर उनके विकल्प तलाशने भी शुरू कर दिए हैं। इस वक्त इस रेस में राज्य विधानसभा स्पीकर रितु खंडूरी का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है, सूत्रों की मानें तो इस नाम को भाजपा के संगठन महासचिव बीएल संतोष का वरदहस्त प्राप्त है। रेस में दूसरा नाम राज्य सरकार में मंत्री और विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा का है। हर बार की तरह इस बार भी भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी भी अपना नाम हौले से आगे बढ़ा रहे हैं, पर वे भाजपा शीर्ष को शायद ही उतने पसंद आएं, क्योंकि मुख्यमंत्री पद के कई और दावेदारों ने भी अभी से दिल्ली की परिक्रमा शुरू कर दी है, पर यह भी मुमकिन है कि आखिरी वक्त पर भाजपा हाईकमान अपने झोले में से कोई अजूबा नाम ही निकाल लाए, जिनके बारे में आपने न सोचा हो या न जाना हो।
कब बनेगी नितिन की ‘टीम नबीन’?
अब तक यह दावा हो रहा था कि भाजपा के नए नवेले राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन संघ के नंबर दो दत्तात्रेय होसाबोले के बेहद करीबियों में शुमार हैं, पर अभी संघ की ओर से यह स्पष्टीकरण आ गया है कि अध्यक्ष का चुनाव भाजपा का अपना निजी फैसला है, इसमें संघ कोई दखल देना उचित नहीं समझता। या यूं कहिए कि संघ ने एक तरह से इस पूरे मामले से सुविचारित तरीके से पल्ला झाड़ लिया है। अब सवाल उठता है कि नबीन अपनी नई टीम की घोषणा कब तक करेंगे? तो भाजपा से जुड़े सूत्रों का दावा है कि नितिन नबीन की नई टीम की घोषणा शायद बंगाल चुनाव के बाद हो। भाजपा आलाकमान की यह सोच हो सकती है कि पार्टी के तमाम नेता बंगाल चुनाव में जी-जान लगा देंगे ताकि उन्हें संगठन में एडजस्ट किए जाने की उम्मीद बनी रहे। यह भी कहा जा रहा है कि नबीन की यह नई टीम एकदम से नई होगी, नए चेहरों से लैस, अपेक्षाकृत युवा ताकि भाजपा में एक जेनरेशन चेंज के शिगूफे को और हवा दिया जा सके। सो, कयास लग रहे हैं कि नबीन की टीम के 80 से 90 फीसदी चेहरे नए और फ्रेश होंगे। भाजपा संविधान में भी राष्ट्रीय महासचिवों के लिए अधिकतम 8 साल की मियाद तय की गई है, इसके ज्यादातर महासचिव इस तय सीमा को पहले ही पार चुके हैं और हां 2029 का लोकसभा चुनाव भी संभवतः नबीन की यही नई टीम लड़ाएगी। सो इसमें शामिल किए जाने वाले हर चेहरे की ठीक तरह से शिनाख्त की जाएगी। सूत्रों का दावा है कि नबीन की नई टीम में नई दिल्ली की सांसद बांसुरी स्वराज को खास तवज्जो मिल सकती है, उन्हें अनिल बलूनी की जगह भाजपा का राष्ट्रीय प्रवक्ता और मीडिया प्रभारी बनाया जा सकता है।
कौन है यह बिहार का पावर ब्रोकर रिशुश्री?
बिहार में इन दिनों एक युवा पावर ब्रोकर और लगभग 2 हजार करोड़ के कथित टेंडर घोटाले का आरोपी रिशुश्री उर्फ रिशु रंजन सिन्हा का नाम खूब सुर्खियों की सवारी गांठ रहा है। रिशुश्री को बिहार की आईएएस लॉबी के बेहद करीबी बताया जाता है, बिहार के कई सीनियर आईएएस से उनके बेहद करीबी रिश्ते बताए जाते हैं। वे आईएएस लॉबी को उपकृत करने के लिए पटना से लगे हाजीपुर में एक आईएएस कॉलोनी भी बसा रहे हैं, कई रिटायर्ड आईएएस अफसरों ने उस कॉलोनी में अपने लिए प्लॉट भी बुक कराए हैं, जब मनी लांड्रिंग के आरोप में बिहार के एक सीनियर आईएएस अधिकारी संजीव हंस को गिरफ्तार किया गया तो उस सिलसिले में स्पेशल विजिलेंस यूनिट ने रिशुश्री के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की थी, पर सरकार में उनको बचाने वाले तब इतने पॉवरफुल थे कि इनका कोई बाल बांका नहीं हो पाया।
बाद में संजीव हंस भी जमानत पर बाहर आ गए। नीतीश कुमार की इनको लेकर लाख नापसंदगी के बावजूद जदयू के कई सीनियर नेताओं का इन्हें वरदहस्त प्राप्त बताया जाता है। नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाने वाले आईएएस अफसर आनंद किशोर से भी रिशुश्री के अच्छे ताल्लुकात बताए जाते हैं। आनंद किशोर बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष हैं और 2026 तक के लिए इन्हें सेवा विस्तार भी दे दिया गया है। बताया जाता है कि ईडी ने अपनी रिपोर्ट में रिशुश्री पर यह भी आरोप लगाया है कि इन्होंने कई आईएएस अधिकारियों को अपने खर्चे पर उन्हें सपरिवार विदेश यात्राएं करवाई हैं, उनके कालेधन का निवेश दुबई में करवाया है।
2017 बैच के आईएएस योगेश कुमार सागर और 2014 बैच की आईएएस अभिलाषा कुमारी शर्मा की सपरिवार विदेश यात्राओं का खर्च रिशुश्री ने ही वहन किया था। समझा जाता है कि ईडी की जांच के घेरे में रिशुश्री सिंडिकेट के कम से कम 8 आईएएस अफसर शामिल हैं। सूत्र बताते हैं कि जब बिहार सरकार में रिशुश्री का काफी पैसा अटक गया तो इसे निकालने के लिए इन्होंने एक नामी बाबाजी की सेवा भी ली, पर बाबाजी भी उनका यह पैसा अब तब नहीं निकलवा पाए हैं, माना जाता है कि बदले में बाबाजी ने रिशुश्री से काफी मोटी रकम ऐंठ ली है।
मान गए मान
एक तो कयास लग रहे थे कि पंजाब की मान सरकार व्यवस्था विरोधी लहरों की भेंट चढ़ सकती है और 2029 के आने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को यहां कांग्रेस के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ सकती है। पर पंजाब के हाल के निकाय चुनावों में मान ने इन प्रचलित अवधारणाओं को जैसे झुठलाने का काम किया है। मान की अगुवाई में पंजाब के हालिया जिला परिषद और ब्लॉक समितियों के चुनाव में आप ने लगभग 70 फीसदी सीटों पर जीत दर्ज की है। यह जीत कई मायनों में मान के लिए अभूतपूर्व है, एक तो इस पूरे चुनाव में उन्होंने खुद को और अपनी सरकार को आगे रखा और अपने काम के नाम पर वोट मांगे। भले ही इन चुनावों में टर्नआउट पचास फीसदी से भी कम रहा, पर मान अपने कैडर वोटरों को घर से बाहर निकालने में कामयाब रहे। कोई तीन साल पहले जब आप ने पंजाब का चुनाव जीता था तो यह दिल्ली सरकार के काम पर और केजरीवाल के नाम पर चुनाव लड़ा गया था। मान तब जनता की पसंद के नहीं, बल्कि केजरीवाल की पसंद के सीएम थे, पर अब लगता है जैसे उनकी केजरीवाल के शेडो से बाहर निकलने की तड़प साकार हो गई है। वैसे भी जब से केजरीवाल इस दफे का दिल्ली चुनाव हारे हैं, वे मनीष सिसोदिया और अपने प्यारे वैभव के साथ मान के सिर पर पंजाब में ही जमे बैठे हैं, यह बात शायद मान को बेहद नागवार गुजर रही है। यही वजह थी कि इन निकाय चुनावों में मान ने केजरीवाल के नहीं, अपने नाम और काम पर वोट मांगे। सूत्र बताते हैं कि 2029 के चुनाव से पहले केजरीवाल ने मान को छेड़ने की जुर्रत की तो मान अपनी अलग पार्टी बना कर भी चुनाव में जा सकते हैं।
…और अंत में
महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में महायुति के दोनों घटक दलों ने यानी शिवसेना शिंदे और एनसीपी (अजित) ने शानदार प्रदर्शन किया है। यह प्रदर्शन इतना शानदार था कि एक पल को भाजपा भी भौच्चक रह गई। एकनाथ शिंदे व अजित पवार दोनों ही जानते हैं कि अगर वे अपनी जड़ों में कमजोर पड़े तो भाजपा उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह उठा फेंकेगी। सो, इन चुनावों में दोनों ने अपना धन, बल व राजनीतिक कौशल सब झोंक दिया।
शिंदे ने एक-एक सीट पर कई जमीनी सर्वेक्षण करवाए, उम्मीदवार बदलने की जरूरत बताई गई तो एन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठकर कई-कई बार अपने उम्मीदवार बदले। उम्मीदवारों को पैसों की, संसाधनों की कोई कमी नहीं होने दी गई। उन्होंने यह चुनाव ठीक वैसे ही लड़ा जैसे उनकी पार्टी लोकसभा या विधानसभा के चुनाव लड़ती है।

त्रिदीब रमण