दिल्ली में प्रदूषण की बढ़ती समस्या आम लोगों के साथ-साथ न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। सांसों पर संकट चल रहा है। सख्त पाबंदियों के बावजूद समाधान नजर नहीं आ रहा। कुछ राहत मिलती है तो दूसरे ही दिन दिल्ली, एनसीआर का एक्यूआई फिर बेहद खतरनाक स्तर को भी पार कर जाता है। दिल्ली की हवाओं में नाइट्रोजन डाईऑक्साइड का स्तर बढ़ चुका है। दिल्ली में 7 वर्ष के बाद इस गैस के स्तर में बढ़ौतरी हुई है। अब तो पराली भी नहीं जल रही। इसका सबसे बड़ा कारण वाहनों से होने वाला उत्सर्जन है। पैट्रोल-डीजल वाहनों की बढ़ती संख्या से नाइट्रोजन डाईऑक्साइड का सबसे बड़ा हिस्सा निकलता है। देश की शीर्ष अदालत लगातार प्रदूषण मामलों में सुनवाई कर रही है और समय-समय पर निर्देश भी जारी करती रही है। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए पहले 24 दिसम्बर को सुझाव दिया था, ‘‘अगर स्वच्छ हवा नहीं दे सकते तो कम से कम एयर प्यूरीफायर को चिकित्सा उपकरण के रूप में वर्गीकृत करके उस पर जीएसटी को घटाया ताे जा सकता है, ताकि लोग एयर प्यूरीफायर को आसानी से खरीद सकें। शुक्रवार को इसी याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केन्द्र से सवाल पूछा कि एयर प्यूरीफायर पर जीएसटी क्यों को कम नहीं किया जा सकता। इस संबंध में केन्द्र विस्तृत जवाब दाखिल करे। एयर प्यूरीफायर पर जीएसटी घटाने के मुद्दे पर गर्मागर्म बहस भी हुई।
इसमें कोई संदेह नहीं कि दिल्ली, एनसीआर में प्रदूषण बेहद खतरनाक है और लोगों को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। एक इंसान दिन में कम से कम 21 हजार बार सांस लेता है तो अनुमान लगाया जा सकता है कि कितनी जहरीली हवा उनके फेफड़ों को नुक्सान पहुंचा रही है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि दिल्ली की मौजूदा स्थिति में एयर प्यूरीफायर कोई लग्जरी आइटम नहीं, बल्कि जीवन रक्षक उपकरण बन गया है। इस पर राहत िमलनी ही चाहिए। यह मसला अब कानूनी दांव-पेचों में फंसता दिखाई दे रहा है। केन्द्र ने यािचका की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसका कड़ा विरोध किया। केन्द्र ने चेतावनी दी कि कोई भी न्यायिक निर्देश न्यायालय द्वारा विधायी क्षेत्र में हस्तक्षेप करने के समान होगा और शक्तियों के पृथक्करण के संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करेगा।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सहायक महासचिव एन. वेंकटरमन ने याचिका पर विचार करने को “मुसीबतों का पिटारा खोलना” और केंद्र सरकार को “संवैधानिक दृष्टि से डरा हुआ” बताते हुए कहा कि संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्टों में की गई सिफारिशों और जीएसटी परिषद की बैठकों में प्रस्तावों पर विचार-विमर्श के लिए पहले से ही एक विधायी प्रक्रिया मौजूद है। उन्होंने पूछा, “इस प्रक्रिया को अदालती कार्यवाही के माध्यम से कैसे रोका जा सकता है?” हालांकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने 24 दिसंबर को केंद्र को सुझाव दिया था कि दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए परिषद की आभासी बैठक बुलाने पर विचार किया जाए लेकिन एएसजी वेंकटरमन ने शुक्रवार को यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसा करना संभव नहीं होगा। ‘जीएसटी परिषद के कामकाज की प्रक्रिया और संचालन विनियम’ के विनियम 14 और 15 का हवाला देते हुए, जिसमें परिषद के समक्ष प्रस्तावों पर विचार-विमर्श और मतदान करने के तरीके का विवरण दिया गया है, जिसमें गुप्त मतदान के माध्यम से प्रस्ताव पर मतदान भी शामिल है, एएसजी ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में परिषद के सभी सदस्यों की भौतिक उपस्थिति शामिल होगी।
केन्द्र ने याचिका को भ्रामक बताते हुए कई सवाल भी उठाए। केन्द्र ने स्पष्ट कहा कि किसी भी अदालती निर्देश से विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन हो सकता है। शक्तियों का पृथक्करण एक बुनियादी ढांचा है। संविधान में लोकतंत्र के सभी अंगों की व्याख्या स्पष्ट है। कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है। न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या करती है जबकि विधायिका कानून बनाती है। यह तीनों भारत के लोकतंत्र के मुख्य अंग हैं, जो शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर कार्य करते हैं लेकिन एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप किए बिना संतुलन बनाए रखते हैं। लोकतंत्र में इन तीनों के बीच संतुलन बहुत जरूरी है। हर अंग को अपनी सीमा में रहकर काम करना चाहिए। कभी-कभी न्यायपालिका और विधायिका में टकराव भी देखने को मिलता रहा है लेकिन प्यूरिफायर की कीमत को लेकर यह बहस अपने आप में अनूठी है। अगर विशेष उत्पादों की कीमतों को लेकर न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है तो यह गम्भीर चिंतन का विषय है। अदालत की चिंता जन सरोकार से भी जुड़ी हुई है। एक एयर प्यूरीफायर की कीमत 10-12 हजार से शुरू होकर 60 हजार तक जाती है, जो एक आम आदमी की पहुंच से बाहर है। अदालत चाहती है कि जीएसटी में छूट देकर इसको सस्ता किया जाए ताकि आम आदमी इसे खरीद सके।
अब देखना होगा कि अगली सुनवाई में अदालत क्या रुख अपनाती है। बेहतर यही होगा कि दिल्ली में प्रदूषण को कम करने के लिए लगातार प्रयास किए जाएं। दिल्ली सरकार ने कई कड़े कदम उठाए हैं। वाहनों की जांच की जा रही है। पीयूसी सर्टिफिकेट मामलों में चालान किए जा रहे हैं। ग्रैप नियमों के उल्लंघन पर भी कार्रवाई हो रही है। जहरीली हवा खत्म करने के लिए कोई न कोई तो दवा ढूंढनी होगी। लोगों को स्वयं प्रदूषण के मामले में जागरूक बनना होगा। जन-जन की भागीदारी से ही दिल्ली की हवाओं को शुद्ध बनाया जा सकता है। अगर अब भी हम जागरूक नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ियों को हम स्वच्छ हवा नहीं दे पाएंगे। केन्द्र सरकार को भी चाहिए कि प्रदूषण से लोगों को राहत देने वाले उपकरणों को सस्ता करने के उपाय तलाश करे।
जीएसटी और एयर प्यूरीफायर
Summary :
दिल्ली में प्रदूषण की बढ़ती समस्या आम लोगों के साथ-साथ न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। सांसों पर संकट चल रहा है। सख्त पाबंदियों के बावजूद समाधान नजर नहीं आ रहा। कुछ राहत मिलती है तो दूसरे ही दिन दिल्ली, एनसीआर का एक्यूआई फिर बेहद खतरनाक स्तर को भी पार कर जाता है। दिल्ली की हवाओं में नाइट्रोजन डाईऑक्साइड का स्तर बढ़ चुका है। दिल्ली में 7 वर्ष के बाद इस गैस के स्तर में बढ़ौतरी हुई है। अब तो पराली भी नहीं जल रही। इसका सबसे बड़ा कारण वाहनों से होने वाला…



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