मैं अदालत का सम्मान करती हूं। न्यायपालिका हमारे लोकतंत्र का मजबूत स्तम्भ है। हमें न्याय प्रक्रिया पर विश्वास है लेकिन न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, न्याय दिखना भी चाहिए। मैं आज यह बात किसी अदालत के विरुद्ध नहीं, किसी संस्था को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि एक पीड़ित बेटी के दर्द और समाज की अन्तरात्मा की आवाज बनकर कह रही हूं।
हम आज छोटी-छोटी बेटियों को गुड टच, बैड टच सिखाते हैं और बोलते हैं कि डरना नहीं, अगर कोई ऐसी हिमाकत करे तो झट से बताना, पर यह क्या एक बेटी ने साहस करके सच बोला लेकिन उसे क्या मिला? संघर्ष, पीड़ा, अपमान और अंत में टूटता हुआ विश्वास। आज जब ऐसे मामले में जमानत की खबर आती है तो मन आहत होता है। दिल रो उठता है। गुस्से से काली चंडी बनने काे मन करता है, क्योंकि मैं भी एक बेटी हूं।
जब समाज में बलात्कार जैसे गम्भीर अपराध में आरोपी को राहत मिलती है तो पीड़िताओं का हौसला टूटता है। अन्य बेिटयां चुप रहना सीखती हैं। क्योंकि उन्हें डर लगता है-‘‘अगर सच बोला तो क्या हमें भी यही सहना पड़ेगा। इसलिए तो कोलकाता का डॉक्टर जैसा कांड, उन्नाव जैसा कांड और अभी-अभी जालंधर में एक 13 वर्षीय मासूम का कांड हुआ। अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं और लोग बेटी पैदा होने पर घबराते हैं। यह मैं किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि अपराध के िखलाफ और नारी सम्मान के पक्ष में िलख रही हूं। ऐसे मामलों में तो समाज को स्पष्ट संदेश देना होगा कि अपराध करने वाला चाहे कितना भी शक्तिशाली हो कानून से ऊपर नहीं है। मैं कहना चाहती हूं कि न्याय में देरी और अपराधी को राहत पीड़िता की पीड़ा को बढ़ा देता है। पीड़िता का विश्वास टूटता है तो सारे समाज पर असर पड़ता है तथा समाज कमजोर होता है। मेरी आवाज न्याय की है। यह आक्रोश नहीं यह एक जागरूक नागरिक की पीड़ा है।
हम न्यायपालिका से उम्मीद करते हैं कि वह पीड़िता के दर्द को समझें, उसकी मां के दर्द को समझें और देश की सभी बेटियों को भरोसा दें िक भारत में बेटी का सम्मान सर्वोच्च है। न्यायपालिका का न्याय, न्यायपालिका पर भरोसा हर आम आदमी, हर मां-बाप और हर बेटी के दिल तक पहुंचे। आज मैं न किसी राजनीतिक मंच से बोल रही हूं, न लिख रही हूं। आज मैं सिर्फ एक बेटी की आवाज बनकर लिख रही हूं आैर समय आने पर बोलूंगी भी।
जब बलात्कार का मामला सामने आया था, पूरा देश हिल गया था। एक बेटी ने हिम्मत दिखाई, सच बोला, अन्याय के सामने खड़ी हुई। उसने क्या-क्या सहा, पिता खोया, डर, धमकी, अपमान आैर सबसे लम्बा इंतजार आज जब ऐसे गम्भीर अपराध में आरोपी को जमानत मिलती है तो दिल टूटता है। मन में सवाल उठता है-क्या बेटी का दर्द इतना सस्ता है? क्या उसकी चीखें, उसका साहस कागजों में दब जाएगा। मैं फिर दोहराऊंगी मैं न्यायपालिका का सम्मान करती हूं। मुझे कानून पर भरोसा है लेकिन न्याय सिर्फ कानून की भाषा में नहीं दिल की भाषा में भी होना चाहिए। मैं चाहती हूं इस बेटी को और अन्य पीड़ित बेटियों को न्याय जल्दी मिलें। दोषियों को कड़ा संदेश मिलें और समाज में यह संदेश हो बेटी कमजोर नहीं है।
अगर आज हम चुप रहेंगे तो कल कोई और बेटी रोएगी। अगर हम सवाल नहीं करेंगे तो अन्याय मजबूत होता जाएगा। इसिलए आज बेटी की पीड़ा को सबसे ऊपर रखा जाए। न्याय ऐसा हो कि किसी भी बेटी को डर न लगे। किसी मां-बाप का सिर न झुके और हर अपराधी कोई भी अपराध करने से पहले सौ बार सोचे कि कानून से बचना आसान नहीं है। आज मैं अपनी कलम से यह आवाज उठाती हूं, गुस्से से, नफरत से, दर्द और जिम्मेदारी से जब एक बेटी को न्याय मिलता है तभी पूरा समाज सुरक्षित होता है। मेरी आवाज बेटी के सम्मान के पक्ष में उठी क्योंकि मैं एक बेटी हूं, मां हूं, दादी हूं, बहन हूं। न्याय ऐसा हो कि बेटी डरे नहीं, समाज चुप न रहे। मैं बेटी की आवाज हूं, क्योंकि मैं एक बेटी हूं। आज कई महिला संगठन इस फैसले के िवरुद्ध आवाज उठा रहे हैं, प्रदर्शन कर रहे हैं। योगिता बयाना के साथ तो मैं भी पीड़ितों की आवाज के लिए कई मंच शेयर कर चुकी हैं। वो महिलाओं के लिए परी नाम की संस्था द्वारा काम कर रही हैं।
पीड़िता की मां चीख-चीख कर कह रही है कि न्यायपालिका पर से उसका भरोसा टूट गया है, महिला संगठन भी सुप्रीम कोर्ट में न्याय की गुहार लगा रहे हैं। सीबीआई स्वयं सेंगर की जमानत रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है। सीबीआई को चाहिए कि वह पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करे। न्याय केवल होना ही काफी नहीं, बल्कि न्याय होता भी दिखना चाहिए। अपराध की प्रकृति देखते हुए दोषी को सजा आैर पीड़िता के साथ न्याय होना ही चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो न्याय की प्रक्रिया ही बाधित हो जाएगी। अगर न्यायपालिका पर से जनता का भरोसा टूटा तो समाज में अराजकता फैलने का खतरा पैदा हो जाएगा। जस्टिस कृष्णा अय्यर ने एक मामले में टिप्पणी की थी कि एक हत्यारा शरीर को मारता है लेकिन एक बलात्कारी आत्मा मार देता है। बलात्कार एक महिला के अधिकारों की हत्या है। पीड़िता के दर्द पर हंसी, घटिया सोच और मानसिकता का परिणाम है। पीडि़ता को न केवल भावनात्मक सहायता चाहिए बल्कि उसके आंसू पोंछने की जरूरत है। इसलिए जरूरी है कि उसे इंसाफ मिले।
यही नहीं अभी भी इस बेटी की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बहुत आवश्यकता है। आज बेेटियों की सुरक्षा बहुत आवश्यक है।
यह कैसा न्याय…. मैं भी एक बेटी हूं…
Summary :
मैं अदालत का सम्मान करती हूं। न्यायपालिका हमारे लोकतंत्र का मजबूत स्तम्भ है। हमें न्याय प्रक्रिया पर विश्वास है लेकिन न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, न्याय दिखना भी चाहिए। मैं आज यह बात किसी अदालत के विरुद्ध नहीं, किसी संस्था को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि एक पीड़ित बेटी के दर्द और समाज की अन्तरात्मा की आवाज बनकर कह रही हूं। हम आज छोटी-छोटी बेटियों को गुड टच, बैड टच सिखाते हैं और बोलते हैं कि डरना नहीं, अगर कोई ऐसी हिमाकत करे तो झट से बताना, पर यह क्या एक बेटी ने साहस करके सच बोला लेकिन…



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