कौन जीता कौन हारा

Summary :

चूंकि महिला आरक्षण विधेयक संसद में पारित नहीं हो सका, अब सभी की निगाहें सरकार पर टिकी हैं। इसको लेकर विभिन्न सिद्धांत सामने आ रहे हैं और कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं। जब प्रारंभ से ही इसके असफल होने की आशंका थी तो सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक संसद में क्यों पेश किया? क्या सरकार इसके परिणाम से अवगत थी और फिर भी आगे बढ़ी? या यह एक भूल थी या फिर जानबूझकर उठाया गया कदम? विपक्ष इस पर सहमत क्यों नहीं हुआ? इस स्थिति में किसका लाभ हुआ और किसका नुक्सान, सरकार का या विपक्ष का? क्या इसके…

चूंकि महिला आरक्षण विधेयक संसद में पारित नहीं हो सका, अब सभी की निगाहें सरकार पर टिकी हैं। इसको लेकर विभिन्न सिद्धांत सामने आ रहे हैं और कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं। जब प्रारंभ से ही इसके असफल होने की आशंका थी तो सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक संसद में क्यों पेश किया? क्या सरकार इसके परिणाम से अवगत थी और फिर भी आगे बढ़ी? या यह एक भूल थी या फिर जानबूझकर उठाया गया कदम? विपक्ष इस पर सहमत क्यों नहीं हुआ? इस स्थिति में किसका लाभ हुआ और किसका नुक्सान, सरकार का या विपक्ष का? क्या इसके पीछे राज्यों के चुनावों को ध्यान में रखा गया था, या 2029 के आम चुनावों की रणनीति काम कर रही थी?

सामान्य चुनाव अभी तीन वर्ष दूर हैं, इसलिए यह तर्क दिया जा सकता है कि यह समय अभी दूर है किंतु यह भी सच है कि भारतीय जनता पार्टी हमेशा चुनावी मोड में रहती है। ऐसे में 2029 के चुनाव, जो उसकी चुनावी रणनीति के केंद्र में है, को ध्यान में रखने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता और न ही इसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए। हालांकि, इस विवादास्पद विधेयक के ‘क्यों’ और ‘कैसे’ पर लौटते हैं। जहां तमाम संभावनाएं बहस और अटकलों के दायरे में हैं, वहीं एक बात बिल्कुल स्पष्ट है, इस पूरी प्रक्रिया में केवल एक ही पक्ष हारा है: भारत की महिलाएं। जैसा कि सामाजिक कार्यकर्ता और महिला अधिकारों की प्रखर पैरोकार रंजना कुमारी कहती हैं, “ठगा कौन गया: महिलाएं।”

रंजना कुमारी सही हैं। महिलाएं एक बार फिर हारी हैं, एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि बार-बार। किंतु इस बार यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनका उपयोग एक राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया गया लेकिन इस पर आगे बात करेंगे। पहले महिला आरक्षण विधेयक, विशेष सत्र, इसके पारित न हो पाने के कारण, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण पिछले तीस वर्षों में संसद के भीतर और बाहर इसकी यात्रा के संदर्भ को समझना आवश्यक है। हालांकि, शुरुआत से आरंभ करने के बजाय, वर्तमान पर ध्यान देना अधिक उचित होगा। वर्ष 2026 से और फिर 1996 की ओर लौटना होगा, जब यह विधेयक पहली बार संसद में प्रस्तुत किया गया था।

वर्तमान संदर्भ में, महिला आरक्षण या ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को सरकार द्वारा संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र में प्रस्तुत किया गया, ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण को 2029 तक लागू करने की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।
संसद का यह विशेष सत्र 16 अप्रैल को, राज्य चुनावों के बीच, अचानक बुलाया गया, जिस पर कई सवाल उठे। विपक्षी दलों ने सरकार की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाया और आरोप लगाया कि यह तत्परता महिलाओं के अधिकारों से अधिक चुनावी लाभ के लिए थी। उनके अनुसार, सरकार की नजर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों पर थी, जहां महिला मुद्दा एक उपयुक्त राजनीतिक औज़ार बन सकता था।

परिणाम चाहे जो भी हो, सरकार को भरोसा था कि वह स्वयं को महिलाओं के अधिकारों की समर्थक और आरक्षण देने की इच्छुक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर पाएगी। यह जानते हुए भी कि संसद में संवैधानिक विधेयक पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या उसके पास नहीं है, उसने इसे पेश किया। उसने एक ‘विन-विन’ रणनीति अपनाई, यदि विधेयक पारित हो जाता तो वह पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में इसका व्यापक राजनीतिक लाभ उठा सकती थी और यदि यह विफल होता, जैसा कि हुआ तो वह मतदाताओं को यह संदेश दे सकती थी कि विपक्ष ने इसे रोक दिया।

साथ ही, वह स्वयं को पीड़ित के रूप में भी प्रस्तुत कर सकती थी, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की महिलाओं से क्षमा याचना करते हुए किया। यह रणनीति कितनी प्रभावी होगी, यह अभी देखना बाकी है। अवगत न होने वालों के लिए, किसी भी संवैधानिक विधेयक को पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है जिसे सरकार प्राप्त नहीं कर सकी। वह आवश्यक संख्या से 54 मत कम रह गई। यह अपेक्षित ही था, क्योंकि सरकार को पहले से ही पता था कि उसके पास पर्याप्त संख्या नहीं है।
जहां सरकार ने आरक्षण को विवादास्पद परिसीमन प्रक्रिया और सीटों के विस्तार से जोड़ दिया, वहीं विपक्ष ने इसे महिलाओं के आरक्षण को पटरी से उतारने की साजिश बताया और परिसीमन को आरक्षण से अलग करने की मांग की।

कुल मिलाकर यदि कोई रणनीति थी भी तो वह विफल सिद्ध हुई। महिला आरक्षण का मुद्दा अपनी शुरुआत से ही उतार-चढ़ाव भरा रहा है। यह एक 30 वर्षों की यात्रा रही है, जिसमें इसे वास्तविकता में बदलने के लिए आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह विधेयक पहली बार 1996 में प्रस्तुत किया गया था, जब एच. डी. देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार ने इसे संसद में रखा। इसके बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया, किंतु अंततः यह निष्प्रभावी हो गया। 1998 से 1999 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने इसे दो बार प्रस्तुत किया।

उस समय विपक्ष ने ओबीसी के लिए “कोटे के भीतर कोटा” की मांग की, जिसके चलते विधेयक एक बार फिर निष्प्रभावी हो गया। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार भी इस विधेयक को पारित कराने के अपने प्रयास में सफल नहीं हो सकी। हालांकि, 2010 में एक महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिली, जब यूपीए सरकार ने इसे राज्यसभा में पारित कराने में सफलता प्राप्त की, जिसके बाद काफी नाटकीय घटनाक्रम सामने आया। किंतु लोकसभा के विघटन के साथ ही यह विधेयक एक बार फिर निरस्त हो गया। सितंबर 2023 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने 106वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया, जिसे एक “ऐतिहासिक कदम” के रूप में प्रस्तुत किया गया।

हालांकि, इसे परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने के कारण जिससे वास्तविक सशक्तिकरण को जनगणना और परिसीमन तक टाल दिया गया। विपक्ष ने इसे “बीजेपी सरकार का एक और दिखावा” करार दिया। वर्ष 2026 आते-आते, भारतीय जनता पार्टी ने बड़े उत्साह के साथ विशेष सत्र बुलाया, किंतु यह कानून लोकसभा में पारित नहीं हो सका। हालिया घटनाक्रम 17 अप्रैल को सामने आया, जब संवैधानिक संशोधन लोकसभा में विफल हो गया। राजनीतिक लाभ से इतर, यदि कोई हो भी, तो सरकार द्वारा लाया गया विधेयक का इस प्रकार असफल होना सरकार की एक गंभीर विफलता ही माना जाएगा।

इसके साथ जुड़ी शर्मिंदगी और राजनीतिक साख में आई कमी को देखते हुए सरकार को स्वयं से प्रश्न करना होगा क्या उसने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया या आंकलन में चूक हुई? क्या वह इस प्रकरण में उजागर नहीं हो गई? और क्या उसने महिला कल्याण के नाम पर वास्तव में अपने राजनीतिक उद्देश्य साधने का प्रयास किया? इन प्रश्नों के उत्तर सरल नहीं हैं और इस पर मतभेद भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। किंतु इस पूरे शोर-शराबे और राजनीतिक उठा-पटक के बीच जो मुद्दा सबसे अधिक दब गया, वह था महिलाओं का कल्याण, उनका सशक्तिकरण और 33 प्रतिशत आरक्षण का उनका अधिकार।

Team Desk