फोटोग्राफी की दुनिया के लीजेंड कहे जाने वाले रघु राय का रविवार को निधन हो गया। रघु राय अपनी एक से बढ़कर एक फोटोग्राफी के लिए जाने जाते हैं लेकिन जिस फोटो ने उन्हें सबसे ज्यादा कामयाबी दिलाई, उसमें से एक मध्य प्रदेश के भोपाल की है। भोपाल गैस त्रासदी की एक बच्ची की तस्वीर ने सबको झकझोर के रख दिया था। रघु राय का जन्म साल 1942 में पाकिस्तान में हुआ था। उन्होंने 1960 में फोटोग्राफी का सफर शुरू किया था। उनके द्वारा क्लिक की गई फोटों की प्रदर्शनियां देश-दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में आयोजित की गई। रघु राय ने राजनीति से लेकर हर जोनर की तस्वीरों को अपने कैमरे में कैद किया।
2 और 3 दिसंबर की दरमियानी रात भोपाल में यूनियन कार्बाइड प्लांट से जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट का रिसाव हुआ था। इस भीषण औद्योगिक हादसे में करीब 3000 से 5000 लोग मौत के मुंह में समा गए थे। जबकि लाखों लोग प्रभावित हुए थे, तब तबाही के उस मंजर को रघु राय ने अपने कैमर में कैद किया था। रघु राय को बांग्लादेश युद्ध की तस्वीरों के लिए पद्मश्री सम्मान भी मिल चुका है। बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के दौरान भारत आए शरणार्थियों के दर्द, बैचेनी और बेबसी को उन्होंने अपनी तस्वीरों में दिखाया था।
रघु राय के फोटोग्राफर बनने की कहानी कम दिलचस्प नहीं है। उनका फोटोग्राफी की दुनिया में प्रवेश किसी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि एक संयोग था। पेशे से सिविल इंजीनियर रहे रघु राय 1960 के दशक में दिल्ली में अपने भाई और प्रसिद्ध फोटोग्राफर एस. पॉल से मिलने आए थे। यहीं से उनकी रुचि फोटोग्राफी की ओर बढ़ी, हरियाणा के एक गांव में ली गई उनकी शुरुआती तस्वीर (कैमरे की ओर सीधे देखता एक गधा) ने उनकी किस्मत बदल दी। यह तस्वीर लंदन के ‘द टाइम्स’ में प्रकाशित हुई और उन्हें न सिर्फ पुरस्कार राशि मिली, बल्कि एक नई पहचान भी मिली।
जीवन के विविध रंगों को उतारने वाले फोटोग्राफर फोटोग्राफी करियर के दौरान रघु राय ने सिर्फ तस्वीरें नहीं लीं, बल्कि जीवन के विभिन्न रंगों को अपने फ्रेम में जीवंत किया। उनका मानना था कि फोटो जर्नलिज्म इतिहास का पहला दृश्य प्रमाण होता है। यही वजह रही कि उन्होंने अपने काम को महज सुंदर तस्वीरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि आम लोगों की भावनाओं और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से कैद किया। 1972 में पद्मश्री से सम्मानित रघु राय ने भारत के कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षणों को अपने कैमरे में दर्ज किया। उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीरें लीं। प्रतीकों और संकेतों के माध्यम से उन्होंने उस दौर की वास्तविकता को दुनिया तक पहुंचाया।
1977 में रघु राय को प्रतिष्ठित मैग्नम फोटोज में शामिल होने का निमंत्रण मिला, जो उन्हें महान फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी कार्तिए ब्रेसों की सिफारिश पर मिला था। उनके काम में ब्रेसों की मानवीय दृष्टि की झलक साफ दिखाई देती है। फिर चाहे वह पुरानी दिल्ली की गलियां हों, गंगा के घाट या देश के विविध हिस्सों की तस्वीरें,रघु राय ने कई किताबें भी लिखीं। तीन दशकों से अधिक समय तक एक फोटो पत्रकार के रूप में उनकी विशिष्टता उनकी सुलभता नहीं, बल्कि भारत के इतिहास को परिभाषित करने वाले क्षणों में सक्रिय रूप से भाग लेने का उनका दृढ़ संकल्प था। उदाहरण के लिए, 1971 के युद्ध के दौरान उन्होंने भारत-बांग्लादेश सीमा की यात्रा की, जहां उन्होंने शरणार्थियों की दुर्दशा को कैमरे में कैद किया।
इसी प्रवृत्ति ने उन्हें 1984 की गैस त्रासदी के बाद भोपाल और ऑपरेशन ब्लूस्टार के समय अमृतसर तक पहुंचाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से परिचित, जिनकी उन्होंने कई बार तस्वीरें खींचीं, उन्होंने न केवल आपातकाल का पुरजोर विरोध किया, बल्कि एक फोटो पत्रकार के रूप में इसे रिकॉर्ड करने के तरीके भी खोजे। इन सभी मामलों में उनका ध्यान केवल घटना पर ही नहीं, बल्कि उसके व्यापक परिणामों और मानव जीवन पर इसके प्रभाव पर भी केंद्रित था। उनके चित्रों में भी मदर टेरेसा से लेकर दलाई लामा तक, सत्यजीत रे से लेकर भीमसेन जोशी तक, हिम्मत शाह से लेकर अरुंधति रॉय तक, उनके विषयों के साथ उनका निरंतर जुड़ाव झलकता है।
जिस लगन से उन्होंने प्रसिद्ध हस्तियों की तस्वीरें खींचीं, वही लगन देश के गुमनाम निवासियों में भी दिखाई देती है। “अंततः, यह साधारण दैनिक जीवन ही है जो रोजमर्रा की जिंदगी का सार समेटे हुए है। रघु राय ऐसे जादूगर थे जिनकी तस्वीरें सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बनकर आने वाले कई वर्षों तक हमारे समय की निष्पक्ष कहानियां सुनाएंगी। फोटो जर्नलिज़्म को कलात्मक स्तर तक ले जाने वाले इस कलाकार की एक-एक तस्वीर एक-एक दास्तान है।
इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में जहां सब कुछ एक प्रॉम्प्ट से हो जाता है, रघु राय जी की तस्वीरें इस कला की महानता को बयान करती हमेशा ज़िंदा रहेंगी। रघु राय जी का एक ही प्रॉम्प्ट था शायद-सच्चाई, समर्पण, निर्भीकता और अथक प्रयास। भाषा का इस्तेमाल सच्चाई को धुंधला करने के लिए किया जा सकता है लेकिन एक तस्वीर कभी झूठ नहीं बोलती। रघु राय की अनगिनत तस्वीरें, जिनमें अक्सर शांत आशावाद और कभी-कभी निराशावाद झलकता है, कभी झूठ नहीं बोलतीं।


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