संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने करीब 60 वर्ष बाद तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक छोड़ने का फैसला कर बड़ा कूटनीतिक दांव खेला है। यह फैसला आर्थिक और राजनीतिक दोनों वजहों से लिया गया है। यूएई के दांव से एक बात पूरी तरह से स्पष्ट हो गई है कि जहां एक तरफ अमेरिका, इजराइल और ईरान में भयंकर युद्ध की स्थितियां अभी तक बनी हुई हैं, वहीं खाड़ी के देशों में भी आपसी लड़ाई चल रही है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में काफी समय से तनाव चल रहा था। यूएई अपनी तेल उत्पादन सीमा में बंधकर नहीं रहना चाहता था। जबकि 22 सदस्यीय देशों के संगठन ओपेक ने उसे केवल लगभग 34 लाख बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन की अनुमति दी थी।
ओपेक के मुखिया सऊदी अरब कम उत्पादन चाहता था। अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध के दौरान यूएई को भी हमलों का सामना करना पड़ा और उसे भी पिछले दो महीनों में काफी नुक्सान हुआ। ऐसे में वह अधिक तेल उत्पादन कर अपने नुक्सान की भरपाई करना चाहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ईरान को नई धमकी से कच्चे तेल के दाम 125.5 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुके हैं। यूएई ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक सदस्य देश था, जो 1967 में इस समूह में शामिल हुआ था लेकिन समूह की उत्पादन क्षमता पर काफी लंबे समय से सऊदी अरब का नियंत्रण था जिससे यूएई अपनी उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ा पा रहा था।
यूएई के इस फैसले से सऊदी अरब की प्रतिष्ठा को तगड़ा झटका लगा है क्योंकि इससे उसकी तेल कीमतों को नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर होगी। साथ ही यूएई को अमेरिका के करीब आने का मौका भी मिलेगा क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से ओपेक के आलोचक रहे हैं। यूएई की सरकारी कंपनी एडनोक के मुताबिक, यूएई के ओपेक से बाहर आ जाने से ईरान युद्ध शुरू होने से पहले कच्चे तेल का उत्पादन 3.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, जो 2027 तक बढ़कर 5 मिलियन बैरल हो जाएगा।
यूएई के ओपेक से बाहर आने का बहुत बड़ा कारण पाकिस्तान भी है। पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ बढ़ते रिश्ते और अमेरिका व ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाना उसे पसंद नहीं था। ईरान के मुद्दे पर पाकिस्तान की तटस्थता को लेकर यूएई की नाराजगी का संकेत उस समय मिल गया था जब उसने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर वापिस देने का दबाव डाला था। सऊदी अरब अपने खाड़ी पड़ोसी की तुलना में पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के अधिक निकट जा रहा था। इससे भी दोनों देशों में दरार चौड़ी हो रही थी। होर्मुज स्ट्रेट में नाकेबंदी के चलते अर्थव्यवस्था लगातार प्रभावित हो रही है।
इससे भी यूएई परेशान है। ओपेक छोड़ कर यूएई न सिर्फ अमेरिका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना चाहता है, बल्कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के गठबंधन को भी कमजोर करना चाहता है। अब सवाल यह है कि यूएई का ओपेक से बाहर निकलने के फैसले का भारत पर क्या प्रभाव होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत को फायदा पहुंचने की सम्भावना है। यूएई द्वारा तेल उत्पादन बढ़ाए जाने से वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ेगी जिससे कीमतों में कमी आ सकती है। इसका सीधा फायदा भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों को मिलेगा। सम्भव है कि कुछ अन्य ओपेक सदस्य भी निवेश और उत्पादन से संबंधित निर्णय लेने में अधिक स्वतंत्रता पाने के लिए बाहर निकलना चाहें। इससे भी कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
अतीत में भी ऐसे उदाहरण रहे हैं कि जहां ओपेक सदस्य अपने दिए गए कोटे का पालन नहीं कर पाए जिससे कीमतों को नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित हुई है। हालांकि यूएई के बाहर निकलने का प्रभाव तभी दिखाई देगा जब होर्मुज स्ट्रेट में दोहरी नाकेबंदी को हटाया जाएगा। वर्तमान स्थिति में इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि अमेरिका और ईरान के बीच गतिरोध कितने समय तक जारी रहेगा, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। रिपोर्टों से पता चलता है कि ईरान द्वारा दिए गए प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को स्वीकार्य नहीं हैं।
स्ट्रेट पर अमेरिकी नाकेबंदी के साथ, ट्रंप ईरान पर आर्थिक दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं, जो फिलहाल कारगर नहीं दिख रहा है। इस क्षेत्र से जब तेल आपूर्ति का दोबारा शुरू होना अल्पावधि में अनिश्चित बना हुआ है। ओपेक की कमजोरी मध्यम अवधि में स्थायी रूप से तेल की कीमतें कम करने में मदद कर सकती है। अमेरिका-ईरान गतिरोध लम्बे अरसे तक चलता रहा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को बहुत नुक्सान होगा। सप्लाई लाइन बाधित होने से महंगाई बहुत बढ़ेगी और देशों को तेल और ऊर्जा की कीमतें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ सकता है। यूएई के कूटनीतिक दांव से न केवल सऊदी अरब की प्रतिष्ठा को तगड़ा झटका लगा है, बल्कि पाकिस्तान की मध्यस्था को लेकर भी खाड़ी देशों में मतभेद तीव्र होते जा रहे हैं।
खाड़ी देशों की आपसी फूट भी भविष्य के लिए अच्छी नहीं है। बेहतरी इसी में है कि पश्चिम एशिया का संकट शीघ्र हल हो और होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी शीघ्र खुले। यदि अमेरिका ईरान को भी कुछ शर्तों के साथ तेल बेचने की अनुमति देता है तो ही विश्व उथल-पुथल से बचा रह सकता है।


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